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“संस्कार और नवाचार का संगम” — संपूर्णानंद में 23वाँ दीक्षांत समारोह नए आयाम के साथ

“संस्कार और नवाचार का संगम” — संपूर्णानंद में 23वाँ दीक्षांत समारोह नए आयाम के साथ

वाराणसी की गौरवशाली संस्कृत परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय ने मंगलवार को 23वाँ दीक्षांत समारोह आयोजित किया। यह सिर्फ एक शैक्षिक उत्सव नहीं, बल्कि एक संकेतात्मक घटना थी — जहां परंपरा और आधुनिकता का संतुलन तलाशने की दिशा दिखाई दी। इस समारोह ने यह स्पष्ट किया कि संस्कृत और भारतीय संस्कृति को वर्तमान युग में सिर्फ संरक्षित नहीं किया जाना है, बल्कि उन्हें नवाचार और विश्वदृष्टि के साथ आगे ले जाना है।

कुलाधिपति से नई दिशा — संस्कृत से विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश
राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि संस्कृति और ज्ञान का आधार है। उन्होंने छात्रों को प्रेरित किया कि वे संस्कृत के माध्यम से विश्व-बंधुत्व का संदेश फैलाएँ।

नवीन पाठ्यक्रम व डिजिटलीकरण — संस्कृत अध्ययन में आधुनिक स्पर्श
कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों का वर्णन करते हुए यह भी बताया कि आने वाले समय में संस्कृत पारंपरिक विषयों को आधुनिक विषयों के साथ जोड़ने की योजना है। साथ ही विश्वविद्यालय ने शोध एवं डिजिटलीकरण के क्षेत्र में कदम बढ़ाने की बात कही।

बुलेट पॉइंट्स 

1. समारोह की रूपरेखा एवं अंकगणना

  • कुल 350 विद्यार्थियों को दी गई विभिन्न उपाधियाँ — स्नातक, परास्नातक एवं शोध स्तर पर।
  • 27 छात्रों को स्वर्ण पदक — उत्कृष्ट प्रदर्शन और विशिष्ट उपलब्धियों के लिए सम्मान।
  • समारोह में विश्वविद्यालय एवं अतिथि गणों की गरिमापूर्ण उपस्थिति।

2. राज्यपाल का महत्वाकांक्षी संदेश

  • संस्कृत को केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान और संस्कृति का आधार मानते हुए।
  • युवा पीढ़ी से उम्मीद — संस्कृत से “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा विश्व पटल पर ले जाना।
  • वैश्विक स्तर पर भारत की संस्कृति एवं विचार प्रणाली को नई पहचान देना।

3. कुलपति की योजनाएँ और नवोन्मेष

  • विश्वविद्यालय की शैक्षणिक उपलब्धियों और शोध कार्यों का प्रस्तुतीकरण।
  • भविष्य की योजना — संस्कृत + आधुनिक विषय (जैसे: सूचना विज्ञान, पर्यावरण अध्ययन आदि) को पाठ्यक्रम में समाविष्ट करना।
  • डिजिटलीकरण: पुराने ग्रंथों का डिजिटल संरक्षण, ऑनलाइन पाठ्य सामग्री, ई-लाइब्रेरी आदि पहल का उल्लेख।

4. चुनौतियाँ और संभावनाएँ

  • संस्कृत अध्ययन की प्रासंगिकता बनाए रखना — युवाओं में रुचि उत्पन्न करना।
  • आधुनिक विषयों के साथ संतुलन — पारंपरिक सिद्धांत और वर्तमान आवश्यकताओं का मिलन।
  • संसाधन, शिक्षक एवं बुनियादी संरचना — डिजिटल उपकरण, शोध अनुदान आदि की उपलब्धता।
  • प्रतिष्ठा एवं संवाद — संस्कृत क्षेत्र को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान देना।

समर्थन व समीक्षा की दृष्टि

यह दीक्षांत समारोह एक संकेत था — कि संस्कृत विश्वविद्यालयों को अब सिर्फ भाषा-शिक्षण केंद्र नहीं बनना है, बल्कि ज्ञान, नवोन्मेष और वैश्विक संवाद का केंद्र बनना है।
राज्यपाल की उपस्थिति और उनका भाषण सिर्फ औपचारिकता नहीं थे, बल्कि यह एक दिशा-निर्देश की तरह थे — कि संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि भविष्य की जड़ हो सकती है।

कुलपति की योजनाएँ — नए विषयों का समावेश और डिजिटलीकरण — यदि सफलतापूर्वक लागू हो जाएँ, तो संपूर्णानंद विश्वविद्यालय न केवल उत्तर भारत में संस्कृत शिक्षा का एक आधुनिक केंद्र बन सकता है, बल्कि वैश्विक अध्ययन-संस्थान के साथ प्रतिस्पर्धा करने की भी क्षमता रखता है।

 

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