अत्यधिक महत्वाकांक्षा से टूटते परिवार: एक चिंतन

लेखिका प्रियंका सौरभ
संपादन: अवनीश त्यागी
“बिखर रहे चूल्हे सभी, सिमटे आँगन रोज।
नई सदी ये कर रही, जाने कैसी खोज॥”
आज के समाज में पारिवारिक संरचना तेजी से बदल रही है। परिवार, जो कभी भारतीय संस्कृति की सबसे मज़बूत कड़ी था, अब प्रतिस्पर्धा, महत्वाकांक्षा और आत्मकेंद्रित मानसिकता के कारण बिखर रहा है। रिश्तों में अपनापन कम हो रहा है, और लोगों का झुकाव भौतिक संपन्नता की ओर अधिक हो गया है।
परिवारों के विघटन के प्रमुख कारण
- अत्यधिक महत्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धा – परिवार में सहयोग और एकजुटता की जगह प्रतिस्पर्धा ने ले ली है। रिश्ते भावनाओं के बजाय स्वार्थ पर टिके हैं।
- आर्थिक और सामाजिक दबाव – पैसों और संपत्ति के मामलों में तनाव बढ़ रहा है, जिससे पारिवारिक कलह बढ़ती जा रही है।
- संवाद की कमी – आधुनिक जीवनशैली में परिवार के सदस्यों के बीच संवाद घट रहा है, जिससे गलतफहमियाँ बढ़ रही हैं।
- संयुक्त परिवारों का विघटन – एकल परिवारों की संख्या बढ़ने से सामूहिकता की भावना कम हो रही है। बुजुर्गों की अनदेखी एक गंभीर समस्या बन चुकी है।
- संस्कारों में गिरावट – नई पीढ़ी में पारिवारिक मूल्यों के प्रति उदासीनता बढ़ रही है, जिससे आपसी सम्मान और आदर की भावना कमजोर हो रही है।
“बड़े बात करते नहीं, छोटों को अधिकार।
चरण छोड़ घुटने छुए, कैसे ये संस्कार॥”
समाधान की दिशा में प्रयास
- संवाद को बढ़ावा दें – परिवार के सदस्यों को खुलकर बातचीत करनी चाहिए, जिससे मनमुटाव कम हो।
- संयुक्त परिवार की संस्कृति को पुनर्जीवित करें – पारिवारिक सहयोग और सामूहिकता को प्रोत्साहित करें।
- बुजुर्गों का सम्मान और देखभाल – परिवार के बड़े बुजुर्ग अनुभव और ज्ञान के स्रोत होते हैं, उन्हें अकेला न छोड़ें।
- संस्कारों और नैतिक मूल्यों की शिक्षा – बच्चों को पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों का महत्व समझाएं।
- सकारात्मक प्रतिस्पर्धा अपनाएं – परिवार में प्रतिस्पर्धा की जगह सहयोग और सहअस्तित्व की भावना को बढ़ावा दें।
“घर-घर में मनभेद है, बचा नहीं अब प्यार।
फूट-कलह ने खींच दी, हर आँगन दीवार॥”
परिवार केवल खून का रिश्ता नहीं, बल्कि भावनात्मक सहारा और सामाजिक संतुलन का आधार है। यदि परिवार कमजोर पड़ते हैं, तो समाज भी कमजोर होगा। हमें समझना होगा कि केवल भौतिक समृद्धि से जीवन सार्थक नहीं होता, बल्कि रिश्तों की गर्माहट और आपसी सहयोग ही असली सुख का आधार हैं।
“बच पाए परिवार तब, रहता है समभाव।
दुःख में सारे साथ हो, सुख में सबसे चाव॥”
हमें परिवार की इस गिरती संरचना को बचाने के लिए व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर प्रयास करने होंगे, ताकि भावी पीढ़ी को एक सशक्त और स्थिर पारिवारिक ढांचा मिल सके।











