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“जनगणना ड्यूटी में महिला शिक्षकों का दर्द फूटा — मंत्री तक पहुंची सीधी शिकायत, बड़ा फैसला तय!”

 TargetTvLive स्पेशल रिपोर्ट | बिजनौर से ग्राउंड जीरो इनसाइड स्टोरी

“जनगणना ड्यूटी में महिला शिक्षकों की मुश्किलें बनीं बड़ा मुद्दा — मंत्री से सीधी शिकायत, प्रशासन पर बढ़ा दबाव”

बिजनौर। उत्तर प्रदेश में आगामी जनगणना की तैयारियों के बीच महिला शिक्षकों की समस्याएं अब खुलकर सामने आने लगी हैं। उत्तर प्रदेश महिला शिक्षक संघ, जनपद बिजनौर ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) कपिल देव अग्रवाल से शिष्टाचार भेंट कर जमीनी हकीकत साझा की।

इस मुलाकात ने साफ कर दिया है कि जनगणना जैसी अहम प्रशासनिक प्रक्रिया में महिला शिक्षकों की भागीदारी तो सुनिश्चित है, लेकिन उनकी परिस्थितियों को लेकर अब भी संवेदनशीलता की कमी महसूस की जा रही है।

मुद्दा क्या है? — जमीनी हकीकत बनाम सरकारी सिस्टम

संघ की प्रदेश अध्यक्ष सुलोचना मौर्य के निर्देशन में जिला अध्यक्ष रुचिता सिंह और उनकी टीम ने जो तस्वीर पेश की, वह कई सवाल खड़े करती है—

  • जनगणना ड्यूटी के दौरान सुरक्षा को लेकर आशंकाएं
  • लंबी फील्ड ड्यूटी में बुनियादी सुविधाओं की कमी
  • पारिवारिक जिम्मेदारियों और सरकारी कार्य के बीच संतुलन का संकट

👉 यह सिर्फ एक प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि महिला कार्यबल के सम्मान और अधिकारों से जुड़ा बड़ा सवाल बनता जा रहा है।

ज्ञापन में उठाई गईं प्रमुख मांगें

जिलाधिकारी बिजनौर को सौंपे गए ज्ञापन में कई अहम बिंदु शामिल हैं—

  • दिव्यांग एवं गंभीर रूप से बीमार शिक्षकों को जनगणना कार्य से छूट
  • गर्भवती एवं छोटे बच्चों की देखभाल कर रही महिला शिक्षकों को राहत
  • सेवानिवृत्ति के करीब (2 वर्ष शेष) शिक्षकों को कार्य से मुक्त करने की मांग
  • महिला शिक्षकों के लिए सुरक्षा और सुविधा के ठोस इंतजाम

👉 ये मांगें केवल राहत नहीं, बल्कि व्यवहारिक और मानवीय प्रशासन की दिशा में जरूरी कदम मानी जा रही हैं।

मंत्री का आश्वासन — कितना असरदार?

राज्य मंत्री कपिल देव अग्रवाल ने प्रतिनिधिमंडल को भरोसा दिलाया कि—

“किसी भी महिला का शोषण नहीं होने दिया जाएगा और सभी बिंदुओं पर गंभीरता से विचार होगा।”

हालांकि, सवाल यही है कि क्या यह आश्वासन जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई में बदलेगा या फिर फाइलों तक सीमित रह जाएगा?

विश्लेषण: क्यों अहम है यह मामला?

यह पूरा घटनाक्रम तीन बड़े संकेत देता है—

1. नीतियों और वास्तविकता में गैप

सरकारी योजनाएं बनती हैं, लेकिन क्रियान्वयन में महिला कर्मचारियों की वास्तविक जरूरतें अक्सर नजरअंदाज हो जाती हैं।

2. महिला कार्यबल की बढ़ती आवाज

अब महिला शिक्षक संगठित होकर अपनी समस्याओं को सीधे सत्ता के सामने रख रही हैं—यह बदलाव का संकेत है।

3. प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा

अब जिलास्तर पर प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह संवेदनशील निर्णय लेकर उदाहरण पेश करे।

कौन-कौन रहीं मौजूद?

इस दौरान वर्षा रानी, पारुल चौधरी, कामिनी गोयल, कहकशा रहीम, प्रीती, पल्लवी, स्मिता, शोभा, आँचल, शाइस्ता, पूनम सहित कई महिला शिक्षिकाएं मौजूद रहीं।

TargetTvLive निष्कर्ष

जनगणना जैसे राष्ट्रीय कार्य में महिला शिक्षकों की भागीदारी जरूरी है, लेकिन उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जिम्मेदारियों को नजरअंदाज कर आगे बढ़ना न सिर्फ अन्याय होगा बल्कि प्रशासनिक असंतुलन भी पैदा करेगा।

👉 अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि बिजनौर प्रशासन और राज्य सरकार इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से लेते हैं।

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