Target Tv Live

खाली कुर्सियां, फर्जी मान्यता और वायरल क्लिप्स—बिजनौर सूचना विभाग की अंदरूनी कहानी आई सामने

बिजनौर सूचना विभाग पर गंभीर सवालों का साया

खाली पदों से जूझता विभाग, प्रचार सामग्री ‘कैद’, मान्यता प्रक्रिया पर आरोप—अब ऑडियो-वीडियो क्लिप्स से बढ़ी जांच की मांग

#TargetTvLive #Bijnor #UPNews #सूचना_विभाग #RTI #पत्रकार_मान्यता #InvestigativeReport #BreakingNews

📍 एक विभाग, कई सवाल

बिजनौर का सूचना विभाग इन दिनों गहरे विवादों में घिरा हुआ है। सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार में कथित लापरवाही, विभागीय ढांचे की कमजोरी, पत्रकार मान्यता प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप और कर्मचारियों के आचरण को लेकर उठते सवाल—इन सभी ने मिलकर पूरे मामले को गंभीर बना दिया है। अब इस विवाद में सामने आ रहे कथित ऑडियो और वीडियो क्लिप्स ने जांच की आवश्यकता को और भी बढ़ा दिया है।

संरचनात्मक संकट: वर्षों से खाली पड़े अहम पद

सूत्रों और उपलब्ध जानकारी के अनुसार सूचना विभाग की बुनियादी संरचना ही कमजोर स्थिति में है:

  • जिला सूचना अधिकारी (DIO) का पद वर्षों से रिक्त बताया जा रहा है
  • कार्यालय में एकाउंटेंट और लिपिक (बाबू) जैसे महत्वपूर्ण पद भी खाली हैं
  • विभाग का संचालन एक स्थायी अधिकारी के बजाय वैकल्पिक व्यवस्था पर निर्भर है

वर्तमान में यह जिम्मेदारी अतिरिक्त डिप्टी कलेक्टर हर्ष चावला को सौंपी गई है। हालांकि, आरोप है कि अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों के चलते वे सूचना विभाग को पर्याप्त समय नहीं दे पाते, जिससे कामकाज प्रभावित हो रहा है।

एक कर्मचारी पर निर्भर पूरा सिस्टम?

विभाग के अंदरूनी कामकाज को लेकर यह भी सामने आया है कि:

  • अधिकांश कार्य उर्दू अनुवादक मुसर्रत अली के माध्यम से संचालित हो रहा है
  • प्रशासनिक निगरानी के अभाव में कार्यों का केंद्रीकरण एक व्यक्ति तक सीमित हो गया है

यह स्थिति न केवल कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही को भी प्रभावित करती है।

आचरण और कार्यशैली पर उठे गंभीर आरोप

कुछ शिकायतों और स्थानीय स्तर पर चर्चाओं के आधार पर संबंधित कर्मचारी के आचरण को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।

 लगाए गए आरोपों में शामिल हैं:

  • कार्यालय परिसर में अनुशासनहीन गतिविधियों के आरोप
  • सरकारी समय और संसाधनों के उपयोग को लेकर सवाल
  • धार्मिक एवं राजनीतिक टिप्पणियों के कारण विवाद की स्थिति
  • अन्य समुदायों या विचारों के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणियों के आरोप

ऐसे आरोप, यदि सत्य पाए जाते हैं, तो न केवल सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन होंगे बल्कि कार्यस्थल की निष्पक्षता पर भी प्रश्न खड़े करेंगे।

सरकारी प्रचार सामग्री: उपयोग से पहले ही ‘बेअसर’?

सूचना विभाग की मुख्य जिम्मेदारी सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना है। लेकिन:

  • लखनऊ से भेजी गई प्रचार सामग्री के उपयोग न होने के आरोप
  • महीनों से सामग्री कार्यालय में ही पड़ी रहने की बात
  • आम जनता तक योजनाओं की जानकारी न पहुंच पाने का सवाल

यह स्थिति सरकारी प्रयासों की प्रभावशीलता पर सीधे सवाल खड़े करती है।

RTI में अधूरी जानकारी और मान्यता प्रक्रिया पर संदेह

सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी में भी कई विसंगतियों के आरोप सामने आए हैं:

  • जानकारी देने में देरी और टालमटोल
  • सीमित दस्तावेज दिखाकर औपचारिकता पूरी करने का आरोप
  • पत्रकार मान्यता सूची में अपूर्ण या संदिग्ध दस्तावेज

📌 विशेष आरोप:

  • कुछ पत्रकारों के अथॉरिटी लेटर अधूरे या केवल फोटो कॉपी
  • कुछ मामलों में दस्तावेज पूरी तरह अनुपस्थित
  • जिलाधिकारी को गलत या अधूरी जानकारी दिए जाने की आशंका

ऑडियो-वीडियो क्लिप्स: विवाद का नया आयाम

अब इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब:

👉 कई ऑडियो और वीडियो क्लिप्स सामने आने का दावा किया गया

इन क्लिप्स में कथित तौर पर:

  • विभागीय कार्यशैली
  • कर्मचारियों के व्यवहार
  • और कुछ विवादित बयानों से जुड़े पहलुओं का जिक्र बताया जा रहा है

हालांकि, इन क्लिप्स की प्रामाणिकता की अभी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर इनकी जांच जरूरी है।

विश्लेषण: प्रशासनिक व्यवस्था पर व्यापक असर

यह मामला केवल एक जिले या एक विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक प्रशासनिक चुनौतियों की ओर इशारा करता है:

  • मानव संसाधनों की कमी
  • प्रभावी निगरानी का अभाव
  • प्रचार तंत्र की निष्क्रियता
  • पारदर्शिता और जवाबदेही पर प्रश्न
  • डिजिटल साक्ष्यों की सत्यता की चुनौती

जांच की मांग और संभावित कार्रवाई

स्थानीय स्तर पर अब इस पूरे मामले की:

  • निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच
  • संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने
  • और विभागीय सुधार के लिए ठोस कदम उठाने

की मांग तेजी से उठ रही है।

जवाबदेही तय होना जरूरी

बिजनौर सूचना विभाग से जुड़ा यह मामला प्रशासनिक कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और विश्वसनीयता—तीनों पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

👉 यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह न केवल विभागीय विफलता होगी बल्कि सरकारी तंत्र की साख पर भी असर डालेगा।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या इस मामले में सच्चाई सामने आएगी या यह विवाद भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

✍️ रिपोर्ट: डिजिटल इन्वेस्टिगेशन डेस्क

Leave a Comment

यह भी पढ़ें