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गिद्धों की वापसी: बिजनौर के जंगलों से प्रकृति के पुनर्जागरण की कहानी

गिद्धों की वापसी: बिजनौर के जंगलों से प्रकृति के पुनर्जागरण की कहानी

https://youtu.be/H6-OXhVgVLE?si=Y0E3OBvR9hcVGqq9
बिजनौर। धामपुर क्षेत्र के रैनी जंगलों में 100 से अधिक गिद्धों का एक साथ दिखाई देना केवल एक सामान्य जैव विविधता की घटना नहीं है — यह प्रकृति के संतुलन की ओर लौटने का एक शक्तिशाली संकेत है। 30 साल बाद इस क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में गिद्धों की उपस्थिति पर्यावरणीय संतुलन, मानव हस्तक्षेप के प्रभाव, और संरक्षण प्रयासों की जटिल परतों को उजागर करती है। यह घटना न केवल पक्षी प्रेमियों के लिए उत्साहजनक है, बल्कि यह पूरे पारिस्थितिक तंत्र के लिए एक आशा की किरण है। आइए, इस विषय को गहराई से समझने की कोशिश करें।

गिद्धों की भूमिका: प्रकृति के ‘अदृश्य रक्षक’

गिद्ध पारिस्थितिक तंत्र के महत्वपूर्ण अंग हैं। वे मृत जानवरों को खाकर प्राकृतिक सफाईकर्मी का काम करते हैं, जिससे कई घातक बीमारियों का प्रसार रुकता है। अगर ये न हों, तो शव सड़ने से एंथ्रेक्स, रेबीज, और ब्रुसेलोसिस जैसी बीमारियां तेजी से फैल सकती हैं। गिद्धों की घटती संख्या ने पहले ही कई क्षेत्रों में बीमारी और प्रदूषण की समस्या को बढ़ा दिया था। बिजनौर में इनका लौटना इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्र का पारिस्थितिक तंत्र धीरे-धीरे पुनर्जीवित हो रहा है।

विलुप्ति के कगार तक का सफर

1990 के दशक तक गिद्ध भारत में आम दृश्य थे। गांवों, खेतों और जंगलों में बड़ी संख्या में ये पक्षी देखे जा सकते थे। लेकिन 2000 के दशक की शुरुआत तक गिद्ध लगभग गायब हो गए। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण डाइक्लोफिनेक दवा थी, जो मवेशियों के लिए दर्द निवारक के रूप में इस्तेमाल होती थी। मवेशियों की मृत्यु के बाद, जब गिद्ध उनके शव खाते थे, तो यह दवा उनके शरीर में जाकर किडनी फेलियर का कारण बनती थी। इस दवा के प्रभाव से गिद्धों की 95-98% आबादी खत्म हो गई।

सरकार ने 2006 में डाइक्लोफिनेक पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन तब तक नुकसान इतना बड़ा था कि गिद्ध केवल कुछ आरक्षित जंगलों तक सिमट गए थे। बिजनौर के अमानगढ़ रिजर्व फॉरेस्ट में गिद्धों की आखिरी शरणस्थली बची थी, जहां इनकी संख्या केवल 165 के आसपास थी। ऐसे में, 50 किलोमीटर दूर रैनी जंगल में 100 गिद्धों का झुंड देखना एक अप्रत्याशित लेकिन बेहद सुखद घटना है।

प्राकृतिक आवास का संकट और वनों की भूमिका

गिद्ध आमतौर पर ऊंचे, घने पेड़ों — विशेषकर सेमल के पेड़ों — पर घोंसला बनाते हैं। लेकिन पिछले दशकों में जंगलों की कटाई और शहरीकरण ने उनके आवासों को नष्ट कर दिया। गिद्धों के लौटने का यह संकेत हमें याद दिलाता है कि जंगलों की रक्षा और पुनर्वनीकरण कितना जरूरी है। बिजनौर के वन विभाग को अब इस क्षेत्र में सेमल और अन्य विशाल वृक्षों के संरक्षण और रोपण पर जोर देना चाहिए, ताकि गिद्धों को स्थायी आवास मिल सके।

संरक्षण प्रयासों की अहमियत

गिद्धों की वापसी को सुनिश्चित करने के लिए केवल डाइक्लोफिनेक पर प्रतिबंध लगाना काफी नहीं है। इसके लिए स्थानीय समुदायों को जागरूक करना, वन क्षेत्र को सुरक्षित करना और गिद्धों के लिए अनुकूल पर्यावरण तैयार करना भी जरूरी है। भारत में कुछ जगहों पर “वल्चर रेस्टोरेंट्स” (जहां गिद्धों के लिए सुरक्षित, दवा-मुक्त मृत जानवरों की व्यवस्था की जाती है) की सफलता को देखते हुए, बिजनौर में भी इस तरह की पहल से गिद्धों की संख्या को स्थिर करने में मदद मिल सकती है।

पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्जन्म का प्रतीक

गिद्धों की वापसी सिर्फ पक्षी विज्ञान की दृष्टि से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह संकेत देता है कि बिजनौर की पारिस्थितिकी धीरे-धीरे पुनर्जीवित हो रही है। गिद्धों की उपस्थिति का मतलब है कि मृत जीवों का प्राकृतिक निपटान हो रहा है, जिससे रोगों का प्रसार रुक रहा है और जैव विविधता को संरक्षण मिल रहा है।

बिजनौर के डीएफओ ज्ञान सिंह ने कहा, “गिद्धों का लौटना एक सकारात्मक संकेत है। यह दर्शाता है कि संरक्षण प्रयासों का असर दिख रहा है। हम अब इन पक्षियों के दीर्घकालिक संरक्षण और संवर्धन के लिए योजनाएं बना रहे हैं।”

आगे की राह: दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत

गिद्धों की इस वापसी को स्थायी बनाने के लिए सरकार, वन विभाग, पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों को एकजुट होकर काम करना होगा। यह जरूरी है कि:

  • वन क्षेत्र की सुरक्षा: अवैध कटाई पर सख्त नियंत्रण और सेमल जैसे महत्वपूर्ण वृक्षों का संरक्षण।
  • सुरक्षित आहार उपलब्धता: गिद्धों के लिए दवा-मुक्त मृत जानवरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विशेष क्षेत्र (वल्चर रेस्टोरेंट्स) विकसित करना।
  • समुदाय सहभागिता: स्थानीय लोगों को गिद्धों के पारिस्थितिक महत्व के बारे में जागरूक करना और उन्हें संरक्षण प्रयासों में शामिल करना।
  • निगरानी और शोध: गिद्धों की संख्या, घोंसले बनाने के पैटर्न और उनके आवासों की नियमित निगरानी के लिए वैज्ञानिक अध्ययन और संरक्षण परियोजनाओं की शुरुआत।

निष्कर्ष: आशा की उड़ान

बिजनौर के जंगलों में गूंजती गिद्धों की आवाज सिर्फ एक पक्षी की वापसी की नहीं, बल्कि प्रकृति की सहनशीलता और पुनर्जीवन की कहानी है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि अगर हम समय पर हस्तक्षेप करें, तो पारिस्थितिकीय संतुलन को बहाल किया जा सकता है। गिद्धों का यह झुंड केवल पंख फैलाए हुए पक्षी नहीं हैं — वे एक संदेश हैं कि यदि हम प्रकृति के साथ मिलकर चलें, तो जीवन हमेशा अपनी राह ढूंढ ही लेता है।

 

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