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‘वक्त की हर शह गुलाम…’: फर्जी नियुक्ति के आरोपों से घिरे बाबू के इशारों पर नाच रहा बेसिक शिक्षा विभाग! 

पार्ट 2

‘वक्त की हर शह गुलाम…’: फर्जी नियुक्ति के आरोपों से घिरे बाबू के इशारों पर नाच रहा बेसिक शिक्षा विभाग! 

रिपोर्ट: अवनीश त्यागी                            (एक्सक्लूसिव कवरेज – TargetTvLive)

खास खबर: “वक्त से दिन और रात, वक्त से कल और आज… वक्त की हर शह गुलाम, वक्त का हर शै पे राज!” फिल्म ‘वक्त’ का यह मशहूर नगमा इस समय बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) कार्यालय के ढर्रे पर एकदम सटीक बैठ रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां ‘वक्त के शह’ की भूमिका में कोई वरिष्ठ अफसर नहीं, बल्कि विवादों में रहने वाला राकेश नाम का एक बाबू है, जो पूरे विभाग को अपने इशारों पर चला रहा है।

खुद फर्जी नियुक्ति के घेरे में ‘राकेश बाबू’, जांच फाइलों में दफन

कार्यालय में अपनी मनमानी और ‘पावर गेम’ के लिए चर्चा में बना राकेश बाबू कोई दूध का धुला नहीं है। सूत्रों के मुताबिक:

  • विवादित पृष्ठभूमि: राकेश बाबू की अपनी खुद की नियुक्ति भी फर्जीवाड़े के आरोपों से घिरी हुई है।
  • दबाई गई फाइलें: उसकी विवादित नियुक्ति को लेकर जांच के आदेश तो जारी हुए, लेकिन विभागीय सांठगांठ के चलते जांच रिपोर्ट आज भी सरकारी फाइलों के अंबार में दबाकर रख दी गई है।
  • विभागीय पकड़: खुद पर जांच की तलवार लटकने के बावजूद, राजनीतिक रसूख और सांठगांठ के बल पर वह आज पूरे कार्यालय के नीतिगत फैसलों, तबादलों और आउटसोर्सिंग नियुक्तियों पर ‘सुपर बीएसए’ की तरह हावी है।

‘ना काहू से दोस्ती…’ का दावा, पर ‘हाथी के दांत’ साबित हो रहे BSA!

जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी सचिन कसाना यूं तो अक्सर कार्यालई अनुशासन और निष्पक्षता की दुहाई देते हुए “ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर” का मूलमंत्र जपते नजर आते हैं। लेकिन धरातल की सच्चाई इस दावे को पूरी तरह झुठलाती दिख रही है।

स्थानीय सूत्रों और विभागीय गलियारों में अब यह कहावत उनके रुख पर सटीक बैठ रही है— “हाथी के दांत दिखाने के और, खाने के और”।

  1. कागजी कार्रवाई बनाम जमीनी फैसला: पहले फर्जीवाड़े व कमियों के आधार पर विवादित नियुक्तियों (जैसे DC ट्रेनिंग पद) को निरस्त करने का नाटक किया जाता है।
  2. पर्दे के पीछे ‘सैटलाइट’: बाद में उसी विवादित बाबू राकेश और राजनीतिक आकाओं के दबाव में आकर फैसले पलट दिए जाते हैं।
  3. मौन स्वीकृति: खुद भ्रष्टाचार के घेरे में खड़े बाबू के सामने शीर्ष अधिकारी का यह समर्पण सवाल खड़े करता है कि क्या यह सिर्फ राजनीतिक दबाव है या फिर ‘मलाईदार हिस्सों’ में अफसर की भी मौन सहमति है?

‘डिस्पैच रजिस्टर’ खोल रहा है दोहरे रवैये की पोल

कार्यालय के डिस्पैच रजिस्टर और पत्रावलियों पर यदि निष्पक्ष जांच बैठाई जाए, तो साफ हो जाएगा कि कैसे नियमों को ताक पर रखकर पहले निरस्तीकरण के आदेश निकले और फिर रातों-रात बैकडेट या राजनीतिक सिफारिशों के आधार पर उन्हें बहाल कर दिया गया।

बड़ा सवाल: जब विभाग को चलाने वाला मुख्य कारिंदा (बाबू) खुद फर्जी नियुक्ति के गंभीर आरोपों से घिरा है, तो उसके द्वारा तय की गई अन्य नियुक्तियां और वित्तीय फैसले पारदर्शी कैसे हो सकते हैं? क्या शासन इस ‘सिंडिकेट’ और दबी हुई जांच फाइलों को बाहर निकालेगा?

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