आरक्षण कब तक? अब सवाल ‘कोटा’ का नहीं, ऐसी व्यवस्था बनाने का है जहां आरक्षण की जरूरत ही न पड़े

विश्लेषण | अवनीश त्यागी | TargetTvLive
भारत में आरक्षण की बहस कोई नई बात नहीं है। चुनाव आते हैं तो यह मुद्दा और तेज हो जाता है। कोई आरक्षण बढ़ाने की बात करता है, कोई इसे खत्म करने की। कोई इसे सामाजिक न्याय का हथियार बताता है तो कोई समान अवसर और मेरिट के रास्ते में बाधा मानता है।
लेकिन इस पूरी बहस में एक सवाल अक्सर पीछे छूट जाता है—
क्या आरक्षण हमेशा चलता रहना चाहिए?
अगर आरक्षण का मूल उद्देश्य उन नागरिकों को आगे बढ़ने का अवसर देना है जो लंबे समय तक अवसरों से वंचित रहे, तो फिर सरकार का अंतिम लक्ष्य ऐसी व्यवस्था बनाना क्यों नहीं होना चाहिए जहां किसी नागरिक को आगे बढ़ने के लिए आरक्षण की जरूरत ही न पड़े?
यही वह सवाल है जिस पर अब गंभीरता से बहस होनी चाहिए।
आरक्षण हटाने का मतलब किसी को पीछे करना नहीं
आरक्षण खत्म करने की बात को अक्सर इस तरह प्रस्तुत किया जाता है जैसे इससे किसी वर्ग के अधिकार छीन लिए जाएंगे।
लेकिन बहस का असली लक्ष्य किसी व्यक्ति को पीछे करना नहीं होना चाहिए।
लक्ष्य होना चाहिए—व्यवस्था को इतना मजबूत करना कि हर नागरिक अपने दम पर आगे बढ़ सके।
अगर एक बच्चे को अच्छी शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य, पौष्टिक भोजन, इंटरनेट, किताबें, शिक्षक और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का समान अवसर मिल जाए तो उसे आगे बढ़ने के लिए किसी विशेष सहारे की आवश्यकता कितनी रह जाएगी?
यही मूल प्रश्न है।
आज की सबसे बड़ी समस्या आरक्षण नहीं, असमान शुरुआत है
एक ही परीक्षा में बैठने वाले दो बच्चों की शुरुआत हमेशा एक जैसी नहीं होती।
एक बच्चा ऐसे स्कूल में पढ़ता है जहां पर्याप्त शिक्षक हैं, आधुनिक सुविधाएं हैं और घर पर पढ़ाई का अच्छा माहौल है।
दूसरा बच्चा ऐसे स्कूल में पढ़ता है जहां शिक्षक कम हैं, संसाधन सीमित हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति पढ़ाई के रास्ते में खड़ी है।
दोनों को परीक्षा में एक ही प्रश्नपत्र दे देना कानूनी रूप से समान अवसर हो सकता है, लेकिन क्या यह वास्तविक जीवन में समान शुरुआत भी है?
यहीं सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी शुरू होती है।
अगर सरकार आरक्षण खत्म करना चाहती है तो उसे पहले असमान शुरुआत खत्म करनी होगी।
हर बच्चे को एक जैसी शिक्षा मिले—यहीं से बदलाव शुरू होगा
सरकारी स्कूल किसी गरीब बच्चे की मजबूरी नहीं, उसकी ताकत बनने चाहिए।
सरकार ऐसी शिक्षा व्यवस्था क्यों नहीं बना सकती जहां गांव का सरकारी स्कूल भी शहर के अच्छे स्कूल जैसी गुणवत्ता दे?
हर स्कूल में पर्याप्त शिक्षक हों।
अच्छी प्रयोगशालाएं हों।
पुस्तकालय हों।
कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा हो।
खेल और कौशल विकास की व्यवस्था हो।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन हो।
अगर यह व्यवस्था बनती है तो गरीब परिवार का बच्चा भी उस स्तर की तैयारी कर सकेगा जिस स्तर की तैयारी आज केवल संपन्न परिवारों के बच्चों को मिलती है।
यहीं से आरक्षण की आवश्यकता कम करने का वास्तविक रास्ता निकलेगा।
सरकार को सिर्फ ‘सीट’ नहीं, ‘क्षमता’ बनानी चाहिए
किसी विद्यार्थी को एक सीट मिल जाना उसकी पूरी समस्या का समाधान नहीं है।
असल सवाल यह है कि उस विद्यार्थी को ऐसी शिक्षा और प्रशिक्षण मिले कि वह किसी भी प्रतियोगिता में अपने ज्ञान और कौशल के बल पर खड़ा हो सके।
सरकार का लक्ष्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने प्रतिशत सीटें किस वर्ग को मिलीं।
सरकार का लक्ष्य यह होना चाहिए कि हर वर्ग के कितने बच्चे इतनी अच्छी शिक्षा पा रहे हैं कि उन्हें किसी अतिरिक्त सहारे की जरूरत ही न पड़े।
यह बदलाव आरक्षण की राजनीति से कहीं बड़ा बदलाव होगा।
‘मेरिट’ की बहस भी साफ होनी चाहिए
आरक्षण विरोध की बहस में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द है—मेरिट।
लेकिन मेरिट केवल परीक्षा में मिले अंकों का नाम नहीं है।
मेरिट ज्ञान से बनती है।
मेहनत से बनती है।
अच्छी शिक्षा से बनती है।
प्रशिक्षण से बनती है।
अवसर से बनती है।
और लगातार सीखने की क्षमता से बनती है।
इसलिए अगर सरकार सच में मेरिट आधारित व्यवस्था चाहती है तो उसे पहले मेरिट तैयार करने वाली व्यवस्था बनानी होगी।
गरीब बच्चे को अच्छी शिक्षा नहीं मिलेगी तो उसकी प्रतिभा सामने कैसे आएगी?
गांव के बच्चे को डिजिटल संसाधन नहीं मिलेंगे तो वह शहर के बच्चे से कैसे मुकाबला करेगा?
महंगी कोचिंग केवल संपन्न परिवारों तक सीमित रहेगी तो प्रतियोगिता पूरी तरह बराबर कैसे होगी?
सरकारी नौकरी में चयन के बाद भी योग्यता जरूरी
सरकारी नौकरी कोई अंतिम पुरस्कार नहीं है।
यह जनता की सेवा की जिम्मेदारी है।
इसलिए चाहे कर्मचारी किसी भी वर्ग से आया हो, सेवा में आने के बाद उसकी कार्यक्षमता, प्रशिक्षण, अनुशासन और प्रदर्शन की लगातार समीक्षा होनी चाहिए।
काम अच्छा है तो सम्मान मिले।
काम खराब है तो जवाबदेही तय हो।
जनता को अच्छी सेवा मिलना सबसे ऊपर होना चाहिए।
सरकारी सेवा में पहचान अंततः कर्मचारी की कार्यक्षमता से होनी चाहिए।
आरक्षण कब खत्म होगा? इसका जवाब सरकार को देना चाहिए
आरक्षण पर सबसे बड़ा सवाल यह भी होना चाहिए कि इसकी आवश्यकता समाप्त करने के लिए सरकार की दीर्घकालीन योजना क्या है?
क्या हर दस या बीस साल में यह देखा जाता है कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन कितना कम हुआ?
क्या यह जांच होती है कि कौन-से क्षेत्र अब विशेष सहायता के बिना प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में आ चुके हैं?
क्या यह देखा जाता है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में सबसे अधिक वंचित व्यक्ति तक पहुंच रहा है?
अगर आरक्षण सामाजिक असमानता दूर करने का माध्यम है तो सरकार को असमानता खत्म होने की दिशा में भी स्पष्ट लक्ष्य तय करना चाहिए।
किसी भी अस्थायी उपाय को स्थायी व्यवस्था बना देना समाधान नहीं हो सकता।
आरक्षण हटाना है तो पहले ये पांच काम करने होंगे
आरक्षण समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ना है तो सरकार को पांच मोर्चों पर सबसे पहले काम करना चाहिए—
पहला—समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा।
हर बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले, चाहे वह गांव में रहता हो या शहर में।
दूसरा—समान स्वास्थ्य सुविधा।
किसी बच्चे का भविष्य खराब स्वास्थ्य और कुपोषण के कारण प्रभावित न हो।
तीसरा—समान प्रतियोगी अवसर।
महंगी कोचिंग की मजबूरी खत्म हो और गरीब विद्यार्थी को भी उच्च स्तर की तैयारी उपलब्ध हो।
चौथा—समान कौशल विकास।
डिग्री के साथ रोजगार योग्य कौशल भी मिले।
पांचवां—समान अवसर वाला रोजगार बाजार।
नौकरी पाने के लिए पारदर्शी, निष्पक्ष और क्षमता आधारित व्यवस्था मजबूत हो।
फिर आरक्षण की जरूरत क्यों रहे?
कल्पना कीजिए कि एक दिन भारत में हर बच्चे को समान स्तर की शिक्षा मिल रही है।
हर विद्यार्थी के पास डिजिटल सुविधा है।
गरीब विद्यार्थी को भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए वही संसाधन उपलब्ध हैं।
स्वास्थ्य सेवाएं समान हैं।
पोषण की समस्या काफी हद तक खत्म हो चुकी है।
रोजगार के अवसर व्यापक हैं।
ऐसी स्थिति में सवाल स्वाभाविक है—
जब शुरुआत लगभग समान हो गई, तो फिर अलग-अलग कोटे की आवश्यकता कितने समय तक रहेगी?
यही वह स्थिति है जहां आरक्षण समाप्त करने की बहस वास्तविक अर्थ प्राप्त करती है।
‘आरक्षण हटाओ’ से पहले ‘असमानता हटाओ’
आरक्षण समाप्त करने की मांग को केवल नारे में बदल देने से समाधान नहीं निकलेगा।
पहले असमानता कम करनी होगी।
पहले सरकारी शिक्षा मजबूत करनी होगी।
पहले स्वास्थ्य और पोषण की व्यवस्था सुधारनी होगी।
पहले गरीब और ग्रामीण बच्चों को प्रतियोगिता के समान संसाधन देने होंगे।
फिर एक ऐसी व्यवस्था तैयार करनी होगी जहां हर नागरिक अपनी योग्यता और मेहनत के आधार पर आगे बढ़ सके।
यानी रास्ता है—पहले समान अवसर, फिर समान प्रतियोगिता और अंततः आरक्षण से मुक्ति।
अंतिम लक्ष्य साफ होना चाहिए
आरक्षण को लेकर बहस चाहे जितनी लंबी हो, अंतिम लक्ष्य पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
क्या हम ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें पीढ़ियों तक आरक्षण की जरूरत बनी रहे?
या ऐसी व्यवस्था बनाना चाहते हैं जिसमें एक दिन आरक्षण की आवश्यकता ही खत्म हो जाए?
यदि समान शिक्षा, समान स्वास्थ्य, समान अवसर और समान प्रतियोगिता की व्यवस्था वास्तव में स्थापित हो जाती है, तो आरक्षण को स्थायी व्यवस्था बनाए रखने का तर्क भी कमजोर पड़ना चाहिए।
आरक्षण का अंतिम लक्ष्य आरक्षण को हमेशा बनाए रखना नहीं, बल्कि ऐसी बराबरी पैदा करना होना चाहिए जिसमें आरक्षण की जरूरत समाप्त हो जाए।
यही असली समानता है
समानता का अर्थ केवल यह नहीं कि किसी को एक निश्चित प्रतिशत सीट दे दी जाए।
समानता का अर्थ यह है कि हर बच्चा अच्छी शिक्षा पाए।
हर युवा अपनी प्रतिभा विकसित कर सके।
हर नागरिक को आगे बढ़ने का मौका मिले।
और सरकारी सेवा में अंतिम कसौटी हो—योग्यता, क्षमता, ईमानदारी और काम का परिणाम।
इसलिए अब बहस केवल यह नहीं होनी चाहिए कि आरक्षण रहेगा या जाएगा।
बहस यह होनी चाहिए—
सरकार ऐसी व्यवस्था कब बनाएगी जिसमें आरक्षण की जरूरत ही खत्म हो जाए?
यही सवाल आने वाले भारत की सबसे बड़ी नीतिगत बहस बन सकता है।
क्योंकि अंतिम मंजिल ‘आरक्षण वाला भारत’ नहीं, बल्कि ‘समान अवसर वाला भारत’ होना चाहिए।
— अवनीश त्यागी
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