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गजरौला का ज़हरीला सच: औद्योगिक विकास की कीमत पर ग्रामीणों की ज़िंदगी

 गजरौला का ज़हरीला सच: औद्योगिक विकास की कीमत पर ग्रामीणों की ज़िंदगी

एक महीने से जारी जल-प्रदूषण के खिलाफ जनआंदोलन
अमरोहा | गजरौला | एम पी सिंह की विशेष रिपोर्ट

अमरोहा जिले के औद्योगिक कस्बे गजरौला की चमक के पीछे एक भयावह सच्चाई छिपी है। यहां स्थित रासायनिक कारखानों से निकलने वाला जहरीला कचरा नाईपुरा, तरौली सहित दर्जनों गांवों के भूजल और नदियों को गंभीर रूप से प्रदूषित कर चुका है। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि हैंडपंप और ट्यूबवेल से पीला, काला और पेट्रोल जैसी गंध वाला पानी निकल रहा है, जिसे पीना तो दूर, छूना भी खतरनाक होता जा रहा है।

पानी नहीं, ज़हर पी रहे हैं लोग

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि दूषित पानी के लगातार इस्तेमाल से दमा, त्वचा रोग, पेट की बीमारियों और कैंसर जैसी गंभीर आशंकाएं बढ़ती जा रही हैं। सिर्फ इंसान ही नहीं, फसलें सूख रही हैं, मवेशी बीमार पड़ रहे हैं, जिससे किसानों की आजीविका पर सीधा संकट खड़ा हो गया है।

एक महीने से ज्यादा चला आंदोलन, प्रशासन पर उठे सवाल

इस गंभीर संकट के खिलाफ भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा ने दिसंबर 2025 के अंत में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया था। यह धरना नेशनल हाईवे-9 के किनारे नाईपुरा क्षेत्र के शहबाजपुर डोर में लगातार जारी है।
शुरुआत में ग्रामीणों का भारी समर्थन मिला, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के चलते यह आंदोलन जनवरी 2026 में प्रवेश कर गया और अब एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया।

मातृशक्ति की एंट्री से आंदोलन को नई ताकत

25 जनवरी को आंदोलन ने एक नया मोड़ लिया जब बड़ी संख्या में महिलाएं और गृहणियां धरना स्थल पर पहुंचीं। मातृशक्ति द्वारा लगाए गए प्रदूषण विरोधी नारे और प्रदर्शन ने इस संघर्ष को केवल किसानों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का आंदोलन बना दिया। यह संकेत है कि अब यह लड़ाई सिर्फ पानी की नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण और जीवन के अधिकार की है।

भाकियू नेताओं की दो टूक चेतावनी

धरना स्थल पर भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी, प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान, अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी ओमप्रकाश दरोगा, मंडलाध्यक्ष एहसान अली समेत कई नेताओं ने प्रशासन पर तीखा हमला बोला।
नेताओं ने मांग की—

  • प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों पर सख्त कार्रवाई
  • प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निष्पक्ष जांच
  • दूषित जल की तत्काल सफाई
  • प्रभावित ग्रामीणों और किसानों को उचित मुआवजा

जांच समिति पर भी सवाल

हालांकि प्रशासन ने जांच समिति गठित करने की बात कही है, लेकिन किसानों का आरोप है कि रिपोर्ट दबाई जा रही है और कार्रवाई जानबूझकर टाली जा रही है। यही कारण है कि ठंड, बारिश और कठिन हालात के बावजूद किसान और महिलाएं धरने पर डटे हुए हैं।

औद्योगिक विकास बनाम मानव जीवन

गजरौला का यह मामला एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—
क्या औद्योगिक प्रगति की कीमत ग्रामीणों के स्वास्थ्य और जीवन से चुकाई जाएगी?
यह आंदोलन अब सिर्फ स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि पर्यावरणीय न्याय और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई बन चुका है।

 धरना स्थल पर ये प्रमुख चेहरे रहे मौजूद

इस आंदोलन में वयोवृद्ध किसान नेता चौधरी चरणसिंह, अमरजीत देओल, सहित आसिफ चौधरी, शानू चौधरी, आजम चौधरी, इरशाद गुर्जर, नौशाद चौधरी, विजय सिंह, समरपाल सैनी, ओमप्रकाश सिंह, सतीराम सिंह, रामप्रसाद सिंह, सोमपाल सिंह, वीरेंद्र सिंह, खूबचंद, दिनेश चौहान, तथा संतोष देवी, नीतू देवी, गुड्डी देवी, प्रेमवती, नजमा कुरैशी सहित बड़ी संख्या में किसान और महिलाएं मौजूद रहीं।

गजरौला का दूषित जल संकट यह साफ दर्शाता है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या एक भीषण स्वास्थ्य आपदा का रूप ले सकती है। अब देखना यह है कि प्रशासन जागता है या यह आंदोलन और उग्र रूप लेता है

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