EXCLUSIVE: कोर्ट का आदेश ठेंगा दिखा—शामली में ‘मृतक’ की जमीन पर वारिसों को बांट दिया ₹1.98 लाख का लोन, CM से कार्रवाई की गुहार!
शामली | विशेष संवाददाता TargetTvLive
उत्तर प्रदेश के शामली जिले से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बावजूद बैंकिंग सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। गांव फत्तेपुर निवासी एक किसान ने आरोप लगाया है कि कोर्ट के फैसले के बाद भी उसकी जमीन पर दूसरे पक्ष को बैंक से लाखों का ऋण दे दिया गया।
मामले की जड़: 16 साल पुराना जमीन सौदा
विकास खंड शामली के गांव फत्तेपुर निवासी मदनपाल पुत्र किसन नारायण ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजे गए शिकायत पत्र में बताया कि बुटराडा निवासी इमरान खा पुत्र फैय्याज ने वर्ष 2010 में अपनी कृषि भूमि (खसरा संख्या 98) बेचने के लिए इकरारनामा किया था।
यह इकरारनामा 26 अगस्त 2010 को सब-रजिस्ट्रार कार्यालय शामली में विधिवत पंजीकृत हुआ। लेकिन बाद में इमरान खा अपने वादे से मुकर गया, जिसके बाद मामला न्यायालय पहुंचा।
कोर्ट का फैसला: मदनपाल बना जमीन का वैध मालिक

लंबी सुनवाई के बाद 5 फरवरी 2026 को सिविल जज शामली ने मदनपाल के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उक्त भूमि का स्वामित्व उन्हें सौंप दिया।
फैसले के बाद मदनपाल ने संबंधित अधिकारियों—अपर जिलाधिकारी, अग्रणी बैंक प्रबंधक और उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक, शाखा बुटराडा—को लिखित सूचना देकर अनुरोध किया कि इस भूमि पर किसी अन्य व्यक्ति को कोई लाभ न दिया जाए।
बैंक की बड़ी चूक या मिलीभगत?
शिकायत के अनुसार, सभी अधिकारियों को सूचना देने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा, 23 मार्च 2026 को उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक शाखा बुटराडा के प्रबंधक ने मृतक इमरान खा के वारिसों को ₹1,98,000 प्रति व्यक्ति का ऋण स्वीकृत कर दिया।
लोन पाने वाले वारिसों में शामिल हैं:
- अदीबा खा
- अब्दुला खा
- इरम खान
- मौ. सलमान खा
- फरिया खा
- रुकैया खा
यह कदम सीधे तौर पर न्यायालय के आदेश की अनदेखी माना जा रहा है।
PM किसान योजना में भी गड़बड़ी का आरोप
मदनपाल ने यह भी आरोप लगाया है कि इमरान खा के वारिसों ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत भी अनुचित लाभ उठाया है।
उन्होंने मांग की है कि अब तक प्राप्त सभी किस्तों की वसूली की जाए और संबंधित लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो।
मुख्यमंत्री से सीधी शिकायत, जांच की मांग
मदनपाल ने अपने आवेदन के साथ सभी दस्तावेज और न्यायालय के आदेश की प्रतियां संलग्न करते हुए मुख्यमंत्री से मांग की है कि:
- पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए
- बैंक प्रबंधक और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच हो
- दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए
- गलत तरीके से वितरित ऋण और सरकारी लाभ की वसूली हो
प्रशासनिक चुप्पी पर उठे सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब न्यायालय का आदेश स्पष्ट था, तो संबंधित विभागों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की?
क्या यह महज लापरवाही है या फिर किसी स्तर पर मिलीभगत?
विश्लेषण: क्यों बड़ा है यह मामला?
- न्यायालय के आदेश की संभावित अवहेलना
- बैंकिंग सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल
- सरकारी योजनाओं में संभावित दुरुपयोग
- प्रशासनिक निगरानी की कमी उजागर
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला न केवल स्थानीय स्तर बल्कि राज्य स्तर पर भी बड़ा प्रशासनिक मुद्दा बन सकता है।
क्या कहते हैं नियम? (Expert View)
कानूनी जानकारों के मुताबिक, यदि किसी भूमि पर स्वामित्व विवाद न्यायालय द्वारा तय हो चुका है, तो उस भूमि से जुड़े किसी भी वित्तीय या सरकारी लाभ को केवल वैध स्वामी को ही दिया जा सकता है।
ऐसे में बैंक द्वारा ऋण वितरण गंभीर लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है।
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