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पैजनियाँ के सैकड़ों साल पुराने प्राकृतिक तालाब पर संकट!

पैजनियाँ के सैकड़ों साल पुराने प्राकृतिक तालाब पर संकट! औद्योगिक राख से भराव, प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल

खतौनी में निजी नाम, राजस्व रिकॉर्ड में तालाब दर्ज; प्राकृतिक जलस्रोत के अस्तित्व, ग्रामीणों के परंपरागत जलनिकास अधिकार और भूजल प्रदूषण की आशंका ने बढ़ाई चिंता

Target TV Live | विशेष पड़ताल | अवनीश त्यागी

बिजनौर। चांदपुर तहसील के ग्राम पैजनियाँ में सैकड़ों वर्ष पुराने प्राकृतिक तालाब को मिट्टी के साथ कथित औद्योगिक राख डालकर पाटे जाने का मामला गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जिस तालाब का गांव की पुरानी जलनिकासी व्यवस्था और प्राकृतिक जलसंचय से संबंध बताया जा रहा है, उसके अस्तित्व पर संकट की आशंका ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वर्तमान खतौनी में निजी व्यक्ति का नाम दर्ज होने के बावजूद भूमि की श्रेणी राजस्व अभिलेखों में तालाब/जलाशय अंकित बताई जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या निजी स्वामित्व का दावा किसी पुराने प्राकृतिक जलस्रोत का स्वरूप बदलने का अधिकार भी देता है?

सैकड़ों साल पुराना तालाब, अब मिट्टी और औद्योगिक राख से भरने का आरोप

पैजनियाँ का यह तालाब ग्रामीणों के अनुसार सैकड़ों वर्षों से प्राकृतिक जलस्रोत के रूप में अस्तित्व में है। गांव की पुरानी बसावट और जलनिकासी व्यवस्था से इसका संबंध बताया जाता है। आरोप है कि तालाब को मिट्टी के साथ औद्योगिक राख डालकर भरा जा रहा है। यदि ऐसा हो रहा है तो यह केवल तालाब की जमीन भरने का मामला नहीं, बल्कि संभावित पर्यावरणीय खतरे की जांच का विषय भी है।

औद्योगिक राख की प्रकृति और उसमें मौजूद तत्वों की जानकारी प्रयोगशाला परीक्षण से ही मिल सकती है। यदि राख में हानिकारक भारी धातुएं या अन्य प्रदूषक मौजूद हैं तो वर्षा के पानी के साथ उनके जमीन में रिसने से मिट्टी और भूजल प्रभावित होने की आशंका हो सकती है। इसलिए राख के स्रोत, परिवहन, गुणवत्ता और निस्तारण की वैधानिक स्थिति की जांच आवश्यक है।

खतौनी में निजी नाम, लेकिन भूमि की श्रेणी तालाब; क्या है कानूनी स्थिति?

इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू राजस्व अभिलेखों में दर्ज भूमि की श्रेणी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार खतौनी में निजी व्यक्ति का नाम दर्ज है, लेकिन भूमि तालाब/जलाशय के रूप में अंकित है। दोनों तथ्यों की कानूनी स्थिति का परीक्षण किए बिना तालाब पाटने की वैधता पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 77 में तालाब, पोखर और झील जैसी भूमि के संबंध में विशेष प्रावधान हैं। ऐसे में यह जांच जरूरी है कि निजी व्यक्ति के नाम भूमि किस आधार पर दर्ज हुई, पुराने बंदोबस्त अभिलेखों में इसकी क्या स्थिति थी और क्या भूमि की श्रेणी या उपयोग बदलने के लिए किसी सक्षम प्राधिकारी से वैध आदेश प्राप्त किया गया है।

महज खतौनी में निजी नाम दर्ज होना तालाब को मनमाने ढंग से पाटने की अनुमति नहीं माना जा सकता। प्रशासन को वर्तमान खतौनी के साथ पुराने खसरे, राजस्व नक्शे और बंदोबस्त अभिलेखों का भी मिलान करना चाहिए।

तहसीलदार का बयान: निजी तालाब है, मालिक समतल कर सकता है

इस संबंध में तहसीलदार चांदपुर का कहना है कि यह व्यक्तिगत तालाब है और विभाग इसमें कुछ नहीं कर सकता। उनके मुताबिक तालाब का मालिक अपने तालाब को समतल कर सकता है तथा इसमें राजस्व विभाग का कोई हस्तक्षेप नहीं है।

भारतीय सुखाधिकार अधिनियम की धारा 15: ग्रामीणों के जलनिकास अधिकार का सवाल

तालाब से जुड़ा दूसरा महत्वपूर्ण कानूनी पक्ष ग्रामीणों के परंपरागत जलनिकास उपयोग का है। ग्रामीणों का कहना है कि इस प्राकृतिक जलस्रोत और उससे जुड़ी व्यवस्था का लंबे समय से उपयोग होता रहा है।

भारतीय सुखाधिकार अधिनियम, 1882 की धारा 15 के तहत किसी दूसरे की अचल संपत्ति से जलनिकास सहित अन्य सुखाधिकार का शांतिपूर्ण, खुले तौर पर, अधिकार के रूप में और बिना व्यवधान लगातार 20 वर्षों तक उपयोग किए जाने पर परिस्थितियों के अनुसार सुखाधिकार अर्जित करने का दावा किया जा सकता है।

हालांकि, तालाब का सैकड़ों वर्ष पुराना होना और जलनिकास के सुखाधिकार की अवधि दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। ग्रामीणों के दावे की पुष्टि पुराने नक्शों, जलनिकास के रास्तों, राजस्व रिकॉर्ड, गवाहों और अन्य दस्तावेजों से करनी होगी। इसका अंतिम निर्धारण सक्षम न्यायालय साक्ष्यों के आधार पर करेगा।

औद्योगिक राख की जांच कौन करेगा? प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका अहम

यदि तालाब में वास्तव में औद्योगिक राख डाली जा रही है तो उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। बोर्ड को मौके का निरीक्षण कर राख के नमूने लेने, उसकी प्रयोगशाला जांच कराने और स्रोत की पहचान करने की मांग की जानी चाहिए।

जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित औद्योगिक इकाई से राख किस उद्देश्य से निकाली गई, उसका परिवहन और निस्तारण किन नियमों के तहत किया जा रहा है तथा तालाब में उसका इस्तेमाल पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप है या नहीं।

बिना परीक्षण राख को जहरीला घोषित करना उचित नहीं होगा, लेकिन उसकी प्रकृति और संभावित प्रभाव की जांच किए बिना उसे सुरक्षित मान लेना भी उचित नहीं है।

जिलाधिकारी बिजनौर के सामने अब तीन महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां

पैजनियाँ के इस मामले में जिला प्रशासन से तीन स्तरों पर कार्रवाई की अपेक्षा है।

  1. राजस्व जांच: जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी चांदपुर संबंधित तहसीलदार एवं लेखपाल से मौके का निरीक्षण कराकर वर्तमान खतौनी, खसरा, पुराने बंदोबस्त अभिलेख और राजस्व नक्शे का मिलान कराएं।
  2. पर्यावरणीय जांच: प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कथित औद्योगिक राख के नमूने लेकर उसकी गुणवत्ता, स्रोत और निस्तारण की वैधता की जांच करे।
  3. तत्काल संरक्षण: जांच में प्रथम दृष्टया वैधानिक उल्लंघन पाए जाने पर सक्षम अधिकारी तालाब पाटने और संदिग्ध राख डालने की गतिविधि पर अंतरिम रोक लगाने के लिए तत्काल आदेश जारी करे। उल्लंघन प्रमाणित होने पर लागू कानून के अनुसार कार्रवाई और आवश्यकतानुसार मूल स्वरूप की बहाली सुनिश्चित की जाए।

प्रशासन से पांच सीधे सवाल

  • राजस्व अभिलेखों में तालाब दर्ज भूमि को पाटने का वैधानिक आधार क्या है?
  • क्या भूमि की श्रेणी या उपयोग बदलने की कोई सक्षम अनुमति जारी हुई है?
  • तालाब में डाली जा रही कथित औद्योगिक राख कहां से लाई जा रही है?
  • क्या राख का नमूना लेकर उसकी पर्यावरणीय जांच कराई गई है?
  • तालाब पाटे जाने से पुराने जलनिकास और आसपास की आबादी पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किसने किया है?

मामला सिर्फ जमीन का नहीं, प्राकृतिक विरासत बचाने का है

पैजनियाँ का यह प्रकरण निजी स्वामित्व और राजस्व प्रविष्टियों के विवाद से आगे बढ़कर प्राकृतिक जलस्रोत के संरक्षण, ग्रामीणों के संभावित सुखाधिकार और औद्योगिक अपशिष्ट के सुरक्षित निस्तारण से जुड़ गया है। सैकड़ों वर्ष पुराने तालाब का अस्तित्व समाप्त होने के बाद उसकी प्राकृतिक स्थिति को वापस लाना आसान नहीं होगा।

इसलिए जरूरी है कि जिला प्रशासन मामले को केवल निजी भूमि का विवाद मानकर न छोड़े, बल्कि राजस्व और पर्यावरणीय दोनों पहलुओं की संयुक्त जांच कराए। जांच पूरी होने तक तालाब के स्वरूप को प्रभावित करने वाली गतिविधियों पर वैधानिक रोक लगाने की मांग भी महत्वपूर्ण है।

अब बड़ा सवाल यही है कि राजस्व रिकॉर्ड में तालाब दर्ज होने और औद्योगिक राख के इस्तेमाल की शिकायत के बावजूद पैजनियाँ के इस प्राकृतिक जलस्रोत की सुरक्षा के लिए प्रशासन कब और क्या कदम उठाता है?

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