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किताबें और अख़बार: ज्ञान और विचारशीलता की अनमोल धरोहर

किताबें और अख़बार: ज्ञान और विचारशीलता की अनमोल धरोहर

डॉ सत्यवान सौरभ

ज की डिजिटल दुनिया में किताबें और अख़बार पीछे छूटते जा रहे हैं। सोशल मीडिया, इंटरनेट और त्वरित मनोरंजन ने पढ़ने की संस्कृति को धीरे-धीरे ख़त्म कर दिया है। जहाँ पहले किताबें और समाचार पत्र घरों में नियमित रूप से पढ़े जाते थे, वहीं अब मोबाइल स्क्रीन ने इनकी जगह ले ली है। इस बदलाव ने न केवल युवाओं के ज्ञान को प्रभावित किया है, बल्कि उनके सोचने, समझने और संवाद करने की क्षमता को भी सीमित कर दिया है।

पढ़ने की गिरती प्रवृत्ति और उसका प्रभाव

पहले माता-पिता बच्चों को किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। समाचार पत्रों से दुनिया की घटनाओं की जानकारी मिलती थी, और साहित्य व आत्मकथाएँ जीवन को नई दिशा देते थे। लेकिन आज की उपभोक्तावादी संस्कृति में पढ़ने की आदत हाशिए पर चली गई है। अधिकतर माता-पिता खुद भी नियमित रूप से नहीं पढ़ते, जिससे बच्चों को इस ओर प्रेरणा नहीं मिलती। जब घरों में किताबें, अख़बार और पत्रिकाएँ ही नहीं होंगी, तो युवाओं में पढ़ने की रुचि कैसे विकसित होगी?

इंटरनेट का प्रभाव: सूचना बनाम ज्ञान

इंटरनेट ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन यह मुख्य रूप से सूचना का स्रोत है, ज्ञान का नहीं। सोशल मीडिया के आकर्षण में फँसे युवा गहराई से पढ़ने और विश्लेषण करने के बजाय सतही जानकारी से संतुष्ट हो जाते हैं। वे सुबह अख़बार पढ़ने की बजाय स्मार्टफ़ोन पर रील्स और पोस्ट देखने में व्यस्त रहते हैं। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे उन्हें गंभीर अध्ययन और चिंतन से दूर कर रही है।

पढ़ने की आदत: सफलता और आत्मनिर्भरता की कुंजी

इतिहास गवाह है कि दुनिया के हर सफल व्यक्ति में पढ़ने की गहरी रुचि रही है। किताबें ज्ञान का भंडार होती हैं और मनुष्य के सोचने-समझने की शक्ति को बढ़ाती हैं। नियमित रूप से पढ़ने से आत्मविश्वास बढ़ता है, संवाद कौशल विकसित होता है और कल्पनाशीलता को नया आयाम मिलता है। आत्मकथाएँ और विचारोत्तेजक पुस्तकें व्यक्ति को समस्याओं का समाधान खोजने की प्रेरणा देती हैं।

समाधान: पढ़ने की आदत को पुनर्जीवित करना

इस स्थिति को बदलने के लिए माता-पिता और शिक्षकों को मिलकर काम करना होगा। घरों में किताबों और अख़बारों की मौजूदगी ज़रूरी है। बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करने के लिए अभिभावकों को खुद भी पढ़ना होगा। स्कूलों और कॉलेजों में पुस्तकालयों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और डिजिटल स्क्रीन के बजाय प्रिंट मीडिया को समय देने की आदत विकसित करनी होगी।

अगर हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी ज्ञान और मूल्यों से संपन्न हो, तो हमें किताबों और समाचार पत्रों की ओर लौटना होगा। इंटरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग ज़रूरी है, लेकिन इसे सूचना तक सीमित रखना चाहिए, न कि ज्ञान का एकमात्र स्रोत बना लेना चाहिए। किताबें न केवल हमारी सोच को विकसित करती हैं, बल्कि यह हमें विचारशील और समझदार भी बनाती हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पढ़ने की आदत को फिर से अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ, ताकि हमारा समाज और आने वाली पीढ़ी सशक्त और जागरूक बन सके।

 

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