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कमाई बढ़ी, रिश्ते घटे! भारत में तेजी से टूट रहे हैं परिवार—चौंकाने वाली रिपोर्ट

‘अकेलेपन की कीमत’: भौतिकवाद की अंधी दौड़ में बिखरते संयुक्त परिवार, टूटता सामाजिक ताना-बाना

भारत में तेजी से टूट रहे संयुक्त परिवार और बढ़ता बुजुर्गों का अकेलापन एक बड़ी सामाजिक चिंता बन चुका है। NFHS-5 और आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि कैसे भौतिकवाद और बदलती जीवनशैली ने रिश्तों को कमजोर कर दिया है। जानिए इस ग्राउंड रिपोर्ट में—क्या खत्म हो रहा है भारतीय परिवार सिस्टम?

रिपोर्ट: अवनीश त्यागी
नई दिल्ली/बिजनौर।
भारत की चमकती अर्थव्यवस्था और तेज़ी से बदलती जीवनशैली के बीच एक सच्चाई लगातार गहराती जा रही है—संयुक्त परिवारों का टूटना और बुजुर्गों का बढ़ता अकेलापन। आधुनिकता की इस दौड़ में हमने बहुत कुछ पाया है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा खोया भी है।

“पैसे आते हैं, लेकिन अपना कोई नहीं आता…” — दर्द की असली कहानी

वाराणसी के सिगरा क्षेत्र के एक पॉश अपार्टमेंट में रहने वाले 70 वर्षीय बुजुर्ग की आंखों में एक अजीब सा सूनापन है।
बेटा-बहू बेंगलुरु में मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत हैं, पोते-पोती विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं।

“हर महीने पैसे आ जाते हैं, लेकिन साल में एक बार भी कोई मिलने नहीं आता…”

यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस बदलते भारत की तस्वीर है जहां रिश्तों की जगह अब बैंक ट्रांजैक्शन ने ले ली है

आंकड़े दे रहे हैं चेतावनी: तेजी से खत्म हो रहे संयुक्त परिवार

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार:

  • संयुक्त परिवारों का प्रतिशत 48% से घटकर 37% रह गया
  • महानगरों में स्थिति और भयावह:
    • मुंबई: 22%
    • दिल्ली: 28%

आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के मुताबिक: ➡️ 45% युवा 30 साल से पहले ही स्वतंत्र (इंडिपेंडेंट) रहना चाहते हैं

👉 यह बदलाव सिर्फ रहन-सहन का नहीं, बल्कि मानसिकता के बड़े परिवर्तन का संकेत है।

‘हम’ से ‘मैं’ तक: बदलती सोच का असर

बनारस के पक्के महाल के एक 80 वर्षीय बुजुर्ग बताते हैं:

“हमारे समय में 20-25 लोग एक साथ रहते थे…
आज दीवाली पर सिर्फ मोबाइल पर मैसेज आता है, कोई साथ नहीं होता।”

पहले:

  • परिवार = सुरक्षा + सहयोग + संस्कार

आज:

  • परिवार = जिम्मेदारी + हस्तक्षेप + बोझ

👉 यह सोच समाज को धीरे-धीरे अलगाव की ओर धकेल रही है

सोशल मीडिया और ‘परफेक्ट लाइफ’ का भ्रम

आज का युवा “परफेक्ट लाइफ” चाहता है:

  • लग्जरी फ्लैट 
  • प्राइवेट कार 
  • पर्सनल स्पेस 

सोशल मीडिया इस चाह को और भड़का रहा है।
लेकिन सच्चाई यह है कि:

➡️ बीमारी, संकट और त्योहार—इनमें असली ‘परफेक्शन’ परिवार ही देता है, पैसा नहीं।

गांवों में भी बिखराव: जमीन के साथ रिश्ते भी बंटे

पहले:

  • एक ही परिवार की साझा खेती
  • एक ट्रैक्टर, एक रसोई, एक आंगन

अब:

  • जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े
  • हर भाई अलग
  • बढ़ते कर्ज और विवाद

👉 परिणाम: उत्पादन घटा, तनाव बढ़ा, और रिश्ते कमजोर हुए

सरकार के प्रयास बनाम सामाजिक हकीकत

सरकार ने वृद्धजन नीति 2025 के तहत संयुक्त परिवारों को बढ़ावा देने के लिए टैक्स छूट जैसे कदम सुझाए हैं।

लेकिन विशेषज्ञ साफ कहते हैं: 👉 “नीति नहीं, मानसिकता बदले बिना समाधान संभव नहीं।”

सबसे बड़ी क्षति: ‘आंगन’ का खो जाना

आज हमारे पास:

  • पैसा है
  • आधुनिक सुविधाएं हैं
  • करियर ग्रोथ है

लेकिन नहीं है:

  • परिवार का साथ
  • रिश्तों की गर्माहट
  • त्योहारों की असली खुशी

👉 भौतिकवाद ने हमें सुविधाएं दीं, लेकिन सुकून छीन लिया।

समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल

  • क्या हम विकास के नाम पर रिश्ते खो रहे हैं?
  • क्या अगली पीढ़ी “फैमिली” को सिर्फ एक कॉन्सेप्ट के रूप में जानेगी?
  • क्या पैसा ही अब रिश्तों का विकल्प बन गया है?

निष्कर्ष: अभी भी वक्त है संभलने का

भारत को सिर्फ आर्थिक महाशक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से मजबूत राष्ट्र भी बनना है।
इसके लिए जरूरी है:

✔️ परिवारों के बीच संवाद
✔️ बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता
✔️ बच्चों को संस्कार आधारित शिक्षा

👉 वरना वह दिन दूर नहीं जब
संयुक्त परिवार इतिहास बन जाएंगे और ‘अकेलापन’ नई सामाजिक महामारी।

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