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डॉ. सत्यवान सौरभ की कविता “बोलो मेरे राम” का विश्लेषण

     बोलो मेरे राम॥

दुनिया रखती क्यों नहीं, आज विभीषण नाम।
तुम तो सब कुछ जानते, बोलो मेरे राम॥

वध दशानन कह रहा, ये भी तो इक बात।
करो विभीषण-सा नहीं, भाई पर आघात॥

गैरों से ज़्यादा कठिन, अपनों की है मार।
भेद विभीषण से गया, रावण लंका हार॥

भेद विभीषण ने दिए, गए दशानन हार।
जीती लंका राम ने, कर भाइयों में रार॥

वैरी से ज़्यादा किया, रावण पर यूं घात।
भेद विभीषण ने दिए, कही जिगर की बात॥

सौरभ विषधर से अधिक, विष अपनों के पास।
कभी विभीषण पर नहीं, करना मत विश्वास॥

दुश्मन में ताकत कहाँ, पकड़ सके जो हाथ।
कुंभकर्ण से तुम बनो, दो भाई का साथ॥

–डॉ. सत्यवान सौरभ

“बोलो मेरे राम”  कविता का विश्लेषण: विभीषण के चरित्र और सामाजिक दृष्टिकोण पर एक दृष्टि

डॉ. सत्यवान सौरभ द्वारा रचित यह कविता, रामायण के पात्र विभीषण के चरित्र और समाज में उनकी छवि का विश्लेषण प्रस्तुत करती है। कवि ने विभीषण के माध्यम से व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों में विश्वासघात, नैतिकता, और भाईचारे की जटिलताओं को उजागर किया है। इस कविता में राम से सवाल पूछते हुए विभीषण के चरित्र और समाज द्वारा उनकी नकारात्मक छवि को चुनौती दी गई है।

विभीषण: विश्वासघात या धर्म का पालन?

कविता का आरंभ इस प्रश्न से होता है कि विभीषण जैसा नाम समाज में आदर क्यों नहीं पाता। यह सवाल सीधे समाज की सोच पर प्रहार करता है, जहाँ विभीषण को उनके भाई रावण के प्रति विश्वासघात के रूप में देखा गया है। कवि इस धारणा को चुनौती देते हुए कहते हैं कि विभीषण का कार्य धर्म और सत्य के पालन का प्रतीक था, न कि मात्र विश्वासघात।

भाईचारे का महत्व और अपनों की चोट

कविता यह भी रेखांकित करती है कि बाहरी दुश्मन से अधिक खतरनाक अपनी ही आत्मीयता में छिपा हुआ विष हो सकता है। कवि ने इस विचार को प्रस्तुत करते हुए लिखा है:
“गैरों से ज़्यादा कठिन, अपनों की है मार।
भेद विभीषण से गया, रावण लंका हार।”
यह पंक्तियाँ न केवल रामायण की कथा के संदर्भ में सत्य हैं, बल्कि वर्तमान सामाजिक संबंधों की जटिलताओं को भी दर्शाती हैं।

रावण और विभीषण का संघर्ष: नैतिकता बनाम सत्ता

कवि ने विभीषण के निर्णय को रावण के घमंड और अधर्म के विरुद्ध धर्म के पक्ष में खड़े होने के रूप में चित्रित किया है। लेकिन समाज के दृष्टिकोण से, इसे भाई के प्रति विश्वासघात समझा गया। यह द्वंद्व इस बात पर प्रकाश डालता है कि सत्य और धर्म का पालन करना कभी-कभी व्यक्तिगत संबंधों का त्याग करने के समान हो सकता है।

समाज के लिए संदेश

कविता का अंत इस चेतावनी के साथ होता है कि अपनों में छिपे विष से सतर्क रहना चाहिए। कवि ने विभीषण के निर्णय को एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है, लेकिन यह भी कहा है कि ऐसे चरित्रों पर पूरी तरह से विश्वास करना भी खतरनाक हो सकता है।

यह पंक्तियाँ:
“सौरभ विषधर से अधिक, विष अपनों के पास।
कभी विभीषण पर नहीं, करना मत विश्वास।”

समाज में रिश्तों की जटिलता और उनमें छिपे छल-कपट की ओर इशारा करती हैं।

नैतिकता और आदर्शों का द्वंद्व

कविता का संदेश केवल विभीषण तक सीमित नहीं है। यह आज के समाज में नैतिकता, आदर्श और व्यक्तिगत संबंधों के बीच टकराव को भी परिभाषित करता है। कवि ने कुंभकर्ण को एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा है कि भाईचारे में अडिग रहना और परिवार के साथ खड़े रहना भी उतना ही आवश्यक है।

निष्कर्ष

डॉ. सत्यवान सौरभ की यह कविता हमें रामायण के पात्रों के माध्यम से जीवन के गहरे सत्य और सामाजिक संबंधों की जटिलताओं को समझने का अवसर देती है। विभीषण के चरित्र को समाज में अक्सर नकारात्मक दृष्टिकोण से देखा गया है, लेकिन यह कविता इस धारणा को चुनौती देती है। साथ ही, यह रिश्तों में निष्ठा, सत्य, और नैतिकता के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर देती है।

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