बिजनौर में पुलिस बैरिकेडिंग के बाद भी क्यों नहीं रुके कांग्रेसी? जानिए क्या था हेनरीता राजीव सिंह का बड़ा प्लान
विशेष विश्लेषणात्मक रिपोर्ट: अवनीश त्यागी (TargetTvLive) बिजनौर | 04 अक्टूबर 2026
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से जागरूक भूमि बिजनौर की सड़कों पर रविवार को लोकतंत्र की मर्यादा और संवैधानिक संस्थाओं की साख को लेकर एक अभूतपूर्व सियासी जंग देखने को मिली। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के राष्ट्रव्यापी आह्वान के पहले चरण में जिला एवं शहर कांग्रेस कमेटी बिजनौर के संयुक्त बैनर तले उमड़े जनसैलाब ने यह साफ कर दिया कि विपक्षी खेमा अब रक्षात्मक राजनीति को पूरी तरह छोड़ चुका है। चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और ‘वोट चोरी’ के संगीन आरोपों को लेकर कांग्रेस ने सीधे देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे का मोर्चा खोल दिया है।
बैरिकेड्स बनाम जनआक्रोश: बिजनौर की सड़कों पर दिखा हाई-वोल्टेज ड्रामा
प्रदर्शन की शुरुआत जिला कांग्रेस मुख्यालय से हुई, जहाँ सुबह से ही कार्यकर्ताओं का जमावड़ा शुरू हो चुका था। जिलाध्यक्ष हेनरीता राजीव सिंह के कुशल नेतृत्व में जब कार्यकर्ताओं का जत्था हाथों में तिरंगे और पार्टी के झंडे लेकर विकास भवन स्थित डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा की ओर बढ़ा, तो बिजनौर पुलिस-प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए।
प्रशासन ने मार्च को दबाने के लिए मुख्यालय के बाहर ही बहुस्तरीय बैरिकेडिंग लगा रखी थी। लेकिन जैसे ही “लोकतंत्र बचाओ” और “वोट चोरी बंद करो” के गगनभेदी नारे गूंजे, कार्यकर्ताओं का आक्रोश पुलिसिया घेराबंदी पर भारी पड़ गया। प्रशासनिक दबाव और रुकावटों को दरकिनार करते हुए प्रदर्शनकारी रोडवेज बस स्टैंड तक जा पहुंचे। माहौल को बेकाबू होता देख प्रशासनिक आलाधिकारियों को खुद मोर्चा संभालना पड़ा और मौके पर ही ज्ञापन लेने के लिए विवश होना पड़ा।
संवैधानिक नैतिकता और जनाधिकार की लड़ाई: जिलाध्यक्ष का कड़ा रुख
रोडवेज चौक पर प्रशासनिक अधिकारियों को ज्ञापन सौंपने के बाद सभा को संबोधित करते हुए जिलाध्यक्ष हेनरीता राजीव सिंह ने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग पर तीखे हमले बोले। उन्होंने कहा कि निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत के संविधान की आत्मा हैं। जब जनता के मताधिकार की शुचिता पर ही संदेह के बादल मंडराने लगें, तो लोकतंत्र का पूरा ढांचा ही चरमराने लगता है।
हेनरीता राजीव सिंह ने स्पष्ट शब्दों में चेताया कि कांग्रेस द्वारा उठाए गए संवैधानिक सवालों का जवाब टालमटोल या दमनकारी रवैये से नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कहा, “यह प्रदर्शन किसी एक राजनीतिक दल की साख का सवाल नहीं, बल्कि देश के 140 करोड़ नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार को बचाने का महायज्ञ है। आज बिजनौर से उठी यह आवाज राष्ट्रव्यापी आंदोलन के प्रथम चरण का शंखनाद है, जिसे कांग्रेस का हर कार्यकर्ता अंतिम सांस तक गांव-गांव और घर-घर तक लेकर जाएगा।”
नौकरशाही के अनुभव और जमीनी जनाधार का अनूठा संगम
बिजनौर के इस विरोध-प्रदर्शन की सबसे बड़ी ताकत इसका नेतृत्व और इसमें शामिल चेहरों की विविधता रही। पूर्व वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी (rtd. IAS) श्री आर. के. सिंह की सक्रिय उपस्थिति ने आंदोलन को गहरा बौद्धिक और कानूनी आधार प्रदान किया।
संगठन के स्तर पर जिलाध्यक्ष हेनरीता राजीव सिंह के साथ जिला उपाध्यक्ष (संगठन) जावेद अंसारी, हुमायूं बैग, ठाकुर गौतम सिसोदिया, खालिद अंसारी, प्रशांत त्यागी, मुबशिर जमा खान, पीयूष त्रिपाठी, साजिद अली खान, मिसबाबुल हसन, फुरकान महमूद अंसारी और हुकुम सिंह ने मार्च को अनुशासित और आक्रामक बनाए रखा।
इसके साथ ही हाजी नसीम अंसारी, वसीम अकरम, मौ. सलीम, हरि सिंह सागर, जसराम सिंह, अहसन जमील, विश्वमोहन, अजीम अंसारी, निजामुद्दीन, गुरमुख सिंह, हिमांशु देवरा, रतिराम सिंह, राम रतन सिंह, कमरुन्निशा, हरिराज, चांद चौधरी, सलेकचंद, होशियार सिंह, अतुल कुमार, साजिदा बेगम, महेश कुमार, अर्जुन सिंह, रईस अहमद, फारूक खान, शमीम ग़यूर, अमित कुमार, राजेंद्र कुमार, शारिक अली, गुलसिताब, फहीम अख्तर, जफर मालिक, इदरीस अहमद, रेयान सिद्दीकी, रोहित कुमार, नईम अहमद, इमरान अंसारी, तनवीर अहमद, लताफत हुसैन, भानु प्रकाश, सतेंद्र सिंह, नीरज कुमार, गफ्फार, रकीब आलम, एम. ए. खान, राज कुमार, मुकुल और समीर खान समेत समाज के हर वर्ग और वर्ग-विशेष का प्रतिनिधित्व करने वाले सैकड़ों समर्पित कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने यह साबित किया कि यह आक्रोश धरातल पर कितना गहरा है।
TargetTvLive का राजनीतिक विश्लेषण: अवनीश त्यागी की कलम से
इस पूरे घटनाक्रम का यदि निष्पक्ष और गहराई से राजनीतिक विश्लेषण किया जाए, तो बिजनौर की यह घटना पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिए तीन बड़े और स्पष्ट संकेत देती है:
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- चुनावी विश्वसनीयता का केंद्रीय नैरेटिव: कांग्रेस ने ‘वोट चोरी’ और ‘संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता’ को सीधे आम जनता के दैनिक अधिकारों से जोड़ दिया है। यह रणनीति विपक्षी दल को सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं, बल्कि ‘लोकतंत्र के रक्षक’ के रूप में स्थापित करने का प्रयास है।
- प्रशासनिक तंत्र को स्पष्ट संदेश: पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़कर रोडवेज तक पहुंचना बिजनौर कांग्रेस के कैडर में आए नए राजनीतिक पुनर्जागरण को दर्शाता है। इससे यह साफ है कि आने वाले दिनों में पश्चिमी यूपी में सड़कों पर संघर्ष और तेज होगा।
- संस्थागत सुधारों पर दबाव: सीधे मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) के इस्तीफे पर अड़ जाना यह दर्शाता है कि कांग्रेस अब किसी मध्यम मार्ग या औपचारिक बयानों से संतुष्ट होने वाली नहीं है; वह चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में बुनियादी और कानूनी बदलाव की लड़ाई को निर्णायक मोड़ पर ले जाना चाहती है।












