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राहुल गांधी की बयानबाज़ी से कांग्रेस असहज: क्या अब पार्टी को रफ़ूगर नहीं पैबन्द चाहिए?

राहुल गांधी की बयानबाज़ी से कांग्रेस असहज: क्या अब पार्टी को रफ़ूगर नहीं पैबन्द चाहिए ?

कभी वोट चोरी, कभी गांधी हत्या पर थ्योरी—राहुल गांधी के बयान से कांग्रेस परेशान

सुयोग फीचर्स

संपादन : अवनीश त्यागी 

राजनीति में अक्सर बयानबाज़ी पार्टी की ताकत बढ़ाने के बजाय उसकी साख को कमजोर कर देती है। कांग्रेस इस समय ठीक उसी स्थिति में खड़ी दिखाई देती है, जैसे उस बचपन की कहानी का सेठ, जिसकी ऊल-जलूल गपों को बचाने के लिए “रफूगर” रखा गया था।

बचपन की कहानी और राजनीति का आईना

कहानी याद होगी—मन्द बुद्धि सेठ गप्पें हाँकता था, लोग मज़ाक उड़ाते थे। इज्ज़त बचाने के लिए उसने एक चतुर आदमी रखा जिसे नाम दिया गया “रफूगर।”

  • एक बार सेठ ने कहा कि “आसमान से कबाब बरसे।” सब हँस पड़े। तब रफूगर ने तुरंत कहानी गढ़ दी कि बाज थैली लेकर उड़ गया, थैली फटी और कबाब गिरे। लोग मान गए।
  • दूसरी बार सेठ ने दावा किया कि गोली शेर के पीछे-पीछे मुड़ी और गुफा तक जाकर लगी। अब रफूगर भी हार गया और बोला—“हुज़ूर, इसमें रफ़ू नहीं, पैबन्द लगेगा।”

कांग्रेस की हालत भी कुछ ऐसी ही है—हर बयान के बाद कार्यकर्ता सोच में पड़ जाते हैं कि इसे कैसे “जस्टीफाई” किया जाए।

राहुल गांधी और बयानबाज़ी की मुश्किलें

2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस गदगद थी। एनडीए की हार के दावे हो रहे थे, चुनाव आयोग पर कोई सवाल नहीं था। लेकिन सरकार न बनी और मोदी सरकार पहले से अधिक आक्रामक तेवरों में फैसले लेती रही। अब वही कांग्रेस कह रही है—“वोट चोरी हो गया।”

राहुल गांधी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाते हैं और मीडिया को लगता है कि कोई बड़ा धमाका होगा। लेकिन मुद्दे वही पुराने—

  • वोटर लिस्ट में मृतकों का नाम
  • एक वोटर का कई जगह पंजीकरण
  • फोटो की गड़बड़ी

ये समस्याएँ नई नहीं, बल्कि दशकों पुरानी हैं, और डिजिटलीकरण से लगातार घट रही हैं। सवाल ये है कि जब वोटर लिस्ट पर आपत्तियाँ दर्ज करने का मौका हर बार मिलता है तो कांग्रेस के ज़मीनी कार्यकर्ता कर क्या रहे थे?

सर्वे और माफी का झटका

राहुल गांधी ने जिस सर्वे कंपनी के आंकड़ों के आधार पर आरोप लगाए, उसी कंपनी ने बाद में “गलत मिलान” मानकर माफी मांग ली। कांग्रेस का तर्क ढह गया और पार्टी बीच मझधार में फंस गई।

गांधी हत्या पर नया विवाद

यह विवाद थमा भी नहीं था कि राहुल गांधी ने गांधीजी की हत्या को लेकर नया बयान दे दिया—“गोडसे ने संविधान लागू न हो पाए, इसलिए हत्या की।”
तथ्य यह है—

  • महात्मा गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई।
  • संविधान का ड्राफ्ट तक तैयार नहीं हुआ था।
  • संविधान लागू हुआ 26 जनवरी 1950 को।

इतिहास की इतनी बड़ी चूक विपक्ष ही नहीं, गठबंधन सहयोगियों को भी असहज कर देती है।

राहुल गांधी के अटपटे अंदाज़

  • संसद में प्रधानमंत्री से गले मिलना और आंख मारना
  • राफेल और अडानी जैसे मुद्दों पर बार-बार बूमरैंग होना
  • वीर सावरकर पर बयान से महाराष्ट्र सहयोगियों को परेशान करना

इन सबने कांग्रेस को विपक्ष की बड़ी ताकत बनने से रोक रखा है।

निष्कर्ष: रफ़ू से आगे की ज़रूरत

कांग्रेस के हालात ऐसे हैं कि अब कोई “रफूगर” भी काम नहीं आएगा। पार्टी को सच्चे पैबन्द की ज़रूरत है—

  • बयानबाज़ी पर अनुशासन
  • ज़मीनी स्तर पर मजबूती
  • तथ्यों पर आधारित राजनीति

वरना आने वाले समय में पैबन्द से भी काम न चले।

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