दहेज कानून पर सुप्रीम कोर्ट के कड़े तेवर! बिजनौर तहसील में लीगल महाचौपाल:
सचिव स्वाति चंद्रा का बड़ा बयान—”पीड़ितों को मिले न्याय,“सच्चे पीड़ितों को मिले न्याय, झूठे मुकदमों का खेल बंद होना जरूरी”

बिजनौर में दाण्डिक अपील ‘राज्य बनाम अजमल बेग’ के अनुपालन में जुटा न्यायिक अमला; SDM स्मृति मिश्रा ने संभाला मोर्चा, DLSA चीफ की हिदायत से हड़कंप!
डिजिटल एक्सक्लूसिव | TargetTvLive ग्राउंड रिपोर्टिंग स्पेशल एनालिसिस: अवनीश त्यागी लोकेशन: बिजनौर (उत्तर प्रदेश) प्रकाशन तिथि: 03 अक्टूबर 2026
बिजनौर। समाज की नसों में ज़हर की तरह फैले दहेज के लेन-देन और अदालतों के गलियारों में कानून के नाम पर खेली जाने वाली ‘अनुचित मुकदमेबाजी’ के खिलाफ शनिवार को बिजनौर तहसील सभागार में एक अभूतपूर्व विधिक क्रांति का आगाज हुआ। सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के तल्ख तेवरों के बीच आयोजित इस ‘विधिक साक्षरता महाचौपाल’ ने जिले के कानूनी और प्रशासनिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रकीर्ण दाण्डिक अपील (उ.प्र. राज्य बनाम अजमल बेग, आदेश 20/08/2026) में दिए गए ऐतिहासिक निर्देशों का पालन करते हुए, जनपद न्यायाधीश व DLSA अध्यक्ष श्री संजय कुमार सप्तम के सीधे मार्गदर्शन में यह महाशिविर संपन्न हुआ।
मंच की कमान उपजिलाधिकारी (SDM) श्रीमती स्मृति मिश्रा के हाथों में थी, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में DLSA सचिव श्रीमती स्वाति चंद्रा ने कानूनी चाबुक चलाते हुए उपस्थित जनसमूह को कानून का असली मकसद समझाया।
“दहेज मांगना जुर्म है, लेकिन कानून को हथियार बनाना उससे भी बड़ा पाप!”
तहसील सभागार में खचाखच भरे महिला और पुरुषों के हुजूम को संबोधित करते हुए सचिव स्वाति चंद्रा ने दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की धारा-दर-धारा विश्लेषणात्मक व्याख्या की। उन्होंने साफ किया कि यह कानून महिलाओं का कवच है, किसी को बेवजह कुचलने का औजार नहीं।
कानून की वो तीन बातें, जो हर नागरिक को जानना जरूरी हैं:
- 1 जुलाई 1961 से प्रभावी कानून: शादी के पहले, शादी के वक्त या शादी के बाद कभी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से माँगी गई संपत्ति, नकदी या मूल्यवान प्रतिभूति (Valuable Security) सीधी-सीधी ‘दहेज’ मानी जाएगी।
- सख्त सजा का प्रावधान: दहेज लेना, दहेज देना या किसी को इसके लिए उकसाना (Abetment) गैर-जमानती और दंडनीय अपराध है।
- दुरुपयोग पर ब्रेक: व्यक्तिगत रंजिश या झूठे आरोपों के आधार पर मनगढ़ंत मुकदमे दर्ज कराने वालों को चेतावनी दी गई कि इससे असली पीड़ितों का हक मारा जाता है।
TargetTvLive विशेष विश्लेषण: ‘अजमल बेग केस’ के बाद क्यों बदल गई कानून की आबो-हवा?
TargetTvLive के लिए अवनीश त्यागी की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट: सुप्रीम कोर्ट के 20 अगस्त 2026 के आदेश ने पूरे प्रदेश के न्यायिक तंत्र को एक नया संदेश दिया है। बिजनौर तहसील का यह शिविर सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि न्यायपालिका की उस बदलती सोच का प्रतीक है जहां “शून्य सहिष्णुता” (Zero Tolerance) की नीति लागू की जा रही है।
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│ TargetTvLive विश्लेषणात्मक टेक (Analytical Take) │
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│ 1. त्वरित न्याय (Fast-Track Justice): │
│ झूठे और फर्जी केस छंटेंगे, तो वास्तविक पीड़ित महिलाओं को │
│ अदालत से महीनों की जगह दिनों में न्याय मिलेगा। │
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│ 2. राजस्व और न्याय का अनूठा तालमेल: │
│ SDM और नायब तहसीलदार स्तर के अधिकारियों का सीधे जनसंवाद │
│ प्रशासनिक जवाबदेही को पारदर्शी बनाता है। │
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│ 3. PLV नेटवर्क का ग्राउंड एक्शन: │
│ पैरालीगल स्वयंसेवक अब गांव-गांव जाकर अदालती मुकदमों से │
│ पहले मध्यस्थता (Pre-Litigation Mediation) कराएंगे। │
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“जब तक समाज में सच और झूठ का फर्क साफ नहीं होगा, तब तक अदालतों का बोझ कम नहीं हो सकता। हमारा मकसद सही पीड़ित को न्याय दिलाना और गलत नीयत से आए मुकदमों को देहरी पर ही खारिज करना है।” — स्वाति चंद्रा, सचिव (जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, बिजनौर)
तहसील सभागार में उमड़ा जनसैलाब, प्रशासनिक अमला रहा मुस्तैद
विधिक साक्षरता के इस विशेष अभियान में तहसील व न्यायिक प्रशासन के आला अधिकारियों की मौजूदगी ने कार्यक्रम को और गंभीरता प्रदान की:
- श्रीमती स्वाति चंद्रा — सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, बिजनौर (अध्यक्षता)
- श्रीमती स्मृति मिश्रा — उपजिलाधिकारी (SDM), बिजनौर (कुशल संचालन)
- श्री विजय कुमार — नायब तहसीलदार, बिजनौर
- श्री संजीव कुमार — पराविधिक स्वयंसेवक (PLV)
- DLSA एवं तहसील प्रशासन के समस्त अधिकारी, कर्मचारीगण तथा सैकड़ों नागरिक।
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