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आज के बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत किसकी? विशेषज्ञ बोले—माँ के समय और संवाद की

आज के बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत किसकी? विशेषज्ञ बोले—माँ के समय और संवाद की

करियर, मोबाइल और अकेलेपन के बीच बच्चों को संस्कार कैसे दे रही हैं आज की माताएँ?

लेखक: डॉ. सत्यवान सौरभ
प्रस्तुति: अवनीश त्यागी | TargetTvLive

आज की तेज रफ्तार जिंदगी में भले ही तकनीक और आधुनिक शिक्षा ने बच्चों की दुनिया बदल दी हो, लेकिन एक सच आज भी नहीं बदला—बच्चे की पहली शिक्षक उसकी माँ ही होती है। बच्चा सबसे पहले माँ की गोद में ही प्यार, विश्वास, संवेदनशीलता और रिश्तों की अहमियत समझना सीखता है। यही वजह है कि परिवार और समाज की मजबूत नींव तैयार करने में माँ की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल बच्चों को किताबों का ज्ञान दे सकते हैं, लेकिन जिंदगी जीने के संस्कार घर से ही मिलते हैं। बच्चा अपनी माँ को देखकर सीखता है कि दूसरों का सम्मान कैसे करना है, मुश्किल समय में धैर्य कैसे रखना है और परिवार की जिम्मेदारियाँ कैसे निभानी हैं। माँ का व्यवहार ही बच्चे के व्यक्तित्व की पहली पाठशाला बनता है।

बदल रहा है पालन-पोषण का तरीका

समय के साथ परिवारों की संरचना और बच्चों की परवरिश का तरीका भी तेजी से बदला है। पहले संयुक्त परिवारों में बच्चे दादा-दादी और पूरे परिवार के बीच बड़े होते थे, लेकिन अब छोटे परिवारों का दौर है। माता-पिता दोनों कामकाजी हैं और बच्चों के साथ बिताने का समय लगातार कम होता जा रहा है।

ऐसे में कामकाजी माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती करियर और मातृत्व के बीच संतुलन बनाने की है। कई महिलाएँ ऑफिस और घर की दोहरी जिम्मेदारी निभा रही हैं। इसके बावजूद समाज अक्सर यह मान लेता है कि कामकाजी माँ बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाती, जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों को केवल ज्यादा समय नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण समय की जरूरत होती है।

मोबाइल और सोशल मीडिया बन रहे नई चुनौती

डिजिटल दौर में मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और इंटरनेट बच्चों की जिंदगी का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। माता-पिता की व्यस्तता के कारण कई बच्चे भावनात्मक रूप से अकेलापन महसूस करने लगते हैं और धीरे-धीरे डिजिटल दुनिया में खो जाते हैं।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यदि घर में संवाद कम हो जाए, तो बच्चों में तनाव, चिड़चिड़ापन और अवसाद जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। इसलिए आज माँ की भूमिका केवल पढ़ाई और खान-पान तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बच्चों की मानसिक स्थिति को समझना भी उतना ही जरूरी हो गया है।

“परफेक्ट माँ” की छवि बना रही दबाव

सोशल मीडिया पर आज “परफेक्ट माँ” की ऐसी तस्वीर दिखाई जाती है, जिसमें माँ हमेशा खुश, व्यवस्थित और हर जिम्मेदारी को आसानी से निभाती हुई नजर आती है। लेकिन वास्तविक जीवन इससे काफी अलग है। माँ भी इंसान है, उसे भी आराम, भावनात्मक सहयोग और सम्मान की जरूरत होती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मातृत्व को केवल त्याग और बलिदान तक सीमित करके देखना गलत है। परिवार के अन्य सदस्यों को भी बच्चों की जिम्मेदारी साझा करनी चाहिए ताकि माँ पर मानसिक दबाव कम हो सके।

समाज और सरकार की भी बड़ी जिम्मेदारी

सामाजिक विचारकों का मानना है कि मातृत्व को मजबूत करने के लिए सरकार और समाज दोनों को आगे आना होगा। कामकाजी महिलाओं के लिए सुरक्षित कार्यस्थल, पर्याप्त मातृत्व अवकाश, डे-केयर सुविधाएँ और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसी व्यवस्थाएँ समय की जरूरत बन चुकी हैं।

माँ ही बनाती है बच्चे का व्यक्तित्व

डॉ. सत्यवान सौरभ का मानना है कि माँ केवल बच्चे को जन्म नहीं देती, बल्कि उसके व्यक्तित्व को आकार देती है। बच्चा माँ की गोद में केवल बोलना नहीं सीखता, बल्कि इंसानियत, संवेदनशीलता और रिश्तों की कीमत भी समझता है।

बदलते समय और आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच आज भी यदि कोई रिश्ता बच्चे को सबसे ज्यादा भावनात्मक सुरक्षा और निस्वार्थ प्रेम देता है, तो वह माँ का रिश्ता ही है। यही कारण है कि आज भी यह बात पूरी तरह सच मानी जाती है कि घर की पहली शिक्षक माँ ही होती है।

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