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जहरीला पानी, गर्म कपड़े और खामोश मीडिया: CSR में लिपटी ‘जनसेवा’ का खतरनाक मॉडल!

जहरीला पानी, गर्म कपड़े और खामोश मीडिया: CSR में लिपटी ‘जनसेवा’ का खतरनाक मॉडल!

व्यंग्यकार : अवनीश त्यागी 

अमरोहा जनपद का शहबाजपुर डोर इन दिनों किसी उत्सव या विकास परियोजना के कारण नहीं, बल्कि ज़िंदगी बचाने की जद्दोजहद के कारण चर्चा में होना चाहिए था। भाकियू संयुक्त मोर्चा का धरना यहाँ 19–20 दिनों से जारी है। मुद्दा सीधा, गंभीर और जानलेवा है—
रासायनिक फैक्ट्रियों से निकलता दूषित पानी, जो लोगों को बीमार कर रहा है, फसलों को ज़हर बना रहा है और पूरे इलाके को धीरे-धीरे मौत की ओर ढकेल रहा है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली व्यंग्य तो यहीं से शुरू होता है।

जब ज़हर परोसा जाए और कपड़े बाँटे जाएँ

जिन उद्योगपतियों की फैक्ट्रियाँ दिन-रात पर्यावरण को “केमिकल थेरेपी” दे रही हैं, उन्होंने अचानक जनसेवा का नया अवतार धारण कर लिया।
एनजीओ के नाम पर गरीबों में गर्म कपड़े बाँट दिए गए
ठंड से काँपते लोगों को स्वेटर मिल गया—
और पत्रकारों को भी, ताकि खबर लिखते समय उनकी उंगलियाँ न जम जाएँ।

वाह!
अब इसे कहेंगे जनसेवा का PR मास्टरस्ट्रोक

धरना जारी, पर खबर लापता

एक तरफ लोग साफ पानी की मांग को लेकर सड़क पर बैठे हैं, दूसरी तरफ कैमरे कपड़े वितरण की मुस्कुराती तस्वीरों में व्यस्त हैं।
धरना?
वह तो “ताकि सच जिंदा रहे” वाले नंबर-वन अखबारों की नजर में शायद अदृश्य है।

क्योंकि खबरों की प्राथमिकता सूची में पहले आती है—

  • फैक्ट्री मालिकों की CSR रिपोर्ट
  • एनजीओ के बैनर
  • और स्वेटर बाँटते उद्योगपति की फोटो

धरने की खबर?
वह तो या तो बहुत बाद में आती है…
या फिर कभी नहीं

जनसेवा का नया फार्मूला

आज के दौर का सुनहरा नियम साफ है—

अगर आप पर्यावरण बर्बाद कर रहे हैं,
पानी को ज़हर बना रहे हैं,
और लोगों की ज़िंदगी खतरे में डाल रहे हैं—
तो घबराइए मत!

बस सर्दियों में थोड़े गर्म कपड़े बाँट दीजिए,
पत्रकारों को भी थोड़ी “गर्मी” दे दीजिए,
और देखिए—
सच कैसे चुपचाप दम तोड़ देता है,
जबकि फ्रंट पेज पर जनसेवा चमकती रहती है।

विकसित भारत या विकसित पाखंड?

शायद यही आज के “विकसित भारत” की नई परिभाषा है—
जहाँ

  • जहरीला पानी भी CSR के साथ आता है,
  • जनआंदोलन खबर नहीं बनते,
  • और जनसेवा फोटोशूट तक सिमट जाती है।

धरना जारी है।
लोग संघर्ष कर रहे हैं।
लेकिन खबर…
वह अभी भी लापता है।

आज का कटु सत्य

जब जनसेवा PR बन जाए और पत्रकारिता विज्ञापन,
तो ज़हर भी “सेवा” कहलाने लगता है।

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