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“सफाई, फॉगिंग और सर्वे के दावे—बिजनौर में हर साल क्यों फेल होता है सिस्टम?”

“कागज़ी दावे या ज़मीनी हकीकत?”—बिजनौर में संचारी रोग नियंत्रण अभियान पर उठे सवाल, 1 अप्रैल से बड़ा अभियान शुरू

बिजनौर | 19 मार्च 2026

जिले में बढ़ते संचारी रोगों की चुनौती के बीच कलेक्ट्रेट सभागार में जिलाधिकारी जसजीत कौर की अध्यक्षता में एक अहम समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक में आगामी 1 अप्रैल से 30 अप्रैल 2026 तक चलने वाले विशेष संचारी रोग नियंत्रण अभियान की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई। प्रशासन ने इसे लेकर सख्त निर्देश दिए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं।

क्या हैं प्रशासन के बड़े निर्देश?

जिलाधिकारी ने स्वास्थ्य विभाग समेत सभी संबंधित विभागों को स्पष्ट निर्देश दिए कि:

  • अभियान को माइक्रो प्लान के अनुसार ही संचालित किया जाए
  • नगर निकाय और ग्राम पंचायत स्तर पर सफाई व्यवस्था नियमित रखी जाए
  • नालियों में एंटी लार्वा छिड़काव और फॉगिंग अनिवार्य रूप से कराई जाए
  • घर-घर सर्वे कर बुखार के मरीजों की पहचान और उपचार सुनिश्चित किया जाए
  • आमजन को जागरूक करने के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए
  • स्कूलों में विशेष अभियान चलाकर बच्चों को स्वच्छता और बचाव के प्रति जागरूक किया जाए

बैठक में मुख्य विकास अधिकारी रण विजय सिंह, मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. कौशलेंद्र सिंह, जिला विद्यालय निरीक्षक, बेसिक शिक्षा अधिकारी सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।

जमीनी हकीकत: क्या सिर्फ आंकड़ों में सिमटा अभियान?

हालांकि प्रशासन हर साल संचारी रोग नियंत्रण को लेकर बड़े दावे करता है, लेकिन वास्तविक स्थिति कुछ और ही कहानी बयां करती है।

👉 पिछले वर्षों में:

  • फॉगिंग और लार्वासाइड छिड़काव केवल औपचारिकता बनकर रह गया
  • कई इलाकों में नियमित सफाई का अभाव देखने को मिला
  • सर्वे और जागरूकता अभियान कागज़ों तक सीमित रहे

ऐसे में सवाल उठता है—क्या इस बार भी अभियान सिर्फ आंकड़ों में सफलता दिखाने तक सीमित रहेगा या वास्तव में जमीनी बदलाव नजर आएगा?

क्यों अहम है यह अभियान?

बिजनौर जैसे जिलों में गर्मी के मौसम में डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया जैसे रोग तेजी से फैलते हैं। यदि समय रहते:

  • जलभराव रोका जाए
  • मच्छरों की रोकथाम हो
  • और लोगों को जागरूक किया जाए

तो इन बीमारियों पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।

एक्सपर्ट नजरिया: सिस्टम बनाम क्रियान्वयन

नीतियां और प्लानिंग मजबूत होने के बावजूद सबसे बड़ी चुनौती क्रियान्वयन (Execution) की रहती है।
जब तक:

  • स्थानीय निकाय सक्रिय नहीं होंगे
  • फील्ड स्तर पर निगरानी मजबूत नहीं होगी
  • और जवाबदेही तय नहीं होगी

तब तक ऐसे अभियान अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे।

निष्कर्ष: इस बार नतीजे देंगे या फिर दोहराए जाएंगे पुराने हालात?

प्रशासन ने इस बार सख्ती के संकेत जरूर दिए हैं, लेकिन असली परीक्षा 1 अप्रैल से शुरू होने वाले अभियान के दौरान जमीनी स्तर पर होगी

👉 अगर निर्देशों का ईमानदारी से पालन हुआ, तो जिले में संचारी रोगों पर नियंत्रण संभव है
👉 लेकिन अगर पुरानी लापरवाही दोहराई गई, तो यह अभियान भी सिर्फ “फाइलों का खेल” बनकर रह जाएगा

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