बड़ी खबर | विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति का अल्टीमेटम — “हमारा पक्ष सुने बिना फैसला लिया तो नियामक आयोग मुख्यालय पर मौन प्रदर्शन”
ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ता तनाव — निजीकरण की प्रक्रिया पर संघर्ष समिति का सख्त रुख, नियामक आयोग से वार्ता की मांग
लखनऊ, 08 अक्टूबर 2025 | विशेष संवाददाता
उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मचारियों का असंतोष लगातार उफान पर है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने निजीकरण की प्रक्रिया में तेजी और पारदर्शिता की कमी पर गंभीर सवाल उठाते हुए आज विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार को पत्र भेजा है। समिति ने चेतावनी दी है कि यदि आयोग ने बिना उनका पक्ष सुने आरएफपी डॉक्यूमेंट पर निर्णय लिया — तो सैकड़ों बिजलीकर्मी आयोग मुख्यालय पर मौन प्रदर्शन करेंगे।
संघर्ष समिति की मुख्य बातें
- वार्ता की मांग:
संघर्ष समिति ने नियामक आयोग से आग्रह किया है कि पावर कॉर्पोरेशन द्वारा दिए गए आरएफपी डॉक्यूमेंट पर निर्णय लेने से पहले समिति को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए। - चेतावनी:
यदि आयोग ने समिति की बात सुने बिना निर्णय लिया, तो “विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति” के आह्वान पर प्रदेश भर से कर्मचारी आयोग मुख्यालय पर शांतिपूर्ण मौन प्रदर्शन करेंगे। - सत्ता-प्रबंधन गठजोड़ का आरोप:
समिति ने कहा है कि यह “बहुत ही गंभीर” बात है कि सरकार, पावर कॉर्पोरेशन प्रबंधन और नियामक आयोग के बीच निजीकरण को लेकर मिलीभगत दिखाई दे रही है।
“कौड़ियों के भाव निजी हाथों में सौंपने की साजिश”
संघर्ष समिति के केंद्रीय पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों की एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की परिसंपत्तियों को कुछ निजी घरानों के हाथ “कौड़ियों के दाम” सौंपने की तैयारी है।
समिति का कहना है कि यह कदम न केवल कर्मचारियों के भविष्य पर संकट है, बल्कि उपभोक्ताओं के हितों के भी खिलाफ है।
60 हजार संविदा कर्मियों की नौकरी पर संकट
समिति ने कहा कि निजीकरण के बाद:
- करीब 60,000 संविदा कर्मियों की नौकरियां खत्म हो जाएंगी,
- 16,500 नियमित कर्मचारी पदावनति का सामना करेंगे,
- और इससे पूरे बिजली तंत्र में असंतोष की लहर दौड़ जाएगी।
आंदोलन का 315वां दिन — विरोध जारी
बिजली कर्मियों का यह विरोध कोई नया नहीं है।
संघर्ष समिति के नेतृत्व में आंदोलन को 315 दिन पूरे हो चुके हैं।
प्रदेश के सभी जनपदों में आज भी बिजली कर्मचारी निजीकरण के विरोध में नारेबाजी और प्रदर्शन कर रहे हैं।
संघर्ष समिति का संदेश
संयोजक शैलेन्द्र दुबे ने कहा —
“विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति का यह स्पष्ट मत है कि जब तक आयोग हमारे पक्ष को सुने बिना कोई निर्णय नहीं लेता, हम शांतिपूर्ण विरोध के लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग करेंगे। निजीकरण केवल रोजगार नहीं, उपभोक्ता हित और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा का भी प्रश्न है।”
निष्कर्ष
ऊर्जा क्षेत्र में निजीकरण को लेकर बढ़ती खींचतान ने अब सरकार बनाम कर्मचारी संघर्ष का रूप ले लिया है।
एक ओर सरकार इसे “कार्यक्षमता बढ़ाने की पहल” बता रही है, वहीं दूसरी ओर कर्मचारी संगठन इसे “सार्वजनिक संपत्ति की बिक्री” मान रहे हैं।
अब सबकी निगाहें नियामक आयोग पर हैं —
क्या आयोग संघर्ष समिति को वार्ता का मौका देगा या विरोध का यह मौन प्रदर्शन बिजली व्यवस्था की नई हलचल बनेगा?
📍रिपोर्ट: ऊर्जा संवाद डेस्क, उत्तर प्रदेश
📞 संपर्क: 9415006225 (शैलेन्द्र दुबे, संयोजक











