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पश्चिमी यूपी में AIIMS, हाई कोर्ट बेंच और अलग राज्य की मांग क्यों? जानिए 70 साल की पूरी कहानी

हाई कोर्ट बेंच और अलग राज्य: पश्चिमी यूपी की पुरानी मांगों ने फिर पकड़ा जोर, बिजनौर से शिवसेना ने बजाया आंदोलन का बिगुल

PM के नाम ज्ञापन में तीन बड़ी मांगें; दशकों पुरानी हाई कोर्ट बेंच की लड़ाई से लेकर ‘हरित प्रदेश’ तक, जानिए पश्चिमी यूपी में क्यों उठता रहा है अलग पहचान का सवाल

बिजनौर। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में AIIMS, हाई कोर्ट बेंच और अलग राज्य की मांग को लेकर एक बार फिर राजनीतिक-सामाजिक हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। 1 अक्टूबर 2026 को शिवसेना ने इन तीनों मांगों को लेकर प्रधानमंत्री के नाम संबोधित ज्ञापन बिजनौर एसडीएम को सौंपा। संगठन ने संकेत दिया कि ज्ञापन के बाद अभियान को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दूसरे जिलों तक ले जाने की तैयारी है।

Target TV Live | विशेष रिपोर्ट — अवनीश त्यागी

शिवसेना जिला प्रमुख चौधरी वीर सिंह के नेतृत्व में सौंपे गए ज्ञापन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में AIIMS स्थापित करने, हाई कोर्ट बेंच गठित करने और पश्चिमी यूपी को अलग राज्य का दर्जा देने की मांग की गई।

इनमें हाई कोर्ट बेंच और अलग राज्य का मुद्दा नया नहीं है। दोनों मांगों की अपनी लंबी पृष्ठभूमि रही है और अलग-अलग समय पर अधिवक्ताओं, राजनीतिक दलों तथा क्षेत्रीय संगठनों ने इन्हें उठाया है।

1950 के दशक से चल रही हाई कोर्ट बेंच की मांग

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की मांग का इतिहास करीब सात दशक पुराना बताया जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 1950 के दशक में ही पश्चिमी यूपी में इलाहाबाद हाई कोर्ट की बेंच की मांग उठी थी। इसके बाद यह मुद्दा अधिवक्ताओं के आंदोलनों का प्रमुख विषय बन गया।

1981 में इस मांग को लेकर आंदोलन तेज हुआ और केंद्र सरकार ने जस्टिस जसवंत सिंह आयोग गठित किया। आयोग ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बेंच की आवश्यकता पर विचार किया और बाद में आगरा में बेंच स्थापित करने की सिफारिश की थी। यह सिफारिश लागू नहीं हो सकी।

यहीं से आंदोलन में एक दूसरा पेच भी जुड़ा—बेंच मेरठ में हो या आगरा में? पश्चिमी यूपी के अलग-अलग हिस्सों से दोनों स्थानों के पक्ष में तर्क सामने आते रहे हैं। 2003 की राज्यसभा बहस में भी पश्चिमी यूपी के लिए हाई कोर्ट बेंच की जरूरत और मेरठ-आगरा को लेकर मतभेद का उल्लेख हुआ था।

बेंच की मांग के पीछे क्या तर्क है?

पश्चिमी यूपी में बेंच के समर्थकों का प्रमुख तर्क न्याय तक पहुंच आसान और कम खर्चीली बनाना रहा है। 1981 की संसदीय बहस में भी पश्चिमी जिलों और इलाहाबाद के बीच लंबी दूरी तथा मुकदमों से जुड़े लोगों पर पड़ने वाले समय और आर्थिक बोझ का मुद्दा उठाया गया था।

यही तर्क आज भी आंदोलन का आधार है—अधिवक्ताओं और वादकारियों का कहना है कि पश्चिमी यूपी की बड़ी आबादी के लिए प्रयागराज स्थित मुख्य पीठ तक बार-बार पहुंचना व्यावहारिक कठिनाई पैदा करता है।

हाल के वर्षों में भी यह मांग समाप्त नहीं हुई। सितंबर 2026 में पश्चिमी यूपी के अधिवक्ताओं ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर बेंच की मांग उठाई और इसके समर्थन में आंदोलन की बात सामने आई।

अलग राज्य की मांग की जड़ें भी पुरानी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग को अलग-अलग दौर में पश्चिम प्रदेश, हरित प्रदेश, किसान प्रदेश और अन्य नामों से उठाया जाता रहा है। 1955 की राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट में भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विधायकों के एक समूह द्वारा राज्य के विभाजन की मांग का उल्लेख मिलता है। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 97 विधायकों ने पश्चिमी जिलों के संबंध में ज्ञापन दिया था, हालांकि बाद में कई विधायक उससे अलग हो गए।

इसके बाद अलग राज्य की मांग अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर उठती रही। वर्ष 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद पश्चिमी यूपी के लिए हरित प्रदेश की मांग को नया राजनीतिक संदर्भ मिला। शोध अध्ययनों में इस मांग को प्रशासनिक सुविधा, क्षेत्रीय विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे तर्कों से जोड़े जाने का उल्लेख है।

अलग राज्य के पक्ष में दिए जाते रहे प्रमुख तर्क

अलग राज्य के समर्थकों के तर्कों में मुख्य रूप से चार बातें सामने आती रही हैं—

पहला—प्रशासनिक पहुंच। समर्थकों का तर्क है कि उत्तर प्रदेश का आकार बहुत बड़ा है और राजधानी लखनऊ से पश्चिमी जिलों की दूरी प्रशासनिक पहुंच को कठिन बनाती है।

दूसरा—क्षेत्रीय विकास। पश्चिमी यूपी को कृषि, उद्योग, व्यापार और राजस्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र बताते हुए समर्थक कहते रहे हैं कि क्षेत्र की जरूरतों के अनुरूप अलग प्रशासनिक ढांचा बनाया जा सकता है।

तीसरा—स्थानीय प्राथमिकताएं। समर्थकों का कहना है कि पश्चिमी यूपी की भौगोलिक और आर्थिक परिस्थितियां प्रदेश के दूसरे हिस्सों से अलग हैं, इसलिए विकास की प्राथमिकताएं भी क्षेत्र विशेष के आधार पर तय होनी चाहिए।

चौथा—छोटे राज्यों की बहस। उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद यह तर्क अधिक प्रमुख हुआ कि बड़े राज्यों को छोटे प्रशासनिक राज्यों में बांटने से शासन और विकास संबंधी निर्णयों को क्षेत्र के करीब लाया जा सकता है। हालांकि छोटे राज्य अपने आप बेहतर प्रशासन देंगे—यह कोई स्वतः सिद्ध निष्कर्ष नहीं है; इसका आकलन अलग-अलग राज्यों के प्रशासनिक और आर्थिक अनुभवों के आधार पर करना पड़ता है।

2011 में चार राज्यों का प्रस्ताव भी आया था

पश्चिमी यूपी को अलग राज्य बनाने की बहस को 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती सरकार के उस प्रस्ताव से भी बड़ा राजनीतिक संदर्भ मिला, जिसमें उत्तर प्रदेश को चार राज्यों—पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिमी क्षेत्र—में पुनर्गठित करने का विचार रखा गया था। प्रस्ताव आगे लागू नहीं हो सका।

इससे यह स्पष्ट होता है कि उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन का प्रश्न केवल पश्चिमी यूपी तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि समय-समय पर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के प्रशासनिक पुनर्गठन को लेकर व्यापक राजनीतिक बहस होती रही है।

अब शिवसेना ने जोड़ा AIIMS का मुद्दा

इसी पृष्ठभूमि में शिवसेना ने अपने ज्ञापन में AIIMS की स्थापना की मांग भी जोड़ दी है। संगठन का तर्क है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उच्चस्तरीय चिकित्सा संस्थान होने से गंभीर रोगों के इलाज के लिए लोगों को दूसरे बड़े चिकित्सा केंद्रों पर निर्भरता कम हो सकती है।

इस तरह शिवसेना ने तीन अलग-अलग प्रकृति के मुद्दों को एक साथ रखा है—
AIIMS यानी स्वास्थ्य सुविधा, हाई कोर्ट बेंच यानी न्यायिक पहुंच और अलग राज्य यानी प्रशासनिक पुनर्गठन।

ज्ञापन से आगे आंदोलन की तैयारी

शिवसेना जिला प्रमुख चौधरी वीर सिंह ने कहा कि पश्चिमी प्रमुख ललित मोहन शर्मा के आह्वान पर इन मांगों को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सभी जनपदों में आंदोलन शुरू किया जाएगा।

अब देखने वाली बात यह होगी कि यह पहल केवल ज्ञापन और स्थानीय कार्यक्रमों तक सीमित रहती है या पश्चिमी यूपी के विभिन्न जिलों में इसे व्यापक अभियान का स्वरूप मिलता है।

पश्चिमी यूपी की मांगों के सामने अब तीन बड़े सवाल

क्या AIIMS जैसी उच्चस्तरीय स्वास्थ्य सुविधा के लिए कोई ठोस प्रस्ताव आगे बढ़ता है?

क्या दशकों पुरानी हाई कोर्ट बेंच की मांग पर केंद्र और राज्य स्तर पर कोई नई पहल होती है?

और क्या अलग राज्य का मुद्दा फिर से व्यापक जनआंदोलन का रूप ले पाता है?

इन तीन सवालों के जवाब आने वाले समय की राजनीति और क्षेत्रीय आंदोलनों की दिशा से जुड़े होंगे। फिलहाल बिजनौर में सौंपा गया ज्ञापन इस बात का संकेत है कि पश्चिमी यूपी की पुरानी मांगों को नए मुद्दों के साथ फिर से राजनीतिक-सामाजिक विमर्श में लाने की कोशिश शुरू हो गई है।

ज्ञापन देने वालों में ये रहे शामिल

ज्ञापन सौंपने वालों में जिला प्रमुख चौधरी वीर सिंह, मुकेश लंबा, धर्मवीर सिंह तोमर, तहसील अध्यक्ष बंटी शेरावत, रामगोपाल लंबा, जितेंद्र सिंह, शोभित गुर्जर, डॉ. दिनेश कुमार, पवन कुमार, मोहित कुमार, केशव, सचिन कुमार, संदीप चौहान, शशि कुमार, अंतरिक्ष कौशिक, विवेक पाल, सचिन, वीरेंद्र कश्यप, सुरेंद्र शर्मा, डंपी, प्रियांशु चौधरी, विजय मोहन गुप्ता, तुषार, मनोज और अंकित सहित अन्य कार्यकर्ता मौजूद रहे।

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