समीक्षक: अवनीश त्यागी, बिजनौर
शब्दों के विस्तृत आकाश में, जहाँ विचारों की स्याही बहती है,
वहीं खड़े हैं अवनीश त्यागी, समीक्षा की दीपशिखा लिए।
हर पंक्ति की गहराई में उतरते, हर अक्षर को तराशते,
साहित्य की नदी में मंथन कर, मोती सहज ही निकालते।
बिजनौर की धरा से उपजी यह दृष्टि, निष्पक्ष और निर्भीक,
जो साहित्य के सत्य को खोजती, भावों की परख में है सजीव।
शब्दों का यह श्रृंगार, समीक्षा का यह अनमोल दर्पण,
हर लेखक की रचना को देता एक नया स्पंदन।
शीलहरण की कहे कथाएँ

महाभारत हो रहा फिर से अविराम।
आओ मेरे कृष्णा, आओ मेरे श्याम॥शकुनि चालें चल रहा है,
पाण्डुपुत्रों को छल रहा है।
अधर्म की बढ़ती ज्वाला में,
संसार सारा जल रहा है। ।
बुझा डालो जो आग लगी है,
प्रेम-धारा बरसाओ मेरे श्याम॥शासक आज बने शैतान,
मूक, विवश है संविधान।
झूठ तिलक करवा रहा,
खतरे में है सच की जान।।
गूंज उठे फिर आदर्शी स्वर,
मोहक बांसुरी बजाओ मेरे श्याम॥दु: शासन की क्रूर निगाहें,
भरती हर पल कामुक आहें।।
कदम-कदम पर खड़े लुटेरे,
शीलहरण की कहे कथाएँ।।
खोए न लाज कोई पांचाली,
आकर चीर बढ़ाओ मेरे श्याम॥आग लगी नंदन वन में,
रूदन हो रहा वृंदावन में।
नित जन्मते रावण-कंस,
बढ़ रहा पाप भुवन में।।
मिटे अनीति, अधर्म, अंधकार सारे,
आकर आशादीप जलाओ मेरे श्याम॥
प्रियंका सौरभ
शीलहरण की कहे कथाएँ: एक कविता में समाहित यथार्थ की पुकार
समीक्षक : अवनीश त्यागी, बिजनौर
प्रियंका सौरभ की कविता वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिवेश को एक दार्शनिक दृष्टिकोण से दर्शाती है। इसमें महाभारत के प्रसंगों का उपयोग कर समकालीन भारत की ज्वलंत समस्याओं को उजागर किया गया है।
समाज में बढ़ता अधर्म और अन्याय
कविता के पहले ही छंद में कवयित्री महाभारत के संदर्भ से वर्तमान परिस्थितियों की तुलना करती हैं—”महाभारत हो रहा फिर से अविराम”—यह पंक्ति यह संकेत करती है कि समाज में अधर्म और अन्याय का चक्र फिर से उसी तीव्र गति से घूम रहा है, जैसा द्वापर युग में हुआ था। राजनीति में शकुनि की चालों की तरह षड्यंत्र रचे जा रहे हैं, और पांडवों (सच्चाई और न्याय) को छलने का प्रयास किया जा रहा है।
न्याय प्रणाली की विवशता और सत्ता की अमानवीयता
कविता में आगे संविधान की विवशता को दर्शाया गया है। “शासक आज बने शैतान, मूक, विवश है संविधान”—इस पंक्ति से कवयित्री स्पष्ट करती हैं कि सत्ताधीशों के स्वार्थपूर्ण निर्णयों और नैतिक पतन के कारण न्यायपालिका भी मूकदर्शक बनी हुई है। झूठ को बढ़ावा मिल रहा है, जबकि सत्य खतरे में पड़ गया है।
महिला सुरक्षा और द्रौपदी के चीरहरण का प्रतीकात्मक संदर्भ
दुशासन के दुराचार की कहानी पुनः दोहराई जा रही है, इस संकेत के साथ कि समाज में स्त्रियों की सुरक्षा खतरे में है। “शीलहरण की कहे कथाएँ”—इस वाक्य में यह पीड़ा साफ झलकती है कि नारी अस्मिता की रक्षा के लिए एक बार फिर कृष्ण जैसे रक्षक की आवश्यकता है।
नैतिक पतन और अधर्म का प्रकोप
कविता के अंतिम छंद में नंदन वन में आग लगने और वृंदावन के रुदन का जिक्र किया गया है, जो यह संकेत करता है कि चारों ओर अराजकता, भ्रष्टाचार और अनैतिकता का बोलबाला है। नित नए रावण और कंस पैदा हो रहे हैं, जो समाज में पाप और अधर्म को बढ़ावा दे रहे हैं।
क्या यह कविता एक नई क्रांति की पुकार है ?
प्रियंका सौरभ की यह कविता केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है। यह पाठकों को झकझोर कर यह प्रश्न पूछने पर मजबूर कर देती है कि क्या हम सच में एक नए महाभारत की ओर बढ़ रहे हैं? क्या हमें फिर से एक कृष्ण की आवश्यकता है, जो सत्य, न्याय और धर्म की स्थापना कर सके?
यह कविता हमें आत्ममंथन करने के लिए बाध्य करती है कि क्या हम इस अधर्म के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखते हैं, या फिर एक बार फिर इतिहास को खुद को दोहराने देंगे?













