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महिला शिक्षकों की बढ़ती भागीदारी: शिक्षा में समानता की ओर एक बड़ा कदम

महिला शिक्षकों की बढ़ती भागीदारी: शिक्षा में समानता की ओर एक बड़ा कदम

विश्लेषण : अवनीश त्यागी 

BIJNOR: भारत की शिक्षा व्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी न केवल एक सकारात्मक संकेत है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण आधार भी बन रही है। यूडीआईएसई+ 2023-24 रिपोर्ट के अनुसार, देश में स्कूल शिक्षकों का 53.34% हिस्सा महिलाएं हैं। यह वृद्धि केवल संख्यात्मक नहीं है, बल्कि समावेशी और संवेदनशील शिक्षा के निर्माण में एक मजबूत भूमिका निभा रही है।

महिला शिक्षकों की उपस्थिति का सीधा प्रभाव लड़कियों की शिक्षा पर पड़ा है। यूनेस्को की 2022 रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं द्वारा संचालित कक्षाओं में 20% अधिक समावेशी भागीदारी देखी गई। बिहार की कन्या उत्थान योजना और उड़ान योजना जैसी पहलें इस बदलाव की सशक्त मिसाल हैं, जहां महिला शिक्षकों की भूमिका ने लड़कियों के नामांकन और निरंतर शिक्षा को नई गति दी है। वे न केवल शैक्षणिक मार्गदर्शक बनीं, बल्कि मासिक धर्म स्वच्छता, बाल विवाह और लिंग भेद जैसी संवेदनशील विषयों पर खुली चर्चा के लिए भी मंच तैयार कर रही हैं।

उच्च शिक्षा में अब भी लंबा सफर बाकी

हालांकि, स्कूली शिक्षा में महिलाओं की संख्या बढ़ रही है, पर उच्च शिक्षा संस्थानों में लैंगिक असमानता बनी हुई है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, विश्वविद्यालयों में महिला संकाय की हिस्सेदारी मात्र 43% है, जबकि आईआईटी और एनआईटी जैसे संस्थानों में यह संख्या 20% से भी कम है। शीर्ष 50 विश्वविद्यालयों में केवल 10% महिला कुलपति हैं, जो निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में महिलाओं की सीमित भागीदारी को दर्शाता है।

इस असमानता के पीछे कई सामाजिक और संस्थागत बाधाएं हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, मातृत्व के बाद करियर ब्रेक, दोहरी जिम्मेदारियां और अनुसंधान के लिए सीमित अवसर महिलाओं की प्रगति में बाधा बनते हैं। कई बार, नियुक्ति और पदोन्नति में अचेतन पूर्वाग्रह भी महिलाओं की नेतृत्वकारी भूमिकाओं को सीमित करते हैं।

नीतिगत सुधार और समावेशी प्रयास

इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार और संस्थान लगातार प्रयास कर रहे हैं। यूजीसी का GATI (Gender Advancement for Transforming Institutions) कार्यक्रम, महिलाओं को नेतृत्व की भूमिकाओं में लाने के लिए नीतिगत सुधारों पर जोर देता है। इसके तहत शैक्षणिक नियुक्ति समितियों में 40% महिला प्रतिनिधित्व की अनिवार्यता पर बल दिया गया है। इसके अलावा, सवेतन मातृत्व अवकाश, लचीले कार्यकाल पथ और परिसर में बाल देखभाल सुविधाएं जैसी पहलें महिलाओं के कार्य-जीवन संतुलन को मजबूत कर रही हैं।

प्रियंका सौरभ, एक शोधार्थी और स्वतंत्र पत्रकार, ने इस विषय पर विस्तृत शोध किया है। वे लिखती हैं, “लैंगिक समानता की दिशा में यह बढ़ता कदम केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा प्रणाली के लिए एक सकारात्मक बदलाव है। महिला शिक्षकों की बढ़ती संख्या से शिक्षा की गुणवत्ता और छात्राओं का शैक्षणिक प्रदर्शन बेहतर हो रहा है।”

आगे की राह: संस्थागत परिवर्तन की आवश्यकता

हालांकि नीतिगत बदलाव हो रहे हैं, लेकिन इनका वास्तविक प्रभाव संस्थानों के सांस्कृतिक ढांचे को बदलने पर निर्भर करेगा। चयन समितियों की निष्पक्षता सुनिश्चित करना, गुमनाम शिकायत निवारण प्रक्रियाएं लागू करना, और महिलाओं के लिए अनुसंधान व नेतृत्व विकास के अवसरों को बढ़ावा देना, इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होंगे।

इसके अलावा, लड़कों को भी लिंग-संवेदनशील शिक्षा देना जरूरी है ताकि वे समानता को केवल महिला सशक्तिकरण तक सीमित न देखें, बल्कि इसे सामाजिक प्रगति का अनिवार्य हिस्सा मानें।

भारत की शिक्षा व्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी एक आशाजनक संकेत है। अगर इन नीतिगत पहलों को सही ढंग से लागू किया जाए, तो शिक्षा का यह नया परिदृश्य न केवल लड़कियों के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए उज्जवल भविष्य की नींव रखेगा।

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