क्या पोस्टर से बदल जाएगी थानों की व्यवस्था? बिजनौर में पहले भी लग चुके हैं ‘दलालों का प्रवेश वर्जित’ बोर्ड
TargetTvLive | विशेष विश्लेषण
रिपोर्ट: अवनीश त्यागी
बिजनौर। पुलिस थानों के गेट पर इन दिनों एक संदेश खासा चर्चा में है—“दलालों का प्रवेश वर्जित है।” नए पुलिस अधीक्षक के के बिश्नोई के निर्देशों के बाद शुरू हुई यह कवायद अब शहर कोतवाली समेत अन्य थानों में भी नजर आने लगी है। पुलिस नेतृत्व का संदेश साफ है कि थानों के आसपास बिचौलियों की भूमिका निभाने वाले लोगों की मौजूदगी नहीं होनी चाहिए और फरियादियों की शिकायत सीधे सुनी जाए।
लेकिन इस पूरी कवायद के बीच एक पुराना सवाल फिर सामने आ खड़ा हुआ है—क्या ऐसे पोस्टर पहली बार लगाए जा रहे हैं?
जवाब है—नहीं।
पहले भी लग चुके हैं ऐसे बोर्ड, फिर क्यों उठी जरूरत?
बिजनौर ही नहीं, विभिन्न थानों में इससे पहले भी समय-समय पर इस तरह के बोर्ड या चेतावनी संदेश लगाए जाते रहे हैं। उद्देश्य तब भी यही रहा—थाने और फरियादी के बीच किसी बिचौलिए की भूमिका खत्म करना।
ऐसे में मौजूदा पहल को केवल पोस्टर लगाने की कार्रवाई के रूप में देखने के बजाय यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि इस बार व्यवस्था में ऐसा क्या बदलेगा, जो पहले के प्रयासों को स्थायी परिणाम तक नहीं पहुंचा सका?
यही सवाल नए पुलिस नेतृत्व की पहल को गंभीर बनाता है।
पोस्टर पुराना, संदेश फिर नया क्यों?
थाने के गेट पर ‘दलालों का प्रवेश वर्जित’ लिख देना आसान है। मुश्किल है उस संदेश को थाने की रोजमर्रा की कार्यशैली में उतारना।
किसी फरियादी की शिकायत बिना सिफारिश दर्ज हो, उसकी बात अधिकारी सीधे सुनें, जांच निष्पक्ष हो और कार्रवाई की जानकारी उसे समय पर मिले—यही वह व्यवस्था है जो बिचौलियों की जरूरत को खत्म कर सकती है।
यदि यह व्यवस्था कायम होती है तो पोस्टर प्रभावी साबित होगा। अन्यथा वह भी पहले लगे बोर्डों की तरह केवल एक चेतावनी बनकर रह सकता है।
असली सवाल: क्या फरियादी अब सीधे सुना जाएगा?
नए SP केके बिश्नोई की ओर से भ्रष्टाचार पर अंकुश और जनसुनवाई को प्राथमिकता दिए जाने का संदेश ऐसे समय आया है, जब थानों में बिचौलियों की भूमिका को लेकर चर्चा होती रही है।
इसलिए अब निगाह इस बात पर होगी कि पुलिस नेतृत्व का निर्देश जमीन पर कितना उतरता है।
क्या फरियादी को अपनी शिकायत के लिए किसी प्रभावशाली व्यक्ति की जरूरत नहीं पड़ेगी?
क्या पुलिसकर्मी सीधे शिकायत सुनेंगे?
क्या कार्रवाई के लिए सिफारिश का रास्ता बंद होगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या शिकायतकर्ता को थाने से न्याय पाने का भरोसा मिलेगा?
‘दलाल’ की परिभाषा भी स्पष्ट करनी होगी
थाने में आने वाला प्रत्येक बाहरी व्यक्ति दलाल नहीं हो सकता। कोई अधिवक्ता हो सकता है, कोई पीड़ित का परिजन, कोई जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता या पत्रकार।
इसलिए पुलिस को बिचौलियों पर रोक लगाने के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आम नागरिक की वैध शिकायत या सहायता की प्रक्रिया प्रभावित न हो।
असल निशाना उन लोगों पर होना चाहिए जो कथित तौर पर पुलिस और फरियादी के बीच अनधिकृत प्रभाव, सौदेबाजी या सिफारिश का माध्यम बनते हैं।
बोर्ड से ज्यादा जरूरी है पुलिसकर्मियों की जवाबदेही
थानों से बिचौलियों को दूर रखने की कवायद तभी सफल होगी, जब इसके साथ पुलिसकर्मियों की जवाबदेही भी तय हो।
यदि किसी फरियादी की शिकायत दर्ज करने में टालमटोल होती है, उसे बार-बार बुलाया जाता है या कार्रवाई के लिए बाहरी प्रभाव की जरूरत महसूस होती है, तो केवल गेट पर लगा बोर्ड समस्या का समाधान नहीं कर पाएगा।
इसके उलट यदि पुलिस खुद फरियादी तक पहुंचे, शिकायत की निगरानी हो और कार्रवाई समयबद्ध हो, तो बिचौलियों के लिए जगह स्वतः कम हो जाएगी।
इस बार फर्क क्या होगा?
यही मौजूदा अभियान की सबसे बड़ी परीक्षा है।
पहले बोर्ड लग चुके हैं। अब सवाल बोर्ड लगाने का नहीं, बल्कि उसके पीछे की व्यवस्था को स्थायी बनाने का है।
यदि कुछ सप्ताह या महीनों बाद भी थानों में बिचौलियों की भूमिका दिखाई नहीं देती, शिकायतकर्ता बिना सिफारिश अपनी बात रख पाता है और पुलिसकर्मी जवाबदेह दिखाई देते हैं, तभी इसे वास्तविक बदलाव माना जाएगा।
निष्कर्ष
“दलालों का प्रवेश वर्जित है”—यह संदेश सुनने में सख्त है, लेकिन इसकी असली ताकत पोस्टर में नहीं, उसके पालन में है।
बिजनौर के थानों में पहले भी ऐसे बोर्ड लग चुके हैं। इसलिए इस बार जनता की नजर केवल पोस्टर पर नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाले बदलाव पर है।
क्योंकि सवाल यह नहीं कि थाने के गेट पर क्या लिखा है।
सवाल यह है कि थाने के अंदर फरियादी के साथ क्या होता है।
और यही तय करेगा कि इस बार का पोस्टर भी पुरानी कवायद की पुनरावृत्ति है या वास्तव में थानों की कार्यशैली बदलने की शुरुआत।












