77 साल बाद भी अधूरा सवाल: हिंदी राजभाषा है तो अंग्रेजी का वर्चस्व क्यों?
सर्वेश कुमार सिंह
स्वतंत्र पत्रकार, लखनऊ
भारत की सांस्कृतिक चेतना में हिंदी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। देश के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने वाली संपर्क और अभिव्यक्ति की भाषा के रूप में हिंदी का व्यापक विस्तार हुआ है। इसके बावजूद हिंदी को भारत की एकमात्र राजभाषा बनाने का प्रश्न आज भी बहस का विषय बना हुआ है। यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं, बल्कि प्रशासन, शिक्षा, न्याय और जनसामान्य की सहज भागीदारी से भी जुड़ा हुआ है।
हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। इसी दिन वर्ष 1949 में संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। संविधान के अनुच्छेद 343(1) में देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया। हिंदी दिवस मनाने की परंपरा बाद में शुरू हुई और 14 सितंबर को हिंदी के प्रति जन-जागरूकता और उसके व्यापक प्रयोग के संकल्प के अवसर के रूप में स्थापित किया गया।
राजभाषा के साथ अंग्रेजी की निरंतरता
संविधान में हिंदी को संघ की राजभाषा बनाए जाने के साथ यह व्यवस्था भी की गई थी कि एक निश्चित संक्रमणकाल तक अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा। उद्देश्य यह था कि प्रशासनिक और संस्थागत स्तर पर हिंदी की ओर क्रमिक संक्रमण हो सके।
लेकिन यह संक्रमणकाल स्थायी स्थिति में बदल गया। वर्ष 1963 में संसद द्वारा पारित राजभाषा अधिनियम ने अंग्रेजी के प्रयोग को आगे भी जारी रखने का रास्ता खोल दिया। बाद के वर्षों में अंग्रेजी संघ के प्रशासन, उच्च शिक्षा, न्यायपालिका और रोजगार के अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रभावशाली बनी रही।
यहीं से हिंदी को लेकर मूल प्रश्न और जटिल हो गया। सवाल यह नहीं है कि अंग्रेजी का ज्ञान उपयोगी है या नहीं। वैश्विक स्तर पर अंग्रेजी का महत्व अपनी जगह है। प्रश्न यह है कि क्या भारत की शासन व्यवस्था में भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी, को वह स्थान मिल पाया है जिसकी अपेक्षा संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक भागीदारी से की जाती है?
हिंदी बनाम अंग्रेजी नहीं, जनता की भाषा का सवाल
हिंदी के पक्ष में खड़े होने का अर्थ अंग्रेजी का विरोध करना नहीं होना चाहिए। वास्तविक प्रश्न यह है कि शासन और जनता के बीच भाषा की दूरी कितनी कम की जा सकती है।
यदि सरकारी आदेश, प्रशासनिक प्रक्रियाएं, प्रतियोगी परीक्षाएं, उच्च शिक्षा और न्यायिक व्यवस्था ऐसी भाषा में संचालित हों जिसे आम नागरिक सहजता से समझ सके, तो लोकतंत्र की भागीदारी और मजबूत हो सकती है।
इसी संदर्भ में समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया का अंग्रेजी हटाओ आंदोलन उल्लेखनीय रहा। उनका प्रसिद्ध विचार था कि लोकभाषा के बिना लोकराज की कल्पना अधूरी है। यह विचार आज भी भाषा और लोकतंत्र के संबंध पर गंभीर विमर्श का आधार बन सकता है।
टंडन, मालवीय और हिंदी आंदोलन की लंबी परंपरा
हिंदी को सार्वजनिक जीवन और प्रशासन में प्रतिष्ठित करने का संघर्ष स्वतंत्रता के आंदोलन से भी जुड़ा रहा है। राजऋषि पुरुषोत्तम दास टंडन ने हिंदी को राष्ट्रजीवन में प्रतिष्ठित करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संविधान सभा में भी हिंदी के पक्ष में उनका हस्तक्षेप प्रभावशाली रहा।
पंडित मदन मोहन मालवीय सहित अनेक नेताओं और समाजसेवियों ने उत्तर भारत में हिंदी के शासकीय और सार्वजनिक प्रयोग के विस्तार के लिए प्रयास किए। हिंदी साहित्य सम्मेलन जैसे संस्थानों ने भी हिंदी के प्रचार-प्रसार और उसके साहित्यिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
इन प्रयासों की पृष्ठभूमि में हिंदी को केवल साहित्य की भाषा नहीं, बल्कि जनजीवन, शिक्षा और प्रशासन की भाषा बनाने की आकांक्षा रही।
अंग्रेजी के वर्चस्व पर उठते रहे सवाल
देवनागरी के शासकीय प्रयोग की शताब्दी से जुड़े एक समारोह में वर्ष 2000 में लखनऊ के रवींद्रालय में हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल पंडित विष्णुकांत शास्त्री ने भी अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव और भारतीय भाषाओं की स्थिति पर चिंता व्यक्त की थी। उनका मानना था कि किसी भी स्वाभिमानी देश में बच्चों को अपनी भाषा में शिक्षा मिलने का पर्याप्त अवसर होना चाहिए।
यह बहस आज भी प्रासंगिक है। दुनिया के अनेक विकसित देश अपनी मातृभाषाओं में उच्च शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और प्रशासन को आगे बढ़ाते हुए वैश्विक भाषाओं का भी उपयोग करते हैं। भारत में भी ऐसी बहुभाषिक व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जिसमें भारतीय भाषाएं कमजोर न हों और अंग्रेजी ज्ञान के अवसर भी बने रहें।
हिंदी के विकास में शब्दावली भी बनी बहस का विषय
प्रख्यात साहित्यकार डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने भी हिंदी के विकास और उसके शासकीय प्रयोग से जुड़े प्रश्नों पर गंभीर विचार व्यक्त किए थे। वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के संदर्भ में लिखे उनके विचारों में यह चिंता दिखाई देती है कि हिंदी को विकसित करने के नाम पर बनी व्यवस्थाएं कहीं उसके वास्तविक प्रयोग को टालने का माध्यम न बन जाएं।
यह सवाल आज भी विचारणीय है—क्या किसी भाषा को केवल शब्दावली, सरकारी समितियों और औपचारिक आयोजनों से मजबूत किया जा सकता है? अथवा भाषा तभी मजबूत होगी जब वह विज्ञान, तकनीक, न्याय, प्रशासन, चिकित्सा, उच्च शिक्षा और रोजगार के वास्तविक अवसरों में सहज रूप से इस्तेमाल होगी?
तकनीक ने हिंदी के सामने खोले नए रास्ते
पिछले कुछ दशकों में परिस्थितियां बदली हैं। कंप्यूटर और इंटरनेट के विस्तार ने भारतीय भाषाओं के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। यूनिकोड, भारतीय भाषा टूल्स, मोबाइल तकनीक और सोशल मीडिया ने हिंदी में लिखना-पढ़ना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान बना दिया है।
आज हिंदी डिजिटल दुनिया में तेजी से अपनी जगह बना रही है। समाचार पोर्टल, सोशल मीडिया, वीडियो प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन शिक्षा ने हिंदी के उपयोग का दायरा व्यापक किया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि तकनीकी सुविधा मिलने पर हिंदी आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और डिजिटल संचार की भाषा बनने की क्षमता रखती है।
77 साल बाद भी मूल सवाल कायम
1949 में संविधान सभा द्वारा हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किए जाने के लगभग 77 वर्ष बाद भी भाषा का प्रश्न पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसका एक कारण भारत की बहुभाषिक और विविध सांस्कृतिक संरचना भी है। देश के विभिन्न राज्यों की अपनी समृद्ध भाषाएं और भाषाई अस्मिताएं हैं। इसलिए हिंदी के भविष्य की चर्चा करते समय अन्य भारतीय भाषाओं के सम्मान और अधिकारों को भी समान महत्व देना आवश्यक है।
हिंदी को मजबूत करने की बहस यदि अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध के रूप में प्रस्तुत की जाएगी तो उससे भाषाई विवाद बढ़ सकता है। इसके विपरीत यदि हिंदी को भारतीय भाषाओं के व्यापक परिवार का हिस्सा मानते हुए प्रशासन और ज्ञान-विज्ञान में उसके विस्तार की बात की जाए तो यह विमर्श अधिक स्वीकार्य और लोकतांत्रिक हो सकता है।
अब निर्णय की दिशा में बढ़ने की जरूरत
आज आवश्यकता केवल हिंदी दिवस मनाने, भाषण देने और हिंदी सप्ताह आयोजित करने की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का वास्तविक उपयोग शासन, शिक्षा, न्याय और तकनीक में बढ़े।
वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह भाषा के इस लंबे समय से चले आ रहे प्रश्न पर स्पष्ट और दूरदर्शी नीति बनाए। हिंदी को अधिक व्यापक राजकीय उपयोग की भाषा बनाने के साथ-साथ देश की सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान और संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित रखना भी जरूरी है।
भाषा किसी समाज की केवल अभिव्यक्ति नहीं होती, वह उसकी स्मृति, संस्कृति और लोकतांत्रिक भागीदारी का माध्यम भी होती है। इसलिए हिंदी के प्रश्न को भावनात्मक नारों से आगे ले जाकर व्यावहारिक नीति और व्यापक सामाजिक सहमति के स्तर पर देखने की आवश्यकता है।
हिंदी दिवस का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब हिंदी केवल समारोहों और सरकारी विज्ञप्तियों की भाषा न रहकर आम नागरिक के शासन, शिक्षा, न्याय और रोजमर्रा के जीवन में सहज रूप से दिखाई दे।
संपादकीय टिप्पणी अवनीश त्यागी
हिंदी को केवल राजभाषा कह देने से उसका गौरव सुनिश्चित नहीं होगा। उसके लिए सत्ता की भाषा और जनता की भाषा के बीच की दूरी कम करनी होगी।
और यही हिंदी दिवस का सबसे असहज, लेकिन सबसे जरूरी सवाल है—
अगर हिंदी जनता की इतनी बड़ी आवाज है, तो शासन की भाषा बनने में उसे अब भी इतनी लंबी प्रतीक्षा क्यों करनी पड़ रही है?












