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“वादा टूटा, गुस्सा फूटा!” बरूकी NH पर किसानों का बड़ा आंदोलन, डिपो पर तालाबंदी

“वादा टूटा, गुस्सा फूटा!” बरूकी NH पर किसानों का बड़ा आंदोलन, डिपो पर तालाबंदी, 30 मार्च को महापंचायत का ऐलान

बिजनौर | ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट

बरूकी स्थित नेशनल हाईवे (NH) ओवरब्रिज के नीचे पुलिया निर्माण में देरी ने अब बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया है। भारतीय किसान यूनियन (BKU) ने प्रशासन और NH विभाग पर वादाखिलाफी का गंभीर आरोप लगाते हुए NH डिपो पर तालाबंदी कर दी और अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है।

क्या है पूरा विवाद?

बरूकी NH ओवरब्रिज के नीचे दोनों ओर पुलिया निर्माण को लेकर पहले प्रशासन और NH अधिकारियों के बीच सहमति बनी थी।

👉 स्थानीय लोगों की मुख्य समस्या:

  • बरसात में जलभराव
  • आवागमन में भारी दिक्कत
  • दुर्घटनाओं का खतरा

इन समस्याओं को देखते हुए पुलिया निर्माण का आश्वासन दिया गया था, लेकिन अब तक कोई काम शुरू नहीं हुआ।

आश्वासन से आक्रोश तक

पहले किसान धरने पर बैठे थे, जिसे सदर उप जिलाधिकारी और नायब तहसीलदार ने मौके पर पहुंचकर अपनी जिम्मेदारी पर स्थगित करवाया था।

लेकिन:

  • समय बीत गया
  • निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ
  • प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं दिखा

👉 नतीजा: किसानों का गुस्सा फूट पड़ा

BKU का बड़ा एक्शन

जिला अध्यक्ष सुनील प्रधान के नेतृत्व में किसानों ने:

  • NH डिपो पर तालाबंदी की
  • अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया
  • प्रशासन के खिलाफ सीधी चेतावनी दी

30 मार्च को होगी ‘महापंचायत’

किसानों ने आंदोलन को और तेज करते हुए 30 मार्च को जिला स्तरीय महापंचायत बुलाने का ऐलान किया है।

👉 किसान नेताओं का कहना:

“अब यह सिर्फ पुलिया नहीं, NH से जुड़ी हर समस्या की लड़ाई है — और इसका फैसला धरने से होगा।”

धरने में कौन-कौन शामिल?

धरने में बड़ी संख्या में किसान और BKU पदाधिकारी मौजूद रहे, जिनमें प्रमुख हैं: मुकेश कुमार, डॉ. विजय चौधरी, विकार अहमद, विनीत मौर्य, रजनीश अहलावत, संदीप त्यागी, तिलकराम, आशू चौधरी, नरपाल सिंह, जितेंद्र सिंह, कर्मवीर सिंह, बृजेश कुमार, अमरदीप सिंह, माजिद प्रधान, सौरभ, रवि कुमार, मोनवीर, मोंटी चौधरी, राजीव कुमार और डॉ. शशी।

विश्लेषण: क्यों उग्र हो रहा है आंदोलन?

यह मामला केवल एक पुलिया तक सीमित नहीं है, बल्कि कई गहरे मुद्दों को उजागर करता है:

🔸 1. जमीनी वादों का क्रियान्वयन कमजोर

घोषणाएं होती हैं, लेकिन काम समय पर नहीं होता।

🔸 2. स्थानीय समस्याओं की अनदेखी

ग्रामीण इलाकों की बुनियादी जरूरतें अक्सर प्राथमिकता में नहीं रहतीं।

🔸 3. किसान संगठनों की बढ़ती सक्रियता

अब किसान सिर्फ मांग नहीं, बल्कि आंदोलन के जरिए समाधान चाहते हैं।

🔸 4. प्रशासन पर भरोसे का संकट

बार-बार आश्वासन के बावजूद काम न होना विश्वास को कमजोर कर रहा है।

आगे क्या हो सकता है?

  • महापंचायत में बड़ी भीड़ जुटी तो आंदोलन प्रदेश स्तर तक फैल सकता है
  • NH और प्रशासन पर तत्काल कार्रवाई का दबाव बढ़ेगा
  • मुद्दा राजनीतिक रंग भी ले सकता है

निष्कर्ष

बरूकी का यह आंदोलन साफ संकेत है कि अब ग्रामीण मुद्दों पर धीमी प्रशासनिक कार्रवाई स्वीकार नहीं की जाएगी
यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में और बड़ा रूप ले सकता है।

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