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बिजनौर की सियासत: सुरक्षा, विकास और सांस्कृतिक पहचान की मांगें तेज़

बिजनौर की सियासत: सुरक्षा, विकास और सांस्कृतिक पहचान की मांगें तेज़

BIJNOR. बिजनौर जिले में हाल के दिनों में राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों की हलचल तेज़ हो गई है। एक तरफ़ आज़ाद समाज पार्टी (आसपा) के कार्यकर्ता अपने नेता चन्द्रशेखर आजाद की सुरक्षा को लेकर आक्रोशित हैं, तो दूसरी ओर गंगा एक्सप्रेसवे को बिजनौर से जोड़ने की मांग ज़ोर पकड़ रही है। वहीं, नगर पालिका परिषद ने 56वें स्थापना दिवस पर विकास कार्यों की प्रतिबद्धता दोहराई। इन घटनाओं से साफ़ है कि बिजनौर की राजनीति अब सुरक्षा, विकास और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के तीन प्रमुख मुद्दों के इर्द-गिर्द घूम रही है।

चन्द्रशेखर आजाद पर हमले से सुलगा आक्रोश

बुलंदशहर में सांसद चन्द्रशेखर आजाद पर हमले के विरोध में आसपा कार्यकर्ताओं ने बिजनौर कलेक्ट्रेट पर धरना दिया। उन्होंने राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन सौंपते हुए हमलावरों की गिरफ्तारी और चन्द्रशेखर को ‘Z’ श्रेणी की सुरक्षा देने की मांग की। प्रदर्शन के दौरान किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा आजाद के खिलाफ की गई अभद्र टिप्पणी ने माहौल को और गरमा दिया। पुलिस के हस्तक्षेप से मामला शांत हुआ, लेकिन इस घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया कि दलित नेतृत्व और उनकी सुरक्षा बिजनौर के राजनीतिक विमर्श का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

गंगा एक्सप्रेस वे: विकास का सपना या राजनीतिक तकरार?

गंगा एक्सप्रेस वे को बिजनौर से जोड़ने की मांग ने स्थानीय स्तर पर एक नया जनआंदोलन खड़ा कर दिया है। पूर्व सांसद शीशराम सिंह रवि ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भेंट कर एक्सप्रेसवे के बिजनौर से गुजरने की अपील की। उन्होंने तर्क दिया कि इससे क्षेत्र का औद्योगिक और पर्यटन विकास होगा, साथ ही उत्तराखंड के कई शहरों को यातायात में सहूलियत मिलेगी। वहीं, भारतीय किसान यूनियन के नेताओं ने दावा किया कि अभी तक गंगा एक्सप्रेस वे के मार्ग को लेकर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है। इससे साफ़ है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाज़ी और ज़मीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर है।

स्थानीय विकास की नई उम्मीदें

इसी बीच, किरतपुर नगर पालिका परिषद ने 56वें स्थापना दिवस पर आंगनबाड़ी केंद्रों को घरेलू गैस सिलेंडर, चूल्हा और बर्तन बांटने जैसी योजनाओं के ज़रिए स्थानीय विकास की दिशा में एक सकारात्मक पहल की। चेयरमैन अब्दुल मन्नान ने जनता से किए वादों को पूरा करने और विकास की गति तेज़ करने का संकल्प दोहराया।

सांस्कृतिक विरासत के लिए पहल

पूर्व सांसद शीशराम सिंह रवि ने गुरु रविदास मंदिर और रविदास पीठ की स्थापना की मांग उठाकर बिजनौर की सांस्कृतिक पहचान को भी नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की है। इस पहल से दलित समाज को न केवल सांस्कृतिक शक्ति मिलेगी, बल्कि क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकता है।

आगे की राह

बिजनौर में इन सभी मुद्दों की गूंज आने वाले चुनावों तक बनी रह सकती है। एक ओर जहां चन्द्रशेखर आजाद जैसे युवा दलित नेताओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण की मांग है, वहीं दूसरी ओर गंगा एक्सप्रेसवे जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से विकास की उम्मीदें भी टिकी हैं। इन सबके बीच स्थानीय प्रशासन और जनता के बीच संवाद और पारदर्शिता ज़रूरी है, ताकि बिजनौर को वास्तव में एक बेहतर भविष्य की ओर ले जाया जा सके।

बिजनौर की सियासत अब सिर्फ़ नारों की नहीं, बल्कि ज़मीनी मुद्दों की लड़ाई बन चुकी है। देखना होगा कि आने वाले समय में ये संघर्ष क्या रंग लाता है — विकास की नई सुबह या फिर पुराने वादों का अंधेरा ?

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