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भारतीय न्याय प्रणाली में लंबित मामलों की बढ़ती चुनौती: न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान

भारतीय न्याय प्रणाली में लंबित मामलों की बढ़ती चुनौती: न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान

संपादन : अवनीश त्यागी 
भारतीय न्यायपालिका पर बढ़ते हुए लंबित मामलों का दबाव एक गंभीर समस्या बन गया है, जो न केवल न्यायिक प्रक्रिया की गति को बाधित कर रहा है, बल्कि न्याय के प्रति जनता के विश्वास को भी कमज़ोर कर रहा है। रिसर्च स्कॉलर प्रियंका सौरभ के विश्लेषणात्मक लेख के अनुसार, देश की अदालतों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिसमें से लगभग 50 लाख मामले एक दशक से भी अधिक पुराने हैं।

इस जटिल स्थिति का सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ता है, जो सालों तक अदालतों में न्याय की आस लगाए बैठे रहते हैं। “न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है” यह कथन भारतीय न्यायपालिका की मौजूदा स्थिति को बखूबी परिभाषित करता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा गति से निचली अदालतों के ही मामलों को निपटाने में 300 साल से ज्यादा का समय लग सकता है।

लंबित मामलों के प्रमुख कारण

  1. न्यायाधीशों की कमी: भारत में प्रति दस लाख लोगों पर केवल 21 न्यायाधीश उपलब्ध हैं, जो विकसित देशों की तुलना में बेहद कम है।
  2. सरकार सबसे बड़ी वादी: सरकारी विभागों द्वारा अनावश्यक अपील और छोटी-छोटी बातों पर मुकदमे दायर करना अदालतों पर अनावश्यक बोझ डालता है।
  3. पुरानी अदालती प्रक्रियाएं: मैन्युअल दस्तावेज़ीकरण, बार-बार स्थगन और धीमी केस मैनेजमेंट प्रणाली प्रक्रिया को और जटिल बनाते हैं।
  4. वैकल्पिक विवाद समाधान की उपेक्षा: मध्यस्थता और सुलह जैसे विकल्पों को अब तक पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है, जिससे छोटे विवाद भी वर्षों तक लटके रहते हैं।

देरी के प्रभाव

न्यायिक देरी न केवल सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करती है, बल्कि आर्थिक विकास पर भी भारी असर डालती है। मुकदमेबाजी की बढ़ती लागत और मामलों की लंबी अवधि व्यवसायों को हतोत्साहित करती है, जिससे संसाधनों की बर्बादी होती है। उदाहरण के लिए, बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद में 70 साल की देरी ने सांप्रदायिक सौहार्द को प्रभावित किया और पूरे देश में तनाव की स्थिति बनी रही।

समाधान की दिशा में कदम

लेख में सुझाए गए समाधानों पर गौर करें, तो न्याय प्रणाली को अधिक कुशल और प्रभावी बनाने के लिए ठोस सुधारों की आवश्यकता है:

  • न्यायिक बुनियादी ढांचे का विस्तार: अधिक न्यायालयों की स्थापना और न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना।
  • तकनीकी समाधान: एआई-आधारित केस ट्रैकिंग और डिजिटल दस्तावेज़ीकरण से प्रक्रिया में तेजी लाई जा सकती है।
  • वैकल्पिक विवाद समाधान को बढ़ावा: वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम (2015) और मध्यस्थता अधिनियम (2023) जैसे क़ानूनों का सख्ती से पालन कर, अदालतों पर बोझ कम किया जा सकता है।
  • कानूनी प्रक्रियाओं का सरलीकरण: पुराने और अप्रासंगिक कानूनों की समीक्षा कर न्याय प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध बनाया जाना चाहिए।

आगे की राह

एक मज़बूत लोकतंत्र के लिए न्याय की समय पर उपलब्धता अनिवार्य है। इसके लिए न्यायपालिका, सरकार, वकील और आम नागरिकों को मिलकर प्रयास करने होंगे। न्यायिक जवाबदेही को बढ़ावा देना और एक दूरदर्शी नीति के साथ न्याय प्रणाली का आधुनिकीकरण करना समय की माँग है। यदि हम सही दिशा में ठोस कदम उठाएं, तो भारतीय न्यायपालिका में सुधार की उम्मीद की जा सकती है, और “सभी के लिए त्वरित और सुलभ न्याय” की परिकल्पना को साकार किया जा सकता है।

क्या आपको लगता है कि तकनीक और आधुनिक प्रबंधन से ये स्थिति बदल सकती है? या फिर हमें समाज में विवादों को कोर्ट तक ले जाने से पहले सुलझाने की संस्कृति को मजबूत करना चाहिए? अपनी राय ज़रूर साझा करें!

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