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नरेगा घोटाला : बिजनौर में 10 लाख की गड़बड़ी, तीन बार बदले गए जांच अधिकारी

                      नरेगा घोटाला:

बिजनौर में 10 लाख की गड़बड़ी, तीन बार बदले गए जांच अधिकारी

क्या दोषियों को बचाने की हो रही है कोशिश ?

लखनऊ(उ.प्र.) मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति के बावजूद, बिजनौर में मनरेगा योजना के तहत 10 लाख रुपये से अधिक की गड़बड़ी का मामला अब शासनिक खेल का रूप लेता दिख रहा है। आरोप है कि दोषी पाए गए राजपत्रित अधिकारी (तत्कालीन बीडीओ) को बचाने के लिए बार-बार जांच अधिकारी बदले जा रहे हैं, जिससे निष्पक्ष जांच पर सवाल उठने लगे हैं।

कैसे सामने आया घोटाला:
बिजनौर में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के प्रशासनिक मद में 10,67,754 रुपये और अन्य मद में 9,400 रुपये की संदिग्ध निकासी का मामला सतर्कता विभाग की रिपोर्ट में सामने आया था। 15 फरवरी 2024 को शासन ने इस पर कार्रवाई करते हुए तत्कालीन बीडीओ को हटाकर मेरठ मंडल के संयुक्त विकास आयुक्त कार्यालय से संबद्ध कर दिया था, लेकिन बाद में उन्हें बरेली मंडल स्थानांतरित कर दिया गया।

      जांच अधिकारी बार-बार बदलने का खेल:
सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में तीन बार जांच अधिकारी बदले जा चुके हैं। यह बदलाव तब हुआ जब जांच की दिशा दोषी अधिकारी की ओर जाती दिख रही थी। बार-बार अधिकारी बदलने से स्पष्ट है कि कहीं न कहीं भ्रष्टाचार को दबाने और दोषियों को बचाने की कोशिश की जा रही है।

मोहम्मदपुर देवमल ब्लॉक में भी अनियमितताएं:
सिर्फ मनरेगा ही नहीं, मोहम्मदपुर देवमल ब्लॉक में भी तत्कालीन बीडीओ पर भूसमतलीकरण योजना के तहत 2 लाख रुपये की अधिकतम सीमा को तोड़ते हुए, एक-एक लाभार्थी को 3-3 लाख रुपये जारी करने के आरोप लगे हैं। इस मामले की जांच ब्लॉक स्तरीय जूनियर इंजीनियर और एडीओ को सौंप दी गई है, जिससे निष्पक्ष जांच की संभावना और भी कमजोर हो गई है।

         जांच के नाम पर लीपापोती का अंदेशा:

विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार जांच अधिकारियों का बदलना एक रणनीति हो सकती है ताकि दोषियों को पर्याप्त समय मिल जाए और वे दस्तावेजों में हेरफेर कर सकें। ब्लॉक स्तर पर उन्हीं कर्मचारियों को जांच की जिम्मेदारी देना, जो खुद उसी तंत्र का हिस्सा हैं, सवालों के घेरे में है।

जनता की नाराजगी और मांग:
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि जब तक जांच लोकायुक्त या सीबीआई जैसी एजेंसी को नहीं सौंपी जाती, तब तक निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती।

         सरकार के लिए साख का सवाल

यह मामला योगी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की सफलता की असली परीक्षा इस बात से होगी कि क्या दोषियों को सजा मिलती है, या फिर जांच के नाम पर महज लीपापोती की जाती है।

क्या होगा आगे:
अब सभी की नजरें शासन द्वारा गठित नई जांच समिति पर हैं, जो दो महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने के लिए बाध्य है। अगर इस बार भी जांच प्रभावित होती है, तो यह मामला प्रदेश में प्रशासनिक जवाबदेही पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर सकता है।

इस पूरे प्रकरण ने दिखा दिया है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं और उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए सिर्फ सख्त नीति ही नहीं, बल्कि ईमानदार इरादे भी जरूरी हैं। अब देखना यह है कि शासन इस मामले में कितनी गंभीरता दिखाता है — क्या दोषियों पर वाकई कार्रवाई होगी, या फिर यह घोटाला भी फाइलों में दफन हो जाएगा?

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