Target Tv Live

बिजली कर्मियों का निजीकरण के खिलाफ लंबा संघर्ष: 8 मार्च को होगी निर्णायक बैठक

 बिजली कर्मियों का निजीकरण के खिलाफ लंबा संघर्ष: 8 मार्च को होगी निर्णायक बैठक

Lakhnow उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मचारियों का निजीकरण के खिलाफ जारी आंदोलन अब निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के आह्वान पर प्रदेशभर में लगातार 97वें दिन बिजली कर्मियों ने विरोध प्रदर्शन किया। यह संघर्ष केवल अपने हक की लड़ाई नहीं, बल्कि प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था को बचाने की एक व्यापक मुहिम बन गया है।

संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने साफ कर दिया है कि 8 मार्च को लखनऊ में केंद्रीय पदाधिकारियों की संयुक्त बैठक में आंदोलन के अगले चरण की घोषणा की जाएगी। समिति ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन को निजीकरण की जिद छोड़नी होगी, क्योंकि इससे प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था और उपभोक्ताओं दोनों को नुकसान हो रहा है।

संघर्ष और सुधार का दोहरा अभियान

समिति का कहना है कि बिजली कर्मी सिर्फ संघर्ष ही नहीं, बल्कि सुधार के लिए भी तैयार हैं। उन्होंने दावा किया कि यदि प्रबंधन निजीकरण की योजना छोड़कर सुधार की प्रक्रिया में कर्मचारियों को शामिल करे, तो एक साल के भीतर एटी एंड सी हानियों को राष्ट्रीय मानक 15% से नीचे लाया जा सकता है। यह बयान यह दर्शाता है कि कर्मचारी संगठन राज्य की ऊर्जा व्यवस्था को सुधारने के प्रति कितने समर्पित हैं।

भ्रष्टाचार बनाम पारदर्शिता की लड़ाई

संघर्ष समिति ने यह भी आरोप लगाया कि निजीकरण के पीछे भ्रष्टाचार की मंशा है। समिति ने चेतावनी दी है कि यदि प्रबंधन अपनी जिद पर अड़ा रहा, तो वे इस पूरे मसले से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों को सार्वजनिक करेंगे। इसके लिए नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रिसिटी इंप्लाइज एंड इंजीनियर्स के नेतृत्व में मार्च के महीने में चार बड़ी रैलियां आयोजित की जाएंगी, जिनकी तारीख 8 मार्च को घोषित की जाएगी।

प्रदेशव्यापी विरोध और जनसमर्थन

वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, गोरखपुर, मथुरा, झांसी, अयोध्या सहित प्रदेश के प्रमुख शहरों और परियोजनाओं पर विरोध सभाएं जारी हैं। कर्मचारी संगठन जनता को समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि निजीकरण से बिजली की दरें बढ़ेंगी और सेवाओं की गुणवत्ता गिर सकती है।

आंदोलन का भविष्य: निर्णायक मोड़ पर संघर्ष

8 मार्च की बैठक में आंदोलन की आगामी रणनीति पर बड़ा फैसला लिया जाएगा। क्या सरकार और पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन कर्मचारियों की मांगों पर विचार करेंगे, या फिर यह संघर्ष और तेज होगा? यह सवाल फिलहाल खुला है, लेकिन एक बात स्पष्ट है — यह आंदोलन सिर्फ कर्मचारियों का नहीं, बल्कि प्रदेश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और उपभोक्ताओं के हित की लड़ाई बन चुका है।

आने वाले दिनों में इस संघर्ष की दिशा और ऊर्जा क्षेत्र की नीतियों पर इसका असर पूरे प्रदेश की राजनीति और जनता के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। क्या संघर्ष समिति और प्रबंधन के बीच कोई संवाद होगा, या फिर उत्तर प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था एक बड़े टकराव की ओर बढ़ेगी? इसका जवाब 8 मार्च के बाद ही साफ हो पाएगा।

– विशेष संवाददाता

Leave a Comment

यह भी पढ़ें