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बांदा नगर पालिका में भ्रष्टाचार का खेल: प्रशासनिक लापरवाही या राजनीतिक संरक्षण ?

बांदा नगर पालिका में भ्रष्टाचार का खेल: प्रशासनिक लापरवाही या राजनीतिक संरक्षण ?

BANDA. बांदा नगर पालिका इन दिनों लगातार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरी हुई है। नगर पालिकाध्यक्षा और उनके प्रतिनिधि पुत्र पर सरकारी धन के दुरुपयोग, फर्जी फर्मों के जरिए भुगतान, और प्रशासनिक पदों पर अयोग्य लोगों की नियुक्ति जैसे गंभीर आरोप लग रहे हैं। इस पूरे मामले में नगर प्रशासन की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है।

भ्रष्टाचार के आरोपों का सिलसिला

राष्ट्रीय लोकदल बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष वीरेंद्र साक्षी ने नगर पालिकाध्यक्षा पर अपने रिश्तेदार की फर्म अभिराम बिल्डिंग मैटेरियल को लाखों का भुगतान करने का आरोप लगाया है। यह सीधे तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस नीति के खिलाफ जाता है। नगर पालिका द्वारा किए जा रहे विकास कार्यों में अपारदर्शिता और वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर जनता में रोष है।

इस मामले की शिकायत जिलाधिकारी के पास पहुंची, और जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ते हुए एडीएम राजेश कुमार से एसडीएम/प्रभारी अधिशासी अधिकारी रजत वर्मा तक पहुंच गई। वर्मा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि मामला उनके संज्ञान में है और जल्द ही कानूनी कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, इससे पहले भी नगर पालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों पर जांच की गई, लेकिन ठोस कार्रवाई का अभाव दिखा है।

नियुक्तियों में अनियमितता और प्रशासनिक लापरवाही

नगर पालिका में न केवल वित्तीय अनियमितता, बल्कि प्रशासनिक पदों पर अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्ति का मामला भी चर्चा में है। आरोप है कि एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, सुशांत शुक्ला, जो कि मात्र हाईस्कूल पास हैं और चपरासी के पद पर नियुक्त हैं, उन्हें निर्माण लिपिक जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठा दिया गया।

इस मामले में पूर्व अधिशासी अधिकारी नीलम चौधरी ने जांच कर यह रिपोर्ट दी थी कि सुशांत न तो अपने काम में सक्षम हैं, न ही उनसे विकास कार्यों से संबंधित जानकारी प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि उनकी नियुक्ति इस पद पर नियमों के विरुद्ध है, लेकिन फिर भी नगर पालिका प्रशासन ने इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

भ्रष्टाचार का गढ़ बनती नगर पालिका

नगर पालिका प्रशासन की लापरवाही और राजनीतिक संरक्षण के कारण बांदा में विकास कार्यों की बजाय भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है। नगर पालिकाध्यक्षा और उनके प्रतिनिधि पुत्र पर लगते आरोपों से यह स्पष्ट होता जा रहा है कि नगर प्रशासन में पारदर्शिता की कमी है।

नगर निकाय में फैली अव्यवस्था और मनमानी नियुक्तियों के कारण पढ़े-लिखे और योग्य कर्मचारी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं, जबकि राजनीतिक संबंधों के आधार पर अयोग्य व्यक्तियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया जा रहा है। यह न केवल स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था के पतन को दर्शाता है, बल्कि जनता के विश्वास को भी ठेस पहुंचा रहा है।

क्या होगी कार्रवाई?

अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी अन्य भ्रष्टाचार के मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त नीति के बावजूद यदि इस तरह के मामले सामने आते हैं और उन पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता, तो यह सरकार की साख पर भी सवाल खड़ा करेगा।

नगर पालिका में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए आवश्यक है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि जनता के पैसे का सही उपयोग हो सके और प्रशासन में पारदर्शिता स्थापित हो सके।

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