विदुर कुटी गंगा तट पर आस्था का महापर्व:
गंगा मैया के जयकारों से गूंज उठा बिजनौर, मंत्री सत्येंद्र सिसोदिया ने किया उद्घाटन
गंगा की गोद में उमड़ी आस्था, भक्ति और भारतीय संस्कृति की अविरल धारा — कार्तिक पूर्णिमा मेले की शुरुआत के साथ विदुर कुटी तट पर हजारों श्रद्धालुओं का सैलाब
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📍 बिजनौर | अवनीश त्यागी
गंगा की पवित्र लहरों पर जब सूरज की सुनहरी किरणें पड़ीं, तो विदुर कुटी का तट भक्ति, उल्लास और आस्था की एक अद्भुत लहर में डूब गया।
कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला ऐतिहासिक विदुर कुटी गंगा मेला सोमवार को पूरे विधि-विधान के साथ शुरू हो गया।
मेले का शुभारंभ भारतीय जनता पार्टी के क्षेत्रीय मंत्री सत्येंद्र सिसोदिया ने फीता काटकर और गंगा मैया को दूध अर्पित कर नारियल समर्पित करते हुए किया।
आरती की घनघनाहट और “हर हर गंगे” के गगनभेदी नारों से पूरा वातावरण गूंज उठा — मानो धरती और आकाश दोनों गंगा मइया की महिमा का गुणगान कर रहे हों।
🔹 आस्था की आरती और उद्घाटन का दृश्य
उद्घाटन समारोह में पहले नारियल तोड़ा गया, फिर गंगा जल में दूध प्रवाहित किया गया।
क्षेत्रीय मंत्री ने दीप प्रज्ज्वलन कर गंगा आरती में भाग लिया, जहां हजारों श्रद्धालु हाथ जोड़कर नतमस्तक दिखाई दिए।
लहरों के संग झिलमिलाते दीपों की कतारें मानो यह संदेश दे रही थीं —
“गंगा सिर्फ जल नहीं, बल्कि जीवन की धारा है जो आत्मा को भी शुद्ध कर देती है।”
इस अवसर पर भाजपा जिला अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौहान, जिला पंचायत अध्यक्ष सकेंद्र प्रताप सिंह, वरिष्ठ नेता ऐश्वर्या मौसम चौधरी और जिलाधिकारी श्रीमती जसजीत कौर की उपस्थिति ने समारोह को और भी गरिमामय बना दिया।
🔹 लोक परंपरा से जुड़ा यह मेला सिर्फ उत्सव नहीं, एक विरासत है
विदुर कुटी का यह गंगा मेला बिजनौर ही नहीं बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आस्था और लोकसंस्कृति का प्रतीक माना जाता है।
कहते हैं, महाभारत काल में यहीं धर्मराज विदुर ने तपस्या की थी।
तभी से यह स्थल “विदुर तीर्थ” के नाम से प्रसिद्ध हुआ और कार्तिक पूर्णिमा पर यहां गंगा स्नान का महत्व बढ़ गया।
श्रद्धालु आज भी अपनी पुरानी परंपरा के अनुसार ट्रैक्टर-ट्रॉली, बैलगाड़ी या पैदल यात्रा करते हुए यहां पहुंचते हैं।
गंगा तट पर पहुंचकर वे तंबू लगाते हैं, वहीं रहते हैं, गंगा स्नान करते हैं और फिर उड़द की दाल व चावल की खिचड़ी का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
यह न केवल स्नान का पर्व है बल्कि गांव, समाज और परिवार के पुनर्मिलन का उत्सव भी है।
🔹 श्रद्धालुओं का सैलाब और आस्था का रंग
मेले में जैसे-जैसे सूरज ऊपर चढ़ा, श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती चली गई।
महिलाएं सिर पर कलश रखे गंगा घाट की ओर बढ़ रही थीं, तो बच्चे हाथों में झंडे और दीप लेकर जयकारे लगा रहे थे।
हवा में घुली अगरबत्ती और घी के दीयों की महक वातावरण को और भी दिव्य बना रही थी।
भक्तों ने घाट पर “गंगा जल से निर्मल हो जीवन हमारा” गाते हुए स्नान किया और गंगा मैया से मनोकामनाएँ मांगीं।
कई परिवारों ने अपने पुरखों की स्मृति में पिंडदान और तर्पण कर्म भी किया।
🔹 प्रशासन की सख्त निगरानी, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
जिलाधिकारी जसजीत कौर और प्रशासनिक टीम ने मेले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था का जायज़ा लिया।
गंगा तटों पर पुलिस बल, जल पुलिस और गोताखोरों की विशेष टीमें तैनात की गई हैं।
साथ ही सीसीटीवी कैमरे, मेडिकल कैम्प, स्वच्छता मिशन और लाइटिंग व्यवस्था भी दुरुस्त की गई है।
डीएम ने बताया —
“श्रद्धालुओं की सुविधा हमारी प्राथमिकता है। किसी भी तरह की अव्यवस्था बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”
🔹 सत्येंद्र सिसोदिया की बाइट —
“विदुर कुटी गंगा मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, संस्कार और सनातन पहचान का जीवंत प्रतीक है।
गंगा मां हमारे देश की आत्मा हैं, और जब तक गंगा बहती रहेंगी, हमारी आस्था भी अविरल बनी रहेगी।”
🔹 सांस्कृतिक रंग भी सजे
गंगा आरती के बाद शाम को लोक कलाकारों ने भजन संध्या और कीर्तन कार्यक्रमों से श्रद्धालुओं का मन मोह लिया।
ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम की धुनों पर “गंगे तेरा पानी अमृत” गूंज उठा।
गांव-देहात से आए कलाकारों ने लोकनृत्य प्रस्तुत किए और गंगा महिमा पर कविताएं सुनाकर तालियाँ बटोरीं।
🔹 गंगा मेला: श्रद्धा, संस्कृति और संगम का प्रतीक
यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं — बल्कि भारतीय लोकजीवन का सजीव उत्सव है।
यहां न जात-पात, न भेदभाव — बस एक ही भावना होती है — भक्ति और एकता की।
गंगा के किनारे बैठकर बुजुर्ग पुरानी कहानियाँ सुनाते हैं, बच्चे घाट पर दौड़ लगाते हैं और महिलाएँ आरती की थाल सजाती हैं।
हर चेहरे पर भक्ति की चमक और हर आंख में श्रद्धा की नमी झलकती है।
निष्कर्ष —
विदुर कुटी का गंगा मेला सिर्फ बिजनौर का नहीं, बल्कि आस्था की उस अविरल धारा का उत्सव है जो युगों से बहती आई है।
गंगा की गोद में जब दीप तैरते हैं, तो लगता है मानो स्वर्ग की रोशनी धरती पर उतर आई हो।
यह मेला एक पुकार है —
“जहां गंगा है, वहीं संस्कार है, वहीं जीवन है।”
गंगा की गोद में उमड़ी आस्था, भक्ति और भारतीय संस्कृति की अविरल धारा — कार्तिक पूर्णिमा मेले की शुरुआत के साथ विदुर कुटी तट पर हजारों श्रद्धालुओं का सैलाब










