“मार्क टली के जाने के बाद सवालों के घेरे में भारतीय पत्रकारिता:क्या चौथा स्तंभ जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है?”

रिपोर्ट |एम पी सिंह,अमरोहा
भारत में बीबीसी के पूर्व संवाददाता और वरिष्ठ पत्रकार सर मार्क टली के निधन ने न सिर्फ पत्रकारिता जगत को शोक में डुबो दिया, बल्कि उसी के साथ भारतीय मीडिया की मौजूदा स्थिति पर भी एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। अमरोहा में आयोजित श्रद्धांजलि सभा जहां उनके निर्भीक, मानवीय और गहन पत्रकारिता के योगदान को याद किया गया, वहीं गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर उठे सवालों ने भारतीय पत्रकारिता की स्वतंत्रता और संस्थागत सम्मान को कटघरे में खड़ा कर दिया।
“मार्क टली और बीबीसी—एक-दूसरे के पर्याय”
उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति और स्वतंत्र पत्रकारों ने सर मार्क टली के निधन पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि वे सिर्फ एक पत्रकार नहीं, बल्कि भारत को समझने और समझाने वाली चेतना थे।
1970 में बीबीसी के भारत संवाददाता के रूप में आए मार्क टली ने भारत को अपना घर बना लिया। भारतीय संस्कृति, समाज और राजनीति की उनकी समझ असाधारण थी।
यूएनआई के रिपोर्टर एवं जिलाध्यक्ष महिपाल सिंह ने कहा कि
“बीबीसी परिवार के लिए मार्क टली का जाना पितामह के जाने जैसा है। वे ज्ञान के आतंक से नहीं, बल्कि विनम्र विद्वता से पहचाने जाते थे।”
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. महताब अमरोहवी ने उनकी चर्चित पुस्तक ‘No Full Stops in India’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को समझने की कोशिश करने वाले हर व्यक्ति को यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए।
श्रद्धांजलि के बीच उठे तीखे सवाल: क्या पत्रकारिता को ‘सुविधा’ से ‘सामान्य’ बना दिया गया?
श्रद्धांजलि कार्यक्रम के समानांतर अमरोहा में पत्रकारों ने एक गंभीर संस्थागत चिंता भी व्यक्त की।
डॉ. महताब अमरोहवी ने कहा कि—
- कोविड-19 के नाम पर मान्यता प्राप्त पत्रकारों की रेल किराया छूट स्थायी रूप से समाप्त कर दी गई
- संसद में मांग उठने के बावजूद बहाली पर कोई ठोस घोषणा नहीं
- प्रेस कॉन्फ्रेंस अब खुले सवाल-जवाब की जगह एकतरफा सूचना तंत्र में बदलती जा रही हैं
- राष्ट्रीय आयोजनों और गणतंत्र दिवस जैसे अवसरों पर पत्रकारों को आमंत्रण कम होते जा रहे हैं
एक पैटर्न या एक नीति?
समिति के संरक्षक तुलाराम ठाकुर ने सवाल उठाया—
“क्या यह सिर्फ आर्थिक या स्वास्थ्य आधारित फैसला है, या चौथे स्तंभ की आवाज़ को व्यवस्थित रूप से कमजोर करने की रणनीति?”
सचिव डॉ. तारिक अज़ीम और उपाध्यक्ष बीएस आर्य ने चेतावनी दी कि इतिहास गवाह है—
जब प्रेस से दूरी बढ़ती है, तो लोकतंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे पहले प्रभावित होती है।
विश्लेषण: सुविधा नहीं, सम्मान का प्रश्न
यह मुद्दा केवल रेल किराया छूट या प्रेस पास तक सीमित नहीं है।
यह सवाल है—
- क्या पत्रकारिता को संस्थागत रूप से कमजोर किया जा रहा है?
- क्या सूचना का प्रवाह जानबूझकर सीमित किया जा रहा है?
- और क्या ‘सवाल पूछने का अधिकार’ अब निमंत्रण और अनुमति पर निर्भर हो गया है?
मार्क टली की विरासत और आज की चुनौती
सर मार्क टली जैसे पत्रकारों ने जिस निर्भीकता, ईमानदारी और जन-संवेदना के साथ पत्रकारिता की, वही आज सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर सामने है।
श्रद्धांजलि सिर्फ शब्दों से नहीं, बल्कि उन मूल्यों की रक्षा से होगी जिनके लिए उन्होंने जीवन भर काम किया।
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