Target Tv Live

“अखलाक हत्याकांड” न्यायपालिका बनाम सत्ता: बिसाहड़ा कांड में कानून की सख्त लकीर

अखलाक हत्याकांड में सरकार को बड़ा झटका 

केस वापसी की अर्जी खारिज, अदालत ने कहा – ‘समाज में जाएगा गलत संदेश’

न्यायपालिका बनाम सत्ता: बिसाहड़ा कांड में कानून की सख्त लकीर

ग्रेटर नोएडा।
दादरी के बिसाहड़ा (विसाडा) गांव में हुए बहुचर्चित अखलाक हत्याकांड में एक बार फिर न्यायपालिका ने अपना मजबूत और स्वतंत्र रुख दिखाया है। गौतम बुद्ध नगर की अपर जिला न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इस गंभीर आपराधिक मामले को वापस लेने की अर्जी को पूरी तरह खारिज कर दिया।

यह फैसला न सिर्फ एक आपराधिक मुकदमे की दिशा तय करता है, बल्कि भीड़ हिंसा, अल्पसंख्यक सुरक्षा और न्यायिक स्वतंत्रता जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी गहरी छाप छोड़ता है।

घंटों चली सुनवाई, सरकार की दलीलें नहीं आईं काम

अदालत में प्रदेश सरकार की ओर से केस वापस लेने के पक्ष में दलीलें रखी गईं, लेकिन घंटों चली बहस के बाद न्यायालय सरकार के तर्कों से सहमत नहीं हुआ।
इसके उलट, पीड़ित पक्ष की ओर से अधिवक्ता मोहम्मद यूसुफ सैफी और अदवी नकवी द्वारा प्रस्तुत तर्कों को अदालत ने अधिक मजबूत और न्यायसंगत माना।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—

  • यह मामला साधारण अपराध नहीं बल्कि गंभीर हत्याकांड है
  • पीड़ित पक्ष की गवाही पूरी हो चुकी है
  • ऐसे में मुकदमा वापस लेना न्याय प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ होगा
  • इससे समाज में गलत और खतरनाक संदेश जाएगा

📌 अदालत का अहम निर्देश: रोजाना सुनवाई

केवल अर्जी खारिज करना ही नहीं, बल्कि अदालत ने यह भी आदेश दिया कि—
अब इस मामले की प्रतिदिन सुनवाई की जाए और शीघ्र निर्णय दिया जाए।

यह आदेश दर्शाता है कि न्यायालय इस केस को लटकाए रखने के पक्ष में नहीं है और पीड़ित परिवार को जल्द न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है।

अदालत में मौजूद रहीं वृंदा करात, बढ़ा राजनीतिक तापमान

सुनवाई के दौरान कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी (माकपा) की वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद कामरेड वृंदा करात की मौजूदगी ने इस मामले को और राजनीतिक तथा वैचारिक रंग दे दिया।

फैसले के बाद प्रतिक्रिया देते हुए वृंदा करात ने कहा—

“यह फैसला उत्तर प्रदेश की डबल इंजन सरकार के मुंह पर करारा तमाचा है। यह दिखाता है कि न्यायपालिका अब भी संविधान और इंसाफ के साथ खड़ी है।”

उनका बयान साफ तौर पर सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है और संकेत देता है कि यह मामला आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

माकपा और जनसंगठनों की मजबूत मौजूदगी

अदालत परिसर में माकपा और उससे जुड़े संगठनों के दर्जनों कार्यकर्ता मौजूद रहे।
इनमें प्रमुख रूप से—

  • माकपा जिला सचिव रामसागर
  • सीटू नेता गंगेश्वर दत्त शर्मा
  • मुकेश कुमार राघव, सुखलाल
  • जनवादी महिला समिति की नेता रेखा चौहान, किरण देवी
  • लॉयर्स यूनियन के अधिवक्ता अरुण कुमार

इन सभी की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि यह मुकदमा अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि जन आंदोलन और वैचारिक संघर्ष का रूप ले चुका है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला? – गहन विश्लेषण

विशेषज्ञों और कानूनविदों के अनुसार, यह आदेश कई मायनों में ऐतिहासिक है—

✔ यह साफ करता है कि भीड़ हिंसा के मामलों में सरकार मनमानी नहीं कर सकती
✔ गंभीर अपराधों में केस वापसी को अदालतें हल्के में नहीं लेंगी
✔ पीड़ित पक्ष के अधिकारों को राज्य की राजनीतिक इच्छाओं से ऊपर रखा गया
✔ न्यायपालिका की स्वतंत्रता और मजबूती का संदेश गया

यदि अदालत सरकार की अर्जी स्वीकार कर लेती, तो यह भविष्य में लिंचिंग और सामूहिक हिंसा के मामलों में खतरनाक मिसाल बन सकता था।

 सामाजिक संदेश: न्याय अभी जीवित है

अखलाक हत्याकांड को लेकर वर्षों से यह सवाल उठता रहा है कि
क्या भीड़ हिंसा के मामलों में पीड़ितों को सच में न्याय मिल पाएगा?

इस फैसले ने यह भरोसा दिया है कि—
कानून अब भी कमजोर के साथ खड़ा हो सकता है, बशर्ते न्यायपालिका स्वतंत्र रहे।

 निष्कर्ष: न्याय की दिशा में निर्णायक मोड़

गौतम बुद्ध नगर की अदालत का यह आदेश अखलाक हत्याकांड में एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।
अब निगाहें रोजाना होने वाली सुनवाई और अंतिम फैसले पर टिकी हैं।

यह मामला आने वाले समय में न्याय, राजनीति और सामाजिक चेतना—तीनों की कसौटी बनेगा।

📍 रिपोर्ट: ओम प्रकाश चौहान
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार
ग्रेटर नोएडा (गौतमबुद्ध नगर)

 

Leave a Comment

यह भी पढ़ें