यूपी में DGP नियुक्ति फिर फंसी: UPSC ने लौटाया प्रस्ताव, ‘टॉप-3’ की नई जंग शुरू!
लखनऊ | विशेष विश्लेषण
उत्तर प्रदेश में स्थायी पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति एक बार फिर प्रशासनिक और कानूनी उलझनों में घिर गई है। राज्य सरकार द्वारा संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को भेजा गया प्रस्ताव आपत्तियों के साथ लौटाए जाने के बाद अब यह मामला नई प्रक्रिया और संभावित देरी के दौर में प्रवेश कर चुका है।
क्या है पूरा मामला?
राज्य सरकार ने DGP पद के लिए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की सूची UPSC को भेजी थी, लेकिन आयोग ने इसमें तकनीकी खामियां पाते हुए प्रस्ताव वापस कर दिया। अब संशोधित सूची दोबारा भेजी गई है, जिस पर नए सिरे से विचार होगा।
सूत्र बताते हैं कि चयन प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन किया जा रहा है—यानी UPSC पहले ‘टॉप-3’ अधिकारियों का पैनल तैयार करेगा और राज्य सरकार उनमें से एक को DGP नियुक्त करेगी।
कहां हुई चूक?
सबसे बड़ा विवाद वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आलोक शर्मा के नाम को लेकर सामने आया।
- राज्य सरकार ने उन्हें सेवा अवधि कम होने के आधार पर पैनल में शामिल नहीं किया
- जबकि केंद्रीय गृह मंत्रालय के नियम के अनुसार
👉 रिक्ति की तिथि पर सेवा अवधि की गणना होती है
👉 यदि एक दिन की सेवा भी शेष हो, तो अधिकारी पात्र माना जाता है
इसी तकनीकी बिंदु पर UPSC ने आपत्ति जताई और प्रस्ताव वापस कर दिया।
अब कौन हैं रेस में आगे?
संशोधित सूची में जिन तीन नामों की चर्चा तेज है, वे हैं—
- रेणुका मिश्रा
- आलोक शर्मा
- पीयूष आनंद
UPSC इन्हीं में से ‘टॉप-3’ पैनल तैयार कर राज्य सरकार को भेजेगा।
क्यों बढ़ सकती है देरी?
विशेषज्ञों के मुताबिक—
- UPSC अब 2025 की नई गाइडलाइन के तहत फाइल की समीक्षा करेगा
- संशोधित प्रस्ताव पर प्रक्रिया में समय लगेगा
- कम से कम 2–3 महीने तक स्थायी DGP की नियुक्ति टल सकती है
इस बीच राज्य में कार्यवाहक व्यवस्था जारी रहने की संभावना है।
क्या कहते हैं जानकार?
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि DGP जैसे संवेदनशील पद पर नियुक्ति में छोटी तकनीकी गलती भी पूरी प्रक्रिया को प्रभावित कर देती है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद पारदर्शिता बढ़ी है, लेकिन प्रक्रिया भी पहले से ज्यादा जटिल हो गई है।
आगे क्या?
अब नजर UPSC के अगले कदम पर टिकी है—
👉 क्या आयोग जल्द ‘टॉप-3’ सूची भेजेगा?
👉 या फिर प्रक्रिया में और पेंच फंसेंगे?
फिलहाल उत्तर प्रदेश को स्थायी पुलिस प्रमुख के लिए और इंतजार करना पड़ सकता है।
निष्कर्ष
यूपी में DGP नियुक्ति का मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि कानूनी और प्रक्रिया आधारित चुनौती बन गया है। हर कदम पर नियमों की कसौटी इस प्रक्रिया को लंबा खींच रही है—जिसका सीधा असर राज्य की पुलिस व्यवस्था की स्थिरता पर पड़ सकता है।
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