सुखरो वियर के सामने नदी पाटकर खनन की तैयारी? जलप्रवाह से छेड़छाड़ ने बढ़ाई सिंचाई विभाग की चिंता

तकनीकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र में भारी डम्परों की आवाजाही का आरोप; वियर, अप्रोच, सेवा मार्ग और सप्लाई चैनल की सुरक्षा पर उठे सवाल

अवनीश त्यागी
Target TV Live | विशेष विश्लेषण
बिजनौर। नगीना तहसील क्षेत्र में सिंचाई व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण सुखरो वियर के ठीक सामने सुखरो नदी में कथित रूप से खनन के लिए रास्ता बनाए जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि नदी के प्रवाह को बाधित करने के लिए नदी के हिस्से को पाटकर भारी खनन वाहनों के आवागमन का रास्ता तैयार किया जा रहा है।
मामला इसलिए सामान्य खनन गतिविधि से कहीं अधिक गंभीर माना जा रहा है क्योंकि संबंधित स्थान सिंचाई संरचना और जलप्रवाह के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र में बताया जा रहा है। यदि नदी की धारा को कृत्रिम रूप से मोड़ा या रोका जाता है, तो इसका असर केवल खनन क्षेत्र तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि वियर की हाइड्रोलिक कार्यप्रणाली, जल भंडारण, सिल्ट जमाव, सप्लाई चैनल और किसानों तक पहुंचने वाले सिंचाई जल पर भी पड़ सकता है।
क्या है सुखरो वियर और क्यों महत्वपूर्ण है?
सुखरो वियर को सरल भाषा में नदी पर बनी ऐसी जल नियंत्रण संरचना समझा जा सकता है, जिसका उद्देश्य नदी के प्रवाह को नियंत्रित करते हुए आवश्यक स्तर तक पानी रोकना और उसे सिंचाई प्रणाली की ओर ले जाना होता है।
यह पारंपरिक अर्थों में बड़ा बैराज नहीं है, लेकिन इसका काम सिंचाई व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है। वियर के माध्यम से नदी के पानी का स्तर नियंत्रित कर उसे सप्लाई चैनल की ओर मोड़ा जाता है, जिससे कृषि क्षेत्र को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराया जाता है।
यही कारण है कि वियर के अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में नदी के प्राकृतिक प्रवाह से छेड़छाड़ तकनीकी दृष्टि से संवेदनशील मानी जाती है।
नदी का रास्ता पाटने से क्या बदल सकता है हाइड्रोलिक सिस्टम?
नदी का प्रवाह अपने प्राकृतिक तल और ढाल के अनुसार चलता है। जब किसी स्थान पर मिट्टी, मलबे या अन्य सामग्री डालकर नदी की धारा को संकरा अथवा बाधित किया जाता है तो पानी का प्रवाह क्षेत्र बदल सकता है।
इससे कुछ परिस्थितियों में—
- पानी का स्तर अचानक बढ़ सकता है,
- धारा दूसरी दिशा में कटाव कर सकती है,
- नदी तल में सिल्ट और गाद का जमाव बढ़ सकता है,
- वियर तक पहुंचने वाले पानी की मात्रा और प्रवाह-पैटर्न बदल सकता है,
- संरचना पर असमान जलदाब पड़ सकता है,
- डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में कटाव का खतरा बढ़ सकता है।
हालांकि वास्तविक खतरे की गंभीरता का निर्धारण स्थलीय निरीक्षण, नदी तल की स्थिति, जलप्रवाह, संरचना की डिजाइन और तकनीकी मानकों के आधार पर ही किया जा सकता है।
खनन के लिए रास्ता बना तो सबसे बड़ा सवाल भारी डम्परों का
संबंधित पक्ष का आरोप है कि नदी को पाटने का उद्देश्य खनन क्षेत्र तक बड़े डम्परों की आवाजाही के लिए रास्ता तैयार करना है।
यहीं से दूसरा तकनीकी सवाल पैदा होता है।
सिंचाई परियोजनाओं में सेवा मार्ग केवल सामान्य ग्रामीण सड़क नहीं होता। इसका इस्तेमाल विभागीय निरीक्षण, रखरखाव, मरम्मत, मशीनरी और आपातकालीन पहुंच के लिए किया जाता है।
यदि इस मार्ग पर लगातार भारी क्षमता वाले डम्पर चलेंगे तो सड़क की ऊपरी परत के साथ-साथ उसके नीचे की सबग्रेड और एम्बैंकमेंट पर भी भार पड़ सकता है। बरसात अथवा जलभराव की स्थिति में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
परिणामस्वरूप सड़क टूटने, किनारों के धंसने और भविष्य में विभागीय मशीनरी की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है।
वियर के पुनरुद्धार के बीच खनन गतिविधि क्यों चिंता का विषय?
बताया गया है कि सुखरो वियर का पुनरुद्धार कार्य वर्तमान में चल रहा है। ऐसे में निर्माण अथवा पुनरुद्धाराधीन जल संरचना के आसपास नदी तल में बड़े पैमाने पर भू-आकृति परिवर्तन या भारी वाहनों की आवाजाही अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकती है।
किसी भी हाइड्रोलिक स्ट्रक्चर के पुनरुद्धार के दौरान उसकी फाउंडेशन, एप्रोच, एम्बैंकमेंट, पिचिंग, नदी तल और जलप्रवाह की स्थिति का महत्व बढ़ जाता है।
यदि इसी अवधि में आसपास अनियंत्रित खुदाई अथवा नदी की धारा में बदलाव होता है तो तकनीकी रूप से यह जांचना जरूरी हो जाता है कि उसका पुनरुद्धार कार्य की स्थिरता पर कोई प्रभाव तो नहीं पड़ रहा।
पिछले साल भी सेवा मार्ग क्षतिग्रस्त होने का दावा
सिंचाई विभाग से जुड़े पक्ष के अनुसार पिछले वर्ष भी खनन गतिविधियों के लिए सेवा मार्ग का इस्तेमाल किए जाने और उसके क्षतिग्रस्त होने की स्थिति सामने आई थी। विभाग द्वारा संबंधित लोगों पर अर्थदंड निर्धारित किए जाने की बात भी कही गई है।
यदि यह दावा अभिलेखों से पुष्ट होता है तो वर्तमान मामले में यह महत्वपूर्ण सवाल बन जाता है कि पिछली कार्रवाई के बावजूद उसी क्षेत्र में फिर वही गतिविधि कैसे शुरू हुई?
सिंचाई विभाग की तकनीकी आपत्ति भी महत्वपूर्ण
विभागीय इंजीनियर्स के हवाले से बताया गया है कि सिंचाई संरचना के निकट खनन पट्टे के लिए विभाग द्वारा अनुशंसा नहीं की जाती और इस वर्ष भी ऐसी अनुशंसा नहीं किए जाने की बात कही गई है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी क्षेत्र में खनन की वैधता केवल किसी एक विभाग के कथन से तय नहीं होती। इसके लिए संबंधित खनन पट्टा, स्वीकृत क्षेत्र, पर्यावरणीय/प्रशासनिक अनुमति, सीमांकन और लागू नियमों की जांच आवश्यक होगी।
इसलिए पूरे मामले में मौके का संयुक्त निरीक्षण और अभिलेखीय सत्यापन बेहद जरूरी है।
जेई की चेतावनी के बावजूद गतिविधि जारी रहने का आरोप
संबंधित जूनियर इंजीनियर के अनुसार खननकर्ताओं को मौखिक रूप से कई बार समझाया गया, लेकिन गतिविधि बंद नहीं हुई।
यदि विभागीय अधिकारी मौके पर पहुंचने पर खनन गतिविधि बंद और उनके लौटते ही दोबारा शुरू होने का आरोप सही है, तो यह सामान्य निगरानी व्यवस्था से आगे का विषय है। ऐसी स्थिति में केवल मौखिक चेतावनी के बजाय पंचनामा, जीपीएस आधारित लोकेशन, फोटो-वीडियोग्राफी, मशीनों/वाहनों का विवरण और वैधानिक कार्रवाई अधिक प्रभावी हो सकती है।
खनन विभाग की भूमिका पर भी उठे सवाल
मामले की जानकारी खनन अधिकारी बिजनौर को दिए जाने की बात कही गई है। इसके बावजूद यदि नदी के प्रवाह और सिंचाई संरचना के निकट गतिविधि जारी रहने का आरोप है तो संबंधित विभाग से यह स्पष्ट होना चाहिए कि—
क्या मौके का निरीक्षण हुआ?
खनन क्षेत्र का सीमांकन कराया गया या नहीं?
खनन पट्टा वास्तव में किस स्थान पर है?
क्या नदी के भीतर अथवा सिंचाई संरचना के सुरक्षा क्षेत्र में गतिविधि हो रही है?
क्या भारी वाहनों के लिए सिंचाई विभाग के सेवा मार्ग का इस्तेमाल अधिकृत है?
इन सवालों का जवाब ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकता है।
नदी का रास्ता बनाम खनन का रास्ता—किसे मिलेगी प्राथमिकता?
सुखरो वियर प्रकरण में सबसे अहम प्रश्न यही है कि खनन गतिविधि के लिए रास्ता बनाने की कीमत क्या सिंचाई व्यवस्था को चुकानी पड़ेगी?
यदि नदी का प्राकृतिक प्रवाह रोककर या बदलकर खनन वाहनों के लिए अस्थायी रास्ता तैयार किया जाता है, तो अल्पकाल में यह रास्ता भले ही सुविधाजनक दिखाई दे, लेकिन दीर्घकाल में नदी तल, कटाव, गाद जमाव और जल नियंत्रण संरचना पर इसके प्रभाव का आकलन जरूरी है।
किसानों के लिए पानी पहुंचाने वाली संरचना के मामले में कुछ मीटर नदी का रास्ता बदलना भी केवल मिट्टी हटाने या भरने का मामला नहीं होता; यह पूरे हाइड्रोलिक सिस्टम के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।
अब जरूरत ‘मौके की जांच’ नहीं, तकनीकी सत्यापन की
इस मामले में आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर प्रशासन को संयुक्त तकनीकी निरीक्षण कराना चाहिए। निरीक्षण में कम से कम निम्न बिंदुओं की जांच महत्वपूर्ण होगी—
- सुखरो वियर से खनन स्थल की वास्तविक दूरी।
- वियर के अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम में नदी की वर्तमान स्थिति।
- क्या नदी के प्राकृतिक प्रवाह को मिट्टी/मलबे से बाधित किया गया है।
- खनन क्षेत्र और स्वीकृत पट्टे की वास्तविक सीमाएं।
- सप्लाई चैनल के सेवा मार्ग पर भारी वाहनों की आवाजाही।
- सेवा मार्ग और एम्बैंकमेंट की वर्तमान संरचनात्मक स्थिति।
- वियर के पुनरुद्धार कार्य पर संभावित प्रभाव।
- खनन से नदी तल की गहराई और प्रवाह-पैटर्न में संभावित बदलाव।
- पिछले वर्ष की कार्रवाई और अर्थदंड से संबंधित अभिलेख।
- मौके की जीपीएस लोकेशन और फोटो-वीडियो साक्ष्य।
संदर्भ में खान अधिकारी का कहना है कि आज मौके पर जाकर टीम निरीक्षण करेगी, तभी वस्तुस्थिति का पता कर कार्रवाई अमल में लाई जाएगी, वही उप जिलाधिकारी नगीना, प्रिंस कुमार द्वारा भी निरीक्षण करने की बात कही गई है
सवाल सिर्फ खनन का नहीं, किसानों के पानी का है
सुखरो वियर के सामने कथित खनन गतिविधि की जांच इसलिए जरूरी है क्योंकि यहां दांव केवल राजस्व या खनन से जुड़े नियमों का नहीं है। सवाल उस सिंचाई व्यवस्था का है जिससे कृषि भूमि तक पानी पहुंचाया जाता है।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो नदी के प्रवाह और सिंचाई संरचना के साथ किसी भी तरह की अनधिकृत छेड़छाड़ को तत्काल रोका जाना चाहिए। वहीं यदि खनन गतिविधि नियमों के अनुरूप है तो संबंधित विभाग को मौके की स्थिति और अनुमतियों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए।
क्योंकि नदी का प्रवाह रोककर बनाया गया रास्ता कुछ समय के लिए खनन का रास्ता जरूर बन सकता है, लेकिन यदि उसी प्रक्रिया में सिंचाई संरचना की सुरक्षा प्रभावित हुई तो इसकी कीमत आखिरकार खेत और किसान ही चुकाएंगे।













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