औद्योगिक मुनाफा बनाम मानव जीवन: गजरौला में 39 दिन से जारी पर्यावरण संग्राम
विशेष विश्लेषणात्मक समाचार रिपोर्ट: एम पी सिंह
अमरोहा | 28 जनवरी
उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास मॉडल पर गजरौला आज एक ऐसा काला दाग बन चुका है, जहां मुनाफे की चमक के नीचे जहरीला पानी, दमघोंटू हवा और सिसकती ज़िंदगियां दबी हुई हैं। गजरौला के शहबाजपुर डोर क्षेत्र में भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के नेतृत्व में पिछले 39 दिनों से जारी बेमियादी धरना अब एक स्थानीय विरोध नहीं, बल्कि पर्यावरण, मानवाधिकार और अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है।
गजरौला में क्या सचमुच पानी ज़हर बन चुका है?
धरनारत किसानों और ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि औद्योगिक क्षेत्र की रासायनिक फैक्टरियां
- नालों और जलस्रोतों में बिना ट्रीटमेंट जहरीला अपशिष्ट छोड़ रही हैं
- जिससे भूजल पीला, बदबूदार और जहरीला हो चुका है
- ट्यूबवेल और हैंडपंप से निकल रहा पानी बीमारी का कारण बन रहा है
ग्रामीणों का कहना है कि यह पानी पीते ही त्वचा रोग, पेट की बीमारियां, सांस की तकलीफ और कैंसर तक के मामले सामने आ रहे हैं।
किसानों की चेतावनी: “यह सिर्फ प्रदूषण नहीं, धीमा नरसंहार है”
भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय सचिव चौधरी चंद्रपाल सिंह ने दो टूक शब्दों में कहा—
“कब तक किसानों की पीड़ा को अनसुना किया जाएगा? गजरौला में कारखाने कानून और मानवाधिकारों को रौंद रहे हैं। इतिहास गवाह है—जब मानवाधिकारों पर हमला होता है, तो कोई भी सुरक्षित नहीं रहता।”
उन्होंने चेताया कि अगर समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां गजरौला को बीमारी और मौत की विरासत के रूप में जानेंगी।
नाईपुरा बना ‘रेड ज़ोन’: बीमारी, बर्बादी और बेबसी
भाकियू अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रभारी एवं मंडलाध्यक्ष एहसान अली ने हालात को बेहद गंभीर बताते हुए कहा—
“नाईपुरा और आसपास के गांवों में श्वसन रोग, कैंसर और गैर-संचारी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। दूषित हवा, पानी और मिट्टी समय से पहले मौतों का कारण बन रही है।”
उनका सवाल है—क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है?
फसलें तबाह, मवेशी बीमार—किसान दोहरी मार झेल रहा
ग्रामीणों के अनुसार
- खेतों में सिंचाई करने से फसलें झुलस रही हैं
- दूध देने वाले मवेशी लगातार बीमार पड़ रहे हैं
- किसान रोज़गार और स्वास्थ्य—दोनों खो रहा है
धरनारत किसानों का कहना है कि यह हालात आर्थिक नहीं, अस्तित्व का संकट बन चुके हैं।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
हालांकि अमरोहा प्रशासन ने
- सैंपल जांच
- प्रदूषण निगरानी
- फैक्ट्रियों की जांच
जैसे कदम उठाने की बात कही है, लेकिन धरनारत लोगों का आरोप है कि ये सब फाइलों तक सीमित हैं।
39 दिनों के धरने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई या आधिकारिक बयान सामने नहीं आया।
महिलाएं भी मोर्चे पर—‘जहर नहीं, जीवन चाहिए’
धरने में बड़ी संख्या में महिलाएं भी मौजूद रहीं।
आशा देवी, नूरजहां, कृष्णा देवी सहित सैकड़ों महिलाओं ने एक स्वर में कहा—
“हमें फैक्ट्रियों का ज़हर नहीं, अपने बच्चों के लिए साफ पानी चाहिए।”
गजरौला की लड़ाई क्यों पूरे देश के लिए चेतावनी है?
यह आंदोलन एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—
- क्या औद्योगिक विकास बिना पर्यावरण सुरक्षा के संभव है?
- क्या ग्रामीण भारत की ज़िंदगी की कीमत पर मुनाफा जायज़ है?
- क्या कानून सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गया है?
विकास बनाम जीवन—किसे चुनेगा सिस्टम?
गजरौला का धरना बताता है कि अगर धरती, पानी और हवा को नहीं बचाया गया, तो विकास एक धीमा ज़हर बन जाएगा।
अब फैसला प्रशासन और सरकार के हाथ में है—
कार्रवाई या इतिहास में एक और चेतावनी?
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