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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक उत्तरदायित्व: एक संतुलन की आवश्यकता

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक उत्तरदायित्व: एक संतुलन की आवश्यकता

लेखक: प्रियंका सौरभ

संपादन: अवनीश त्यागी 

भिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आधारशिला है, लेकिन इसका दुरुपयोग समाज को गंभीर नैतिक पतन की ओर ले जा सकता है। वर्तमान समय में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने विचारों की अभिव्यक्ति को एक नया आयाम दिया है, लेकिन इसकी आड़ में कई लोग अश्लीलता और असंवेदनशीलता को बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसे उदाहरण केवल हास्य के नाम पर नहीं ठहराए जा सकते; यह एक व्यापक सामाजिक समस्या है, जिसका समाधान कानूनी कार्रवाई और सामाजिक बहिष्कार के माध्यम से किया जाना चाहिए।

मीडिया और हास्य की सीमाएं

हास्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संदेशों को भी प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का एक माध्यम हो सकता है। लेकिन जब हास्य विकृति, अश्लीलता और अनादर पर आधारित हो, तो यह समाज को नैतिक रूप से कमजोर करता है। कॉमेडी में बिना किसी परिणाम के कुछ भी कहने की छूट नहीं हो सकती, खासकर तब जब यह हमारी संस्कृति, मूल्यों और नैतिकता पर नकारात्मक प्रभाव डालती हो।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूट्यूबर रणवीर इलाहाबादिया की ‘इंडियाज गॉट लैटेंट’ पर आपत्तिजनक टिप्पणियों की निंदा करना एक महत्वपूर्ण कदम है। अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि इस प्रकार की भाषा और विचारधारा न केवल महिलाओं बल्कि पूरे समाज के लिए शर्मिंदगी का कारण बन सकती है। इस फैसले से यह स्पष्ट हो जाता है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर अश्लीलता और अनैतिक कंटेंट के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

क्या कानूनी कार्रवाई पर्याप्त है?

कानूनी कार्रवाई केवल अपराधियों को दंडित करने तक सीमित नहीं होती; इसका मुख्य उद्देश्य समाज को यह संदेश देना है कि कुछ चीजें किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं हैं। यदि डिजिटल युग में प्रभावशाली व्यक्तित्वों को बिना किसी जवाबदेही के छोड़ दिया जाए, तो यह एक खतरनाक मिसाल बन सकती है।

लेकिन केवल कानूनी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। जनता को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और ऐसे कंटेंट का बहिष्कार करना होगा। जब तक लोग अश्लील और भड़काऊ सामग्री को देखने और साझा करने में रुचि लेते रहेंगे, तब तक इस प्रकार की सामग्री का उत्पादन होता रहेगा। दर्शकों की निष्क्रियता ही इन कंटेंट क्रिएटर्स को बढ़ावा देती है।

संस्कृति और सामाजिक मूल्यों की रक्षा कैसे करें?

हमारे समाज में नैतिक मूल्यों और संस्कृति को बनाए रखना आवश्यक है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स, यूट्यूब, टीवी और सोशल मीडिया पर लगातार बढ़ती अश्लीलता केवल मनोरंजन के नाम पर सही नहीं ठहराई जा सकती। हमें यह समझना होगा कि एक सभ्य समाज केवल कानून से नहीं चलता, बल्कि उसकी संस्कृति और नैतिकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

कुछ बिंदु जिन पर ध्यान देना आवश्यक है:

  1. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही: यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को मात्र व्यूज और सब्सक्राइबर्स पर ध्यान देने के बजाय सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित करनी होगी।
  2. जनता की भूमिका: दर्शकों को ऐसे कंटेंट को रिपोर्ट करना चाहिए और उसका बहिष्कार करना चाहिए। अगर कोई कलाकार या इन्फ्लुएंसर बार-बार अश्लीलता परोसता है, तो उसे न देखकर ही सबसे बड़ी सजा दी जा सकती है।
  3. नैतिक शिक्षा का समावेश: युवाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के प्रभाव और उनके दुरुपयोग के बारे में जागरूक करना आवश्यक है। उन्हें समझाना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में अंतर होता है।
  4. कानूनी सुधार: अश्लीलता और सांस्कृतिक पतन को बढ़ावा देने वाली सामग्री के खिलाफ सख्त कानून बनने चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी हरकतें करने से पहले लोग कई बार सोचें।

‘स्वतंत्रता’ और ‘स्वच्छंदता’ में स्पष्ट अंतर है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि कोई भी कुछ भी कह सके, खासकर जब वह समाज को नुकसान पहुंचाने वाला हो। आज जरूरत इस बात की है कि समाज मिलकर उन तत्वों को रोके जो हास्य और मनोरंजन के नाम पर गंदगी फैला रहे हैं। जब तक जनता और प्रशासन दोनों मिलकर जिम्मेदारी नहीं उठाएंगे, तब तक ऐसे लोगों पर लगाम लगाना मुश्किल होगा। इसलिए, कानूनी कार्रवाई और सामाजिक जागरूकता दोनों आवश्यक हैं ताकि डिजिटल युग में नैतिकता और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा की जा सके।

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