ऊर्जा क्षेत्र के लिए निराशाजनक बजट: निजीकरण की जिद छोड़ने की जरूरत

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तुत 2025-26 के बजट में ऊर्जा क्षेत्र को लेकर जो प्रावधान किए गए हैं, वे संतोषजनक नहीं कहे जा सकते। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF) के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे ने बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे ऊर्जा क्षेत्र के लिए निराशाजनक बताया है। उनका कहना है कि राज्य में बिजली की जरूरतों के हिसाब से बजट में किए गए आवंटन अपर्याप्त हैं।
बजट में ऊर्जा क्षेत्र की उपेक्षा
राज्य सरकार ने कुल 8 लाख 8 हजार 736 करोड़ 6 लाख रुपए के बजट में बिजली क्षेत्र के लिए कोई ठोस घोषणा नहीं की है। अवस्थापना विकास, शिक्षा, कृषि, चिकित्सा, सामाजिक सुरक्षा और पूंजीगत परिव्यय के लिए स्पष्ट आवंटन किया गया है, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र के लिए कोई उल्लेखनीय राशि नहीं रखी गई है। सरकार ने पंप स्टोरेज स्कीम और सोलर प्लांट्स के लिए मिलाकर मात्र 180 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, जो तेजी से बढ़ती बिजली मांग के सापेक्ष नगण्य है।
नई बिजली परियोजनाओं की अनदेखी
शैलेंद्र दुबे के अनुसार, राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम (UPRVUNL) की प्रशंसा तो की है, लेकिन इसके तहत किसी भी नई बिजली परियोजना की घोषणा नहीं की गई है। यह चिंताजनक है क्योंकि राज्य को सबसे सस्ती बिजली इसी निगम से प्राप्त होती है। यदि नई परियोजनाओं को शुरू नहीं किया गया, तो भविष्य में बिजली संकट और बढ़ सकता है।
बजट और ऊर्जा मंत्री के विरोधाभासी बयान
बजट पेश करते समय वित्त मंत्री ने कहा कि राज्य में बिजली के क्षेत्र में अभूतपूर्व सुधार हुआ है, जबकि ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा पहले ही यह स्वीकार कर चुके हैं कि उत्तर प्रदेश में बिजली की सेहत ठीक नहीं है। यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि सरकार के भीतर ही इस मुद्दे पर एकरूपता नहीं है। यदि बिजली की हालत ठीक नहीं है, तो सरकार को इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश करना चाहिए था, लेकिन बजट में ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता।
निजीकरण की जिद छोड़ने की जरूरत
सरकार लगातार बिजली के निजीकरण को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को मजबूत किए बिना यह रणनीति सफल नहीं हो सकती। शैलेंद्र दुबे ने ऊर्जा मंत्री को सलाह दी है कि वे निजीकरण की जिद छोड़ें और सार्वजनिक क्षेत्र में सुधारों को आगे बढ़ाएं।
उत्तर प्रदेश में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है, और उद्योगों, किसानों, तथा आम जनता की निर्भरता भी बिजली पर अधिक हो गई है। ऐसे में बजट में ऊर्जा क्षेत्र के लिए ठोस आवंटन किया जाना चाहिए था। नए बिजली संयंत्रों की घोषणा न होना और ऊर्जा क्षेत्र के लिए समर्पित धनराशि का न के बराबर होना सरकार की ऊर्जा नीति को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि सरकार ने समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया, तो आने वाले वर्षों में बिजली संकट और बढ़ सकता है, जिससे आर्थिक विकास भी प्रभावित होगा।











