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कब मिलेगा मेहनत का हक? — दो महीने बाद भी तिरंगा बनाने वाली महिलाओं को नहीं मिला भुगतान

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कब मिलेगा मेहनत का हक? — दो महीने बाद भी तिरंगा बनाने वाली महिलाओं को नहीं मिला भुगतान

स्वयं सहायता समूह की मेहनती महिलाओं की पुकार — “हमने तिरंगे बनाए, पर पेट के लिए झंडे नहीं खाते!”

रिपोर्ट। अवनीश त्यागी 

बिजनौर/हल्दौर,नूरपुर।
“देश के लिए तिरंगा हमने पूरे मन से बनाया, लेकिन अब दो महीने से घर का चूल्हा ठंडा है।”
यह दर्द है ग्राम खारी की नाजमा और उनकी साथिनों का, जो राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के अंतर्गत स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के सरकारी दावे अब कागजों तक सीमित नजर आ रहे हैं, जबकि असलियत में महिलाएं अपनी मेहनत का एक-एक रुपया पाने के लिए दर-दर भटक रही हैं।

तिरंगे बनाने में दिन-रात खपा दीं, पर मेहनताना हवा में

  • 15 अगस्त की तैयारियों में ग्राम खारी की महिलाओं को झंडे बनाने का काम मिला।
  • श्रीमती नाजमा के समूह ने अपने परिवार और साथिनों के साथ तीन दिन और तीन रातें जागकर साढ़े पाँच हजार तिरंगे झंडे बनाए।
  • उन्होंने विकास खंड हल्दौर कार्यालय को समय से पहले ही झंडे उपलब्ध करा दिए।
  • अधिकारियों ने कहा — “भुगतान जल्द कर दिया जाएगा।”
  • लेकिन अब दो महीने बीत चुके हैं, और नाजमा के खाते में एक पाई भी नहीं आई।

💬 महिलाओं की व्यथा — “तिरंगे उड़ गए, पर हमारी मेहनत ठहर गई”

  • श्रीमती नाजमा कहती हैं,

    “हमने झंडे बनाते वक्त सोना तक छोड़ दिया था, पर आज पेट पालने के लाले हैं। बीमारी ने परिवार को तोड़ दिया, और मेहनत की मजदूरी नहीं मिली। यह तो अन्याय है।”

  • समूह की अन्य महिलाओं ने बताया कि वे रोजाना मेहनत कर अपने घर का खर्च चलाती हैं, पर इस बार तंत्र की लापरवाही ने उनकी ‘आत्मनिर्भरता’ को असहायता में बदल दिया।

नूरपुर, जलीलपुर की कहानी भी अलग नहीं — 10 हजार झंडों का भी भुगतान अटका

  • नूरपुर क्षेत्र की समूह महिलाओं ने 10,000 वहीं जलीलपुर की महिलाओं ने 5 हजार तिरंगे झंडे बनाए थे।
  • एडीओ नूरपुर ने बताया कि महिलाओं ने भुगतान के लिए कई बार आवेदन किया,

    “वे हमारे पास बार-बार आती हैं, थक चुकी हैं, अब मीडिया और नेताओं तक शिकायत कर रही हैं।”

अधिकारियों का जवाब — “धन नहीं आया, तभी भुगतान नहीं हुआ”

  • डीसी, एनआरएलएम का कहना है —

    “शासन से अभी तक इस मद में कोई धनराशि प्राप्त नहीं हुई है। जैसे ही धनराशि आएगी, महिलाओं का भुगतान कर दिया जाएगा।”

  • लेकिन सवाल यह है कि धनराशि कब आएगी? और तब तक ये महिलाएं कैसे अपना घर चलाएंगी?

व्यवस्था पर सवाल

  • क्या सरकार के “महिला सशक्तिकरण” अभियान में जमीनी ईमानदारी गायब हो गई है?
  • क्या ग्रामीण क्षेत्र की मेहनतकश महिलाएं सिर्फ पोस्टर और रिपोर्ट तक सीमित रह जाएंगी?
  • क्या तंत्र की धीमी गति और फाइलों की धूल, गरीबों की मेहनत को निगल रही है?

“आत्मनिर्भर भारत” के बीच महिलाएं बनीं ‘आश्वासन निर्भर’

  • जब मेहनत का फल समय पर न मिले तो आत्मनिर्भरता का सपना टूट जाता है।
  • महिलाएं अब कहती हैं —

    “अगली बार अगर ऐसा ही होगा, तो हम काम नहीं करेंगे। हमें आत्मनिर्भर नहीं, भूखा बनाया जा रहा है।”

सामाजिक आक्रोश बढ़ता जा रहा है

गांवों में चर्चा है कि महिलाएं प्रशासनिक उदासीनता से तंग आ चुकी हैं।
कई समूह अब डीएम से मिलने की तैयारी में हैं और सोशल मीडिया पर भी अपनी व्यथा साझा करने लगी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण — मेहनत का सम्मान जरूरी है

सरकारी योजनाओं का असली चेहरा तभी बदल सकता है जब मेहनत का मूल्य समय पर मिले।
महिलाओं ने जिस जुनून से तिरंगे तैयार किए, वही जोश अगर प्रशासन दिखा देता तो उन्हें यह दिन न देखना पड़ता।

✍️ निष्कर्ष

“देश का झंडा गर्व से लहराया,
पर उसे सीने वाली महिलाओं की आँखों में अब भी इंतज़ार का साया।”

सरकार को चाहिए कि तुरंत हस्तक्षेप कर इन महिलाओं का भुगतान सुनिश्चित करे —
क्योंकि जब तक मेहनत का हक नहीं मिलेगा, तब तक सशक्तिकरण अधूरा ही रहेगा।

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