“73 यूनिट खून, 21 ने ‘मौत के बाद जीवन’ का संकल्प लिया — कोटद्वार में रक्तदान-अंगदान क्रांति!”

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कोटद्वार से उठी इंसानियत की लहर — एक शिविर, कई जिंदगियों की उम्मीद
उत्तराखंड के कोटद्वार स्थित बाल भारती सीनियर सेकेंडरी स्कूल, मोटाढाक में आयोजित स्वैच्छिक रक्तदान शिविर ने समाज को एक मजबूत संदेश दिया—
👉 “जीते जी रक्तदान, जाते-जाते अंगदान”
विमला-कुंदन सेवाग्राम ट्रस्ट और आधारशिला रक्तसमूह के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह कार्यक्रम श्रद्धांजलि के साथ-साथ एक बड़े सामाजिक परिवर्तन की ओर बढ़ता कदम साबित हुआ।
श्रद्धांजलि से जन-जागरण तक — भावनाओं से जुड़ा अभियान
यह आयोजन स्वर्गीय कुणाल रावत (अंगदानी) और स्वर्गीय मोहित चावला की स्मृति में किया गया, लेकिन इसका प्रभाव व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक रहा।
👉 कार्यक्रम का उद्देश्य साफ था:
- रक्तदान को जनआंदोलन बनाना
- अंगदान के प्रति झिझक खत्म करना
- जरूरतमंदों को समय पर जीवनदान दिलाना
मुख्य ट्रस्टी गिरिराज सिंह रावत ने कहा—
“अंगदान मृत्यु के बाद भी जीवन देने का सबसे बड़ा माध्यम है।”
आंकड़े जो खुद कहानी कहते हैं
इस शिविर ने सिर्फ संदेश नहीं दिया, बल्कि जमीन पर असर भी दिखाया—
- 100 लोगों ने रक्तदान के लिए रजिस्ट्रेशन कराया
- 73 यूनिट रक्त सफलतापूर्वक एकत्रित
- 21 लोगों ने अंगदान का संकल्प लिया
- अब तक 216+ लोग NOTTO से जुड़कर अंगदान के लिए पंजीकृत
👉 ये आंकड़े बताते हैं कि सही पहल कैसे समाज में वास्तविक बदलाव ला सकती है।
युवा शक्ति बनी अभियान की रीढ़ — NSS का दमदार योगदान
बाल भारती स्कूल की NSS इकाई पिछले 12 वर्षों से लगातार इस अभियान में भागीदारी निभा रही है।
मंडलीय कार्यक्रम संयोजक पुष्कर सिंह नेगी ने NSS के प्रयासों को “युवाओं के लिए प्रेरणादायक मॉडल” बताया।
👉 युवा जब सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हैं, तो बदलाव तेज़ और स्थायी होता है।
वे नाम जो बन गए ‘जीवनदाता’ — श्रद्धांजलि में सम्मान
कार्यक्रम में उन महान आत्माओं को याद किया गया, जिनके अंगदान ने दूसरों को नई जिंदगी दी:
- स्व० कुणाल रावत (नेत्रदान)
- स्व० चंद्रकांता रावत (पूर्ण देहदान — 8 लोगों को जीवनदान)
- स्व० मदन मोहन सुन्द्रियाल
- स्व० अशोक भाटिया, स्व० सुदेश भाटिया, स्व० विमला भाटिया
👉 इनके परिवारों की मानवता और साहस को समाज के लिए मिसाल बताया गया।
मेडिकल सपोर्ट: प्रोफेशनल टीम की अहम भूमिका
देहरादून के श्री महंत इंद्रेश हॉस्पिटल की टीम ने शिविर को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डॉक्टरों, टेक्नीशियन और स्टाफ की मुस्तैदी ने पूरे आयोजन को सुरक्षित और प्रभावी बनाया।
विश्लेषण: क्यों जरूरी हैं ऐसे अभियान?
भारत में हर साल हजारों मरीज सिर्फ इसलिए जान गंवा देते हैं क्योंकि—
- समय पर रक्त नहीं मिल पाता
- अंग प्रत्यारोपण के लिए डोनर नहीं मिलते
👉 ऐसे में यह अभियान सिर्फ एक इवेंट नहीं, बल्कि:
- सामाजिक सोच बदलने का जरिया
- मिथकों को तोड़ने का मंच
- स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा
सोशल इम्पैक्ट: ‘इमोशन + एक्शन’ का परफेक्ट मॉडल
यह अभियान इसलिए सफल रहा क्योंकि इसमें:
✔ श्रद्धांजलि की भावना थी
✔ सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश था
✔ युवाओं की भागीदारी थी
✔ और सबसे जरूरी — तुरंत एक्शन (रक्तदान/पंजीकरण)
👉 यही फॉर्मूला किसी भी सामाजिक अभियान को वायरल और प्रभावी बनाता है।
समापन: “मृत्यु अंत नहीं, नई शुरुआत हो सकती है”
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी रक्तदाताओं, स्वयंसेवकों और सहयोगी संस्थाओं का आभार व्यक्त किया।
👉 यह आयोजन एक मजबूत संदेश देकर गया—
“अगर आप चाहें, तो आपकी जिंदगी के बाद भी कई जिंदगियां सांस ले सकती हैं।”











