🪔 “प्रकाशोत्सव में अंधकार” — अफजलगढ़ की फाइलों की दिवाली

✍️ व्यंग्यकार – एक सजग नागरिक की कलम से
कहते हैं, दीपावली प्रकाश का पर्व है —
पर अफजलगढ़ ब्लॉक में इस वर्ष “प्रकाश” नहीं,
“प्रकाशन” हुआ है — फाइलों, आदेशों और सफाइयों का।
जहाँ एक ओर जनमानस अपने घरों को दीपों से सजाने में व्यस्त है,
वहीं ब्लॉक कार्यालय के कक्षों में फाइलों की राख से दीपक जलाए जा रहे हैं।
यहाँ दीये नहीं जलते — साक्ष्य जलते हैं।
धन की गंध इतनी प्रखर है कि अगरबत्तियाँ भी शर्मा जाएँ।
🔹 आदेशों की रोशनी में अनुपालन का अंधकार
मंडलायुक्त ने बीडीओ और अकाउंटेंट दोनों को हटाने के स्पष्ट निर्देश दिए।
पर अफजलगढ़ में आदेशों की उम्र उतनी ही रही,
जितनी किसी दीये की लौ — पहली हवा आई, और सब बुझ गया।
बीडीओ साहब, जिन्हें बिजनौर अटैच किया गया,
आज भी ब्लॉक के सरकारी आवास में विराजमान हैं।
कहते हैं — “यहाँ कुछ फाइलों पर अंतिम कार्यवाही चल रही है।”
जनता कहती है — “हाँ, साक्ष्य की अंतिम यात्रा चल रही है।”🔹 अकाउंटेंट – व्यवस्था की मजबूरी या सुविधा की ढाल?
सीडीओ पूर्णा बोरा से जब पूछा गया —
“अकाउंटेंट को क्यों नहीं हटाया गया?”
तो उत्तर मिला — “जनपद में अकाउंटेंट कम हैं।”क्या विडंबना है!
जनता के विश्वास की कमी, पारदर्शिता की कमी,
और ईमान की कमी तो कोई स्वीकार नहीं करता,
पर “अकाउंटेंट की कमी” का ढाल हर प्रश्न का उत्तर बन जाती है।सच यह है कि यदि इच्छाशक्ति हो,
तो किसी भी ब्लॉक का कर्मी दूसरे ब्लॉक में स्थानांतरित किया जा सकता है।
पर जब उद्देश्य “व्यवस्था चलाना नहीं, व्यक्ति बचाना” हो,
तो फिर पूरा प्रशासनिक तंत्र एक दीया बन जाता है —
जो केवल “ऊपर” जलता है, “नीचे” अंधकार फैलाता है।
🔹 दिवाली की सच्चाई — फाइलों की राख में छिपी लपटें
ब्लॉक कार्यालय में रातें जगमग हैं —
पर वह रोशनी बिजली की नहीं, लालच की है।
कक्षों में ट्यूबलाइटें नहीं, कागज़ों की आग चमक रही है।
जहाँ जनता को उजाला चाहिए, वहाँ फाइलों की राख उड़ रही है।
बीडीओ साहब का आवास अब किसी सरकारी आवास से अधिक
एक ‘साक्ष्य-प्रबंधन केंद्र’ प्रतीत होता है।
और अकाउंटेंट साहब, जिन पर अंगुलियाँ उठ रहीं हैं,
अब भी वहीं बैठकर अपनी “गणना” में तल्लीन हैं —
शायद अब आंकड़े नहीं, अवसर गिने जा रहे हैं।
🔹 सीडीओ का मौन – संवाद का अंत या संलिप्तता का आरंभ?
सीडीओ महोदय कहते हैं — “हमने शासन को लिखा है, अब वही कार्यवाही करेगा।”
क्या यह प्रशासन की परंपरा बन चुकी है कि
हर दोष “अगले स्तर” की प्रतीक्षा में निलंबित रहे?
जवाबदेही अब एक “पेंडिंग फ़ाइल” है —
जिस पर हर अधिकारी अपनी टिप्पणी लिखकर
दीये की लौ में सुखद संतोष खोज लेता है।
🔹 जनता की निराशा – उजाले के नीचे अंधेरा
अफजलगढ़ के गाँवों में इस बार दीये कुछ उदास हैं।
किसानों के घरों में अँधेरा है,
पर ब्लॉक कार्यालय अब भी “विकास की जगमग” में नहा रहा है।
कोई व्यंग्य में कह उठा —“यहाँ घोटाले भी त्यौहार की तरह मनाए जाते हैं —
दीपावली पर फाइलें जलती हैं, और होली पर साक्ष्य।”
🔹 निष्कर्ष – जब दीपक खुद अंधकार बन जाए
कहा जाता है — “अंधकार को मिटाने के लिए दीप जलाओ।”
पर अफजलगढ़ में दीप भी उसी अंधकार से बने हैं,
जिसे मिटाने का दावा करते हैं।
यह दिवाली हमें याद दिलाती है कि
जब सत्ता के दीये “सत्य” की लौ से नहीं,
“सुविधा” के तेल से जलते हैं,
तो उजाला नहीं फैलता — धुआँ फैलता है।
🪔 अंतिम पंक्तियाँ
अफजलगढ़ की फाइलें अब दीयों की तरह टिमटिमा रही हैं,
बीडीओ साहब अपने ही आदेशों की परछाईं में विश्राम कर रहे हैं,
अकाउंटेंट अब भी गणना में रमे हैं —
शायद यह गिन रहे हैं कि “कितनी सच्चाइयाँ अब भी बाकी हैं।”और हम सब, आम नागरिक, इस उम्मीद में हैं कि
अगली दिवाली तक शायद कोई सच भी जल उठे।











