पचास साल बाद होने वाली परिसीमन की संभावनाएँ और चुनौतियाँ
विश्लेषक : सत्यवान सौरभ

संपादन : अवनीश त्यागी
संपादकीय टिप्पणी
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में परिसीमन (Delimitation) एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों, संघीय ढांचे और क्षेत्रीय संतुलन को गहराई से प्रभावित करता है। डॉ. सत्यवान सौरभ के लेख में इस विषय की जटिलताओं को विस्तार से समझाया गया है। परिसीमन की प्रक्रिया न केवल सीटों के पुनर्वितरण तक सीमित है, बल्कि यह देश की राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक संतुलन और सामाजिक एकता को भी आकार दे सकती है। आइए, इस पूरे परिदृश्य को विस्तार से समझने की कोशिश करें।
लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता

भारत की जनसंख्या 1971 से कई गुना बढ़ चुकी है, लेकिन लोकसभा की सीटों की संख्या 543 पर स्थिर है। इससे निर्वाचन क्षेत्रों का आकार इतना बड़ा हो गया है कि सांसदों के लिए सभी नागरिकों की समस्याओं को सुनना और प्रभावी ढंग से समाधान देना कठिन हो गया है। यदि सीटों की संख्या 800 या उससे अधिक कर दी जाए, तो यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करेगा और स्थानीय स्तर पर नीति क्रियान्वयन को बेहतर बनाएगा।
छोटे निर्वाचन क्षेत्र और बेहतर जुड़ाव
छोटे निर्वाचन क्षेत्रों से सांसदों को जमीनी हकीकत समझने में आसानी होगी। इससे विकास योजनाओं की निगरानी बेहतर होगी, और सरकार की जवाबदेही भी बढ़ेगी। उदाहरण के लिए, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बड़े निर्वाचन क्षेत्रों के कारण संसाधनों का असमान वितरण देखने को मिलता है, जिसे परिसीमन के जरिए सुधारा जा सकता है।
उत्तर-दक्षिण असंतुलन की चुनौती
भारत के जनसांख्यिकीय परिदृश्य में उत्तर और दक्षिण के राज्यों के बीच एक स्पष्ट अंतर है। उत्तर भारत के राज्यों — जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश — में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, जबकि दक्षिण के राज्यों — जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक — ने सफलतापूर्वक जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है। परिसीमन के बाद यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का आवंटन किया गया, तो दक्षिण के राज्यों को अपने कुशल प्रशासन के बावजूद नुकसान हो सकता है।
प्रगतिशील राज्यों की चिंता
तमिलनाडु और केरल जैसे राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य, और सामाजिक विकास में अग्रणी हैं। यदि उनके संसदीय सीटों की संख्या घटती है, तो नीति-निर्माण में उनका प्रभाव कम हो सकता है। इससे अन्य राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में काम करने की प्रेरणा भी कम हो सकती है, जिससे भारत के दीर्घकालिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
संतुलित दृष्टिकोण की ज़रूरत
यहाँ एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें जनसंख्या के अलावा विकास सूचकांक, आर्थिक योगदान, और शासन प्रभावशीलता जैसे कारकों को भी ध्यान में रखा जाए। इससे उन राज्यों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलेगा, जिन्होंने जनसंख्या को नियंत्रित करते हुए विकास की नई मिसाल कायम की है।
संघीय ढांचे पर असर और सहकारी संघवाद की भूमिका
भारत एक संघीय लोकतंत्र है, जहाँ केंद्र और राज्य दोनों की स्वायत्तता महत्वपूर्ण है। यदि परिसीमन के कारण कुछ बड़े राज्यों को अत्यधिक शक्ति मिल जाती है, तो इससे संघीय ढांचे की स्थिरता पर असर पड़ सकता है।
संभावित राजनीतिक अस्थिरता
उत्तर भारत के बड़े राज्यों को ज़्यादा सीटें मिलने से केंद्रीय नीतियाँ क्षेत्रीय आवश्यकताओं की अनदेखी कर सकती हैं। इससे दक्षिण, पूर्वोत्तर, और छोटे राज्यों के विकास एजेंडा हाशिए पर आ सकते हैं। इससे क्षेत्रीय असंतोष बढ़ सकता है, जो देश की एकता के लिए हानिकारक हो सकता है।
संभावित समाधान: द्विस्तरीय प्रतिनिधित्व
इस समस्या का समाधान राज्यसभा की शक्तियों को बढ़ाकर या “वेटेड वोटिंग” जैसी प्रणाली अपनाकर किया जा सकता है। इससे छोटे या विकसित राज्यों की आवाज़ संसद में बनी रहेगी, और राष्ट्रीय नीतियाँ अधिक संतुलित और समावेशी होंगी।
विकास और आर्थिक योगदान को मान्यता
सिर्फ जनसंख्या नहीं, बल्कि राज्यों के आर्थिक योगदान और विकास मापदंडों को भी परिसीमन में शामिल करना चाहिए। जो राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और सतत विकास लक्ष्यों (SDG) में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, उन्हें अतिरिक्त प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। इससे “अच्छे शासन” को प्रोत्साहन मिलेगा और अन्य राज्य भी विकास-केन्द्रित नीतियों को अपनाने के लिए प्रेरित होंगे।
क्रमिक दृष्टिकोण और परामर्श की ज़रूरत
2031 की जनगणना के बाद परिसीमन एक बड़ा कदम होगा, इसलिए इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करना जरूरी है। इसके लिए एक राष्ट्रीय परिसीमन आयोग का गठन होना चाहिए, जो सभी राज्यों के हितधारकों से परामर्श करे। अंतर-राज्य परिषद को इस प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए, ताकि किसी भी राज्य को महसूस न हो कि उसके साथ अन्याय हो रहा है।
भविष्य की दिशा: एक संतुलित और समावेशी भारत
भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी विविधता में है। परिसीमन एक ऐतिहासिक अवसर है, जो हमें इस विविधता को सम्मान देने का मौका देता है। एक संतुलित परिसीमन प्रक्रिया, जो जनसंख्या, विकास, और संघीय संरचना के बीच संतुलन साधे, वह भारत को और अधिक एकजुट और मजबूत बना सकती है।
यदि परिसीमन की योजना अच्छी तरह बनाई जाए, और इसमें नवाचार और संवेदनशीलता का समावेश हो, तो यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को अगले पचास वर्षों के लिए मज़बूत कर सकता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी राज्य, चाहे वह जनसंख्या में बड़ा हो या विकास में अग्रणी, अपनी आवाज़ और पहचान न खोए।
इस तरह, परिसीमन सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के नए युग की शुरुआत हो सकती है — एक ऐसा युग जो जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को संघवाद की अखंडता से जोड़ता है।











