Target Tv Live

जीवंत होली उत्सव की साक्षी: बड़वा की समृद्ध होली परंपरा

 जीवंत होली उत्सव की साक्षी:       बड़वा की समृद्ध होली परंपरा

लेखन : डॉ. सत्यवान सौरभ

संपादन : अवनीश त्यागी 

हरियाणा के भिवानी जिले का बड़वा गांव अपनी अनूठी होली परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां का होली उत्सव न केवल रंगों का पर्व है, बल्कि संगीत, नृत्य, और सामूहिक उत्साह का एक ऐसा समागम है, जो बसंत पंचमी से शुरू होकर गणगौर तक पूरे डेढ़ महीने तक गांव को एक सांस्कृतिक रंगमंच में बदल देता है।

डफ की गूंज से बसंत पंचमी का शुभारंभ

गांव के ऐतिहासिक झांग आश्रम से होली की शुरुआत होती है, जहां बसंत पंचमी पर सबसे बड़ी डफ मंडली अपने जीवंत धमाल नृत्य से उत्सव का शंखनाद करती है। यह ऊर्जावान जुलूस आश्रम से निकलकर गांव की गलियों और चौपालों में घूमता है, जिससे हर गली, हर नुक्कड़ में उत्सव की लहर दौड़ जाती है।

बाबा रामदेव मेला मंदिर की भव्य डफ प्रतियोगिता

होली के दौरान बाबा रामदेव मेला मंदिर में डफ प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है, जिसमें उत्तर भारत की शीर्ष टीमें भाग लेती हैं। ये टीमें अपनी बेहतरीन डफ और धमाल प्रस्तुतियों से रातभर समां बांधती हैं। पूरा गांव मंदिर परिसर में इकट्ठा होकर इस सांस्कृतिक महोत्सव का आनंद लेता है, और विजेता टीम को नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाता है।

राजपूत गढ़ में भाईचारे की होली

बड़वा के राजपूत परिवार बसंत पंचमी से होली का उत्सव शुरू करते हैं। पुरुष डफ बजाते हैं, और अन्य समुदायों के लोग भी मिलकर लोकगीतों और नृत्यों से उत्सव की रौनक बढ़ाते हैं। गुलाल और अबीर की वर्षा के बीच गांव के हर घर में उल्लास की बयार बहती है।

कोरडा मार होली की अनूठी परंपरा

फाग के दौरान गांव के मुख्य चौराहों पर हरियाणा की कोरडा मार होली खेली जाती है, जो आज कई जगहों पर लुप्त हो रही है। देवर-भाभी की मस्ती से भरी इस परंपरा में, भाभियां देवरों को कोरडे (चमड़े की रस्सी) से मज़ाकिया अंदाज में मारती हैं, और देवर पानी के टब में गिरकर खुद को बचाने की कोशिश करते हैं। इस नजारे के बीच गांव के लोक कलाकार ढोल, झांझ और बांसुरी की धुन पर धमाल मचाते हैं, जिससे पूरे माहौल में उत्साह चरम पर पहुंच जाता है।

होलिका दहन: बुराई पर अच्छाई की जीत

फाग से एक दिन पहले, ग्रामीण गुलिया और रोहसड़ा चौराहे पर इकट्ठा होकर होलिका स्थापना करते हैं। शाम को शुभ मुहूर्त में होलिका दहन किया जाता है, और लोग अग्नि के चारों ओर नृत्य करते हुए नकारात्मकता को जलाकर नई ऊर्जा के साथ जीवन में आगे बढ़ने की कामना करते हैं।

जल संरक्षण और पर्यावरण-अनुकूल होली

समय के साथ, बड़वा की सामाजिक संस्थाओं ने गुलाल तिलक और फूलों की होली का रिवाज शुरू किया है, जिससे जल संरक्षण का संदेश दिया जाता है। इससे गांव के लोग हानिकारक रसायनों से बचते हैं और एक स्वस्थ, पर्यावरण-अनुकूल उत्सव मनाते हैं।

सांस्कृतिक धरोहर को सहेजती होली

बड़वा की होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर है, जो पूरे साल की थकान को मिटाकर लोगों को एकजुट करती है। यहां की होली में सम्मान और सभ्यता के साथ रंग खेला जाता है, जिससे हर व्यक्ति खुद को त्योहार का अभिन्न हिस्सा महसूस करता है।

बड़वा गांव की होली एक सांस्कृतिक उत्सव है, जहां परंपरा, कला और सामूहिक उल्लास की त्रिवेणी बहती है। आज भी, जब मनोरंजन के आधुनिक साधन उपलब्ध हैं, बड़वा के लोग अपनी मूल संस्कृति को उतनी ही निष्ठा और गर्व के साथ जीवित रखते हैं। यह उत्सव न केवल भाईचारे और एकता की मिसाल है, बल्कि हमें सिखाता है कि अपनी जड़ों से जुड़ा रहना कितना जरूरी है।

“बड़वा की होली हमें यह एहसास कराती है कि जब संगीत, नृत्य और रंग एक साथ आते हैं, तो त्योहार महज एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव बन जाता है।”


– डॉ. सत्यवान सौरभ
कवि, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनलिस्ट

Leave a Comment

यह भी पढ़ें