“कैशलैस इलाज से बाहर क्यों? बिजनौर में मूल्यांकन केंद्र तक पहुंचा विरोध, काली पट्टी बांधकर डटे शिक्षणेत्तर कर्मचारी”
सरकारी नीति पर उठे सवाल, परीक्षा ड्यूटी के बीच विरोध—प्रदेशभर में आंदोलन तेज होने के संकेत
बिजनौर | स्पेशल रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश सरकार की कैशलैस चिकित्सा योजना को लेकर अब विरोध सड़कों से निकलकर सीधे बोर्ड परीक्षा के मूल्यांकन केंद्रों तक पहुंच गया है। बिजनौर में यह विरोध उस समय देखने को मिला जब सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षणेत्तर और आउटसोर्सिंग कर्मचारियों ने काली पट्टी बांधकर अपने कार्य का निष्पादन किया।
यह विरोध सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि सरकार की नीति के खिलाफ बढ़ती नाराजगी का संकेत माना जा रहा है।
क्या है पूरा विवाद?
राज्य सरकार ने हाल ही में एक शासनादेश जारी कर शिक्षकों, बेसिक शिक्षा कर्मियों, शिक्षा मित्रों, अनुदेशकों और रसोइयों को कैशलैस चिकित्सा सुविधा का लाभ देने का निर्णय लिया है।
लेकिन इस आदेश में सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षणेत्तर कर्मचारियों को शामिल नहीं किया गया, जिससे असंतोष गहराता जा रहा है।
मूल्यांकन केंद्र बना विरोध का मंच
बिजनौर के प्रमुख मूल्यांकन केंद्रों—
- आरजेपी इंटर कॉलेज
- बीआईसी इंटर कॉलेज
पर कर्मचारियों ने काली पट्टी बांधकर परीक्षा कार्य किया।
यह कदम साफ संकेत देता है कि कर्मचारी अब अपने अधिकारों के लिए हर मंच का उपयोग करने को तैयार हैं।
कर्मचारियों की आवाज
माध्यमिक शिक्षणेत्तर संघ के जिलाध्यक्ष मुकेश सिन्हा के अनुसार:
“सरकार की यह नीति शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के साथ भेदभावपूर्ण है। जब सभी वर्गों को सुविधा दी जा रही है, तो हमें क्यों वंचित रखा गया?”
उन्होंने बताया कि कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन भी भेजा है, लेकिन अब तक कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई है।
प्रदेश स्तर पर बढ़ता आंदोलन
प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार शर्मा के आह्वान पर:
- सभी जिलों में कर्मचारी काली पट्टी बांधकर विरोध जता रहे हैं
- परीक्षा कार्य प्रभावित किए बिना दबाव बनाने की रणनीति अपनाई जा रही है
- आने वाले दिनों में आंदोलन और तेज होने की संभावना जताई जा रही है
विश्लेषण: क्यों बढ़ रहा है असंतोष?
इस पूरे मामले में तीन बड़े मुद्दे सामने आ रहे हैं:
1️⃣ नीतिगत असमानता
एक ही संस्थान में कार्यरत अलग-अलग वर्गों को अलग सुविधाएं देना असंतोष को जन्म दे रहा है।
2️⃣ चुनावी और सामाजिक प्रभाव
कर्मचारियों की बड़ी संख्या को नजरअंदाज करना सरकार के लिए राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील हो सकता है।
3️⃣ शांत लेकिन प्रभावी विरोध रणनीति
कर्मचारी परीक्षा जैसे संवेदनशील कार्य को बाधित किए बिना विरोध कर रहे हैं, जिससे नैतिक दबाव और अधिक बन रहा है।
आगे क्या?
- अगर जल्द शासनादेश में संशोधन नहीं हुआ तो आंदोलन और उग्र हो सकता है
- परीक्षा के बाद बड़े स्तर पर धरना-प्रदर्शन की संभावना
- सरकार पर सभी कर्मचारियों को समान लाभ देने का दबाव बढ़ेगा
निष्कर्ष
बिजनौर से शुरू हुआ यह विरोध अब प्रदेशव्यापी आंदोलन का रूप लेता दिख रहा है। काली पट्टी बांधकर किया जा रहा यह शांत प्रदर्शन सरकार के लिए एक स्पष्ट संदेश है—
“समान कार्य, तो समान अधिकार भी जरूरी हैं।”
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