बलरामपुर में घायल पशु की तड़प: सरकारी तंत्र की नाकामी और प्रशासन की बेशर्मी का घिनौना चेहरा

बलरामपुर। उत्तर प्रदेश की सड़कें न सिर्फ इंसानों की बेबसी की गवाह हैं, बल्कि बेजुबान जानवरों की तड़प का मूक मंच भी बन चुकी हैं। सरकारी दावों और योजनाओं के तमाम ढोल पीटे जाते हैं, लेकिन जब ज़मीन पर मदद की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तो पूरा प्रशासनिक ढांचा ढह जाता है। बलरामपुर जिले में एक घायल पशु की दर्दनाक स्थिति और उसे बचाने की कोशिश में नागरिकों को जिस अमानवीय उदासीनता का सामना करना पड़ा, वह सरकारी तंत्र की असलियत को पूरी तरह बेनकाब कर देता है।
सड़क पर तड़पता जानवर, मर चुकी इंसानियत
बलरामपुर से तुलसीपुर मार्ग पर बिजलीपुर मंदिर के पास एक छोटा पशु कई दिनों से घायल हालत में घूम रहा है। किसी निर्दयी व्यक्ति ने उसके गले में रस्सी इतनी कसकर बांध दी कि वह चमड़ी के अंदर घुस गई है, जिससे घाव में कीड़े पड़ चुके हैं। दर्द से बिलबिलाता वह जानवर सड़क पर खड़ा रहता है, राहगीरों की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देखता है, लेकिन उसे सिर्फ बेरुखी और बेपरवाही मिलती है।
सबसे शर्मनाक बात यह है कि उसी सड़क से रोज़ाना कई आला अधिकारी गुजरते हैं, लेकिन किसी की इंसानियत नहीं जागती। उत्तर प्रदेश सरकार भले ही पशु कल्याण के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाती हो, लेकिन अगर एक बेजुबान जानवर की जान बचाने के लिए इतने सारे फोन कॉल और गिड़गिड़ाहट की जरूरत पड़े, तो ऐसी योजनाओं का होना न होना बराबर है।
हेल्पलाइन से लेकर डॉक्टर तक — हर जगह नाकामी
जब स्थानीय पत्रकार नानबाबू चौहान ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए 5 मार्च 2025 को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 पर फोन किया, तो उन्हें पशु चिकित्सा विभाग से संपर्क करने की सलाह दी गई। लेकिन असल नाटक तब शुरू हुआ जब पशु चिकित्सक श्याम नगीना ने मदद करने के बजाय कहा:
“जूनियर डॉक्टर से बात कर लीजिए।”
जब पशु हेल्पलाइन 1962 पर कॉल किया गया, तो जवाब मिला:
“आप खुद किसी आदमी को बुलाकर रस्सी काटिए और इलाज करवा लीजिए।”
यह जवाब नहीं, बल्कि घिनौनी लापरवाही और सरकारी तंत्र की गली-सड़ी मानसिकता का सबूत है। क्या आम जनता का काम है कि वो खुद सर्जरी करे? फिर सरकार और पशु चिकित्सकों के होने का मकसद क्या है?
अधिकारी, जिनका फर्ज़ सिर्फ वेतन लेना है
पत्रकार ने बलरामपुर के एसडीएम संजू कुमार यादव को फोन किया, लेकिन साहब ने फोन उठाना भी ज़रूरी नहीं समझा। 7 मार्च को जब सीडीओ बलरामपुर को फोन किया गया, तो उन्होंने कहा:
“मैसेज लिखकर भेजिए।”
पत्रकार ने पूरे विवरण के साथ लोकेशन और अपना फोन नंबर भेजा, लेकिन नतीजा? पूरी तरह शून्य।
ऐसे अफसरों की बेशर्मी और घोर निकम्मापन उत्तर प्रदेश की “डिजिटल और जवाबदेह सरकार” के तमाम दावों को पैरों तले रौंद देते हैं। अगर ऐसे अधिकारी जनता की पुकार नहीं सुन सकते, तो इन्हें जनता के पैसों से तनख्वाह लेने का कोई हक नहीं है।
सरकारी योजनाएं: खोखले वादे, फर्जी दिखावा
उत्तर प्रदेश सरकार पशु कल्याण के नाम पर करोड़ों रुपये फूंक देती है, लेकिन ज़मीन पर सच्चाई इससे कोसों दूर है। एक घायल पशु की जान बचाने के लिए 1076, 1962, एसडीएम, सीडीओ — सभी जगह गुहार लगाई गई, लेकिन तंत्र की सुस्ती और असंवेदनशीलता के चलते कोई कार्रवाई नहीं हुई। सवाल यह है कि अगर एक रस्सी काटने और घाव का इलाज करने के लिए इतनी मशक्कत करनी पड़े, तो फिर सरकार का पशु सेवा विभाग क्यों है? क्या सिर्फ फंड हड़पने के लिए?
मुख्यमंत्री जी, क्या यही है ‘रामराज्य’?
माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से सीधा सवाल — क्या यही है उत्तर प्रदेश का सुशासन? क्या आपकी योजनाएं सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित हैं? जब आपके ही अफसर जनता और बेजुबान जानवरों की जान की परवाह नहीं करते, तो फिर क्या यह सरकार सिर्फ पोस्टरों और विज्ञापनों के लिए है?
यह घटना सिर्फ एक पशु की नहीं है, यह उस सड़े-गले सिस्टम की कहानी है, जहां अधिकारी कुर्सी पर बैठकर जनता की बेबसी का मज़ाक उड़ाते हैं।
जनता की चेतावनी: या तो सुधारिए, या कुर्सी छोड़िए
उत्तर प्रदेश की जनता को अब चुप बैठने की ज़रूरत नहीं है। यह घटना साफ दिखाती है कि सिस्टम तब तक नहीं हिलेगा, जब तक जनता अपनी आवाज़ बुलंद न करे। अगर इस घटना पर तत्काल कार्रवाई नहीं होती, तो जनता को खुलकर सड़क पर उतरना होगा।
हमारी मांग:
- घायल पशु का तुरंत इलाज कराया जाए।
- लापरवाह अधिकारियों पर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
- पशु चिकित्सा विभाग की कार्यप्रणाली की उच्चस्तरीय जांच हो।
अगर सरकार वाकई में अपने वादों के प्रति ईमानदार है, तो इसे एक टेस्ट केस मानकर कार्रवाई करनी चाहिए। अगर नहीं, तो जनता को समझ लेना चाहिए कि सिस्टम अब जनता के लिए नहीं, बल्कि अपनी जेब भरने वालों के लिए चल रहा है।

– नानबाबू चौहान, पत्रकार
ग्राम सभा करमहना, ब्लॉक बलरामपुर, उत्तर प्रदेश











