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फर्जी मस्टररोल, संदिग्ध जॉब कार्ड और लाखों की निकासी! बिजनौर में हड़कंप

मनरेगा में ‘घर बैठे मजदूरी’ का खेल? बिजनौर में 5.89 लाख के कथित गबन से मचा हड़कंप

जॉब कार्ड, फर्जी मस्टररोल और बैंक मैपिंग में हेरफेर के आरोप; जांच रिपोर्ट में सुनियोजित साजिश की आशंका

बिजनौर | इन्वेस्टिगेटिव डेस्क

ग्रामीण रोजगार की सबसे बड़ी योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक बार फिर सवालों के घेरे में है। बिजनौर के अफजलगढ़ ब्लॉक की एक ग्राम पंचायत में पूर्व ग्राम रोजगार सेवक पर अपने पति और सहयोगियों के साथ मिलकर ₹5,89,348/- की सरकारी धनराशि के कथित गबन का गंभीर आरोप लगा है।

आधिकारिक जांच आख्या के आधार पर दंडात्मक कार्रवाई की संस्तुति कर दी गई है। मामला सामने आते ही प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।

क्या है पूरा आरोप?

जांच दस्तावेजों के अनुसार कथित रूप से—

  • 6 जॉब कार्ड अनियमित तरीके से जारी किए गए
  • फर्जी मस्टररोल तैयार कर भुगतान निकाला गया
  • बिना वास्तविक कार्य के मजदूरी दर्शाई गई
  • मजदूरों की जगह अन्य खातों को बैंक मैपिंग में जोड़ा गया

रिपोर्ट में इसे “सुनियोजित वित्तीय अनियमितता” की श्रेणी में रखा गया है।

जांच में क्या-क्या सामने आया?

खंड स्तर पर हुई जांच में कहा गया है कि—

  • जॉब कार्ड जारी करना, आईडी बनाना और बैंक खाता मैप करना ग्राम रोजगार सेवक की जिम्मेदारी होती है।
  • बिना दस्तावेज़ के पोर्टल पर मैपिंग संभव नहीं।
  • मजदूरों के खाते “गलती से मैप” होने का तर्क प्रथम दृष्टया अस्वीकार्य पाया गया।

जांच में कुल ₹5,89,348/- की धनराशि के दुरुपयोग/गबन का उल्लेख है।

आगे क्या हो सकता है?

यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो संभावित कार्रवाई में शामिल हो सकते हैं—

  • आपराधिक मुकदमा दर्ज
  • सरकारी धन की रिकवरी
  • सेवा से बर्खास्तगी/विभागीय दंड
  • भविष्य में सरकारी सेवा से प्रतिबंध

प्रशासनिक स्तर पर विधिक कार्यवाही की संस्तुति की जा चुकी है।

क्यों गंभीर है मामला?

मनरेगा जैसी योजना का उद्देश्य ग्रामीण गरीबों को रोजगार सुरक्षा देना है। यदि जॉब कार्ड और मस्टररोल में फर्जीवाड़ा होता है तो—

  • वास्तविक मजदूरों का हक प्रभावित होता है
  • सरकारी धन का दुरुपयोग होता है
  • योजना की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं

विशेषज्ञ मानते हैं कि डिजिटल पोर्टल, आधार लिंकिंग और बैंक डीबीटी के बावजूद जमीनी स्तर पर निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है।

प्रशासनिक दस्तावेज़ों में दर्ज संदर्भ

जांच आख्या में विभिन्न पत्रांकों का उल्लेख किया गया है, जिनके आधार पर कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।

बड़ा सवाल

  • क्या यह isolated केस है या व्यापक पैटर्न?
  • क्या अन्य पंचायतों का भी ऑडिट होगा?
  • क्या सोशल ऑडिट प्रक्रिया को सशक्त किया जाएगा?

यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास प्रणाली की पारदर्शिता की परीक्षा भी है।

निष्कर्ष

बिजनौर का यह प्रकरण ग्रामीण रोजगार व्यवस्था की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि आपराधिक साजिश का मामला बन सकता है।

अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन की ठोस और पारदर्शी कार्रवाई पर टिकी हैं।

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