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उ.प्र. में बिजली निजीकरण के खिलाफ जारी संघर्ष, कर्मचारियों का 82वें दिन भी विरोध प्रदर्शन

उ.प्र. में बिजली निजीकरण के खिलाफ जारी संघर्ष, कर्मचारियों का 82वें दिन भी विरोध प्रदर्शन
लखनऊ : उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मचारियों द्वारा निजीकरण के खिलाफ आंदोलन अपने 82वें दिन में प्रवेश कर गया है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के नेतृत्व में प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनमें निजीकरण से उत्पन्न वित्तीय अनियमितताओं और सरकारी राजस्व के संभावित नुकसान को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की जा रही है।
आगरा और ग्रेटर नोएडा मॉडल पर सवाल

संघर्ष समिति का मुख्य तर्क यह है कि उत्तर प्रदेश में बिजली निजीकरण का जो मॉडल अपनाया जा रहा है, वह पूर्व में हुए निजीकरण के अनुभवों से सबक नहीं ले रहा। समिति ने विशेष रूप से आगरा और ग्रेटर नोएडा में हुए निजीकरण को लेकर सवाल उठाए हैं।

आगरा का मामला:
2010 में आगरा की बिजली आपूर्ति का निजीकरण किया गया था और इसे टोरेंट पावर को सौंपा गया। निजीकरण की शर्तों के अनुसार, कंपनी को उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) का 2200 करोड़ रुपये का बकाया वसूलकर सरकार को देना था। हालांकि, 15 साल बीत जाने के बाद भी यह राशि पावर कारपोरेशन को वापस नहीं मिली है। संघर्ष समिति का आरोप है कि टोरेंट पावर ने इस धनराशि को अपने पास रख लिया और बकायेदारों का कनेक्शन भी नहीं काटा, जो स्पष्ट रूप से अनुबंध का उल्लंघन है।

नुकसान का अनुमान:
संघर्ष समिति के अनुसार, यदि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम (जिस पर 41 हजार करोड़ रुपये का बकाया है) और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम (25 हजार करोड़ रुपये के बकाया के साथ) का भी निजीकरण किया जाता है, तो इससे कुल 66 हजार करोड़ रुपये की राजस्व हानि हो सकती है। समिति का मानना है कि निजी कंपनियों की रुचि बिजली व्यवस्था सुधारने से अधिक, इस बकाए को हड़पने में है।

सस्ती बिजली पर भारी मुनाफा

संघर्ष समिति ने एक और गंभीर मुद्दा उठाया है— टोरेंट पावर को दी जाने वाली बिजली की दरें। पावर कारपोरेशन महंगी दर पर बिजली खरीदता है और इसे टोरेंट को केवल 4.13 रुपये प्रति यूनिट में बेचता है, जबकि कंपनी इसे 7.98 रुपये प्रति यूनिट की दर से उपभोक्ताओं को बेचकर सालाना 800 करोड़ रुपये का भारी मुनाफा कमा रही है। समिति का कहना है कि अगर आगरा का निजीकरण नहीं किया गया होता, तो पावर कारपोरेशन को 1000 करोड़ रुपये का फायदा हो सकता था।

सरकार और प्रबंधन की चुप्पी पर सवाल

संघर्ष समिति का आरोप है कि आंदोलन को 82 दिन हो चुके हैं, लेकिन पावर कारपोरेशन प्रबंधन ने अभी तक कर्मचारियों से वार्ता करने की जहमत तक नहीं उठाई है। इससे कर्मचारियों में रोष बढ़ता जा रहा है। समिति ने प्रबंधन और निजी कंपनियों के बीच मिलीभगत की आशंका जताई है और इसे प्रदेश के राजस्व के लिए घातक बताया है।

रोजाना जारी विरोध प्रदर्शन

संघर्ष समिति ने आज वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, गोरखपुर, मिर्जापुर, आजमगढ़, बस्ती, अलीगढ़, मथुरा, एटा, झांसी, बांदा, बरेली, देवीपाटन, अयोध्या, सुल्तानपुर, हरदुआगंज, पारीछा, ओबरा, पिपरी और अनपरा में विरोध सभाएं आयोजित कीं। कर्मचारियों ने शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से प्रदर्शन जारी रखने का संकल्प लिया है।

क्या निजीकरण से बच सकती है सरकार?

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सरकार बिजली के निजीकरण पर पुनर्विचार करेगी या नहीं। संघर्ष समिति का कहना है कि अगर सरकार निजीकरण का फैसला वापस ले ले, तो बिजली कर्मचारी रिकॉर्ड राजस्व वसूली सुनिश्चित करने के लिए तैयार हैं।

उत्तर प्रदेश में बिजली क्षेत्र का यह आंदोलन भविष्य में सरकार की नीतियों पर कितना असर डालेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन यह साफ है कि निजीकरण से जुड़े सवालों का संतोषजनक जवाब दिए बिना इसे आगे बढ़ाना मुश्किल होगा।

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