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यूपी में बिजली निजीकरण विवाद गहराया, संघर्ष समिति बोली—“कौड़ियों के भाव बेची जा रही हैं सार्वजनिक संपत्तियाँ

यूपी में बिजली निजीकरण विवाद गहराया, संघर्ष समिति बोली—“कौड़ियों के भाव बेची जा रही हैं सार्वजनिक संपत्तियाँ
  • दीपावली पर बिजलीकर्मियों को भी बोनस देने की मांग, कहा—“जब जिम्मेदारी हमारी तो इनाम क्यों नहीं?”
  • संघर्ष समिति ने कहा — ड्राफ्ट बिडिंग डॉक्यूमेंट 2025 पब्लिक डोमेन में नहीं, गुपचुप तरीके से रचा गया खेल
  • कॉर्पोरेट कार्टेल पर गंभीर आरोप, कहा—“उत्तर प्रदेश की बिजली संपत्तियों को लूटा जा रहा है”
  • सीएम योगी की ‘जीरो टॉलरेंस नीति’ के तहत हो सीबीआई जांच की मांग

 लखनऊ से विशेष रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश में बिजली वितरण निगमों — पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम — के निजीकरण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने इस प्रक्रिया को “भ्रष्टाचार से ग्रस्त” बताते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से तत्काल सीबीआई जांच कराने की मांग की है।

संघर्ष समिति का कहना है कि जिस तरह निजीकरण की रूपरेखा तैयार की गई है, उसमें कार्पोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने की साजिश झलकती है और यह प्रदेश के करोड़ों उपभोक्ताओं के हितों के विपरीत है।

“बिजली संपत्तियों को कौड़ियों के भाव बेचने की कोशिश” — संघर्ष समिति

संघर्ष समिति के संयोजक शैलेन्द्र दुबे ने कहा —

“पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम की संपत्तियाँ लाखों करोड़ रुपये की हैं, जिन्हें सरकार कुछ चुनिंदा निजी घरानों के हवाले इक्विटी के नाम पर कौड़ियों के भाव बेचने की तैयारी कर रही है। यह न सिर्फ कर्मचारियों बल्कि उपभोक्ताओं के साथ भी अन्याय है।”

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस नीति’ को देखते हुए इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय सीबीआई जांच जरूरी है।

💬 दीपावली बोनस की मांग: “जब जिम्मेदारी हमारी, तो इनाम क्यों नहीं?”

मुख्यमंत्री द्वारा राज्य के 15 लाख कर्मचारियों के लिए घोषित दीपावली बोनस का स्वागत करते हुए संघर्ष समिति ने कहा कि

“प्रदेश में दीपावली पर निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी बिजलीकर्मियों पर होती है।
जब वे दिन-रात मेहनत कर पूरे प्रदेश को रोशन रखते हैं, तो उन्हें भी बोनस से वंचित रखना अनुचित है।”

संघर्ष समिति के पांच गंभीर आरोप — “निजीकरण में घोटाले की गंध”

संघर्ष समिति ने पांच प्रमुख बिंदुओं में बताया कि किस तरह निजीकरण की पूरी प्रक्रिया संदेहास्पद है और पारदर्शिता से कोसों दूर है —

1️⃣ डिस्ट्रीब्यूशन यूटिलिटी मीट 2024 — घोटाले की पृष्ठभूमि

  • नवंबर 2024 में लखनऊ में आयोजित “डिस्ट्रीब्यूशन यूटिलिटी मीट 2024” में कई निजी कंपनियों ने भाग लिया और स्पॉन्सरशिप दी।
  • यहीं से निजीकरण का खाका तैयार हुआ, और कुछ शीर्ष अधिकारियों ने निजी कंपनियों से नज़दीकी बढ़ाई।
  • इस मीट में U.P. Power Corporation के चेयरमैन डॉ. आशीष गोयल को ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोसिएशन का जनरल सेक्रेटरी बनाया गया, जबकि NPCIL के CEO पी.आर. कुमार को ट्रेजरर पद दिया गया।
  • संघर्ष समिति का आरोप है कि यह हितों का टकराव (Conflict of Interest) का साफ उदाहरण है।

2️⃣ ट्रांजैक्शन कंसल्टेंट की नियुक्ति में धांधली

  • Grant Thornton नामक कंपनी को ट्रांजैक्शन कंसल्टेंट नियुक्त किया गया।
  • समिति का कहना है कि इस कंपनी पर अमेरिका में पेनल्टी लग चुकी है और उसने नियुक्ति प्रक्रिया में झूठा शपथ पत्र भी दिया।
  • इसके बावजूद कंपनी को न हटाया गया और इसी से निजीकरण के दस्तावेज तैयार कराए जा रहे हैं।
  • यह स्पष्ट रूप से भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की अवहेलना है।

3️⃣ गुपचुप जारी हुआ ‘ड्राफ्ट बिडिंग डॉक्यूमेंट 2025’

  • निजीकरण के लिए तैयार RFP (Request for Proposal) दस्तावेज़ ड्राफ्ट स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट 2025 पर आधारित है।
  • यह डॉक्यूमेंट अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिससे पूरी प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं।
  • इससे पहले सितंबर 2020 में जारी डॉक्यूमेंट पर All India Power Engineers Federation समेत कई संस्थाओं ने आपत्तियाँ दर्ज कराई थीं, पर सरकार ने आज तक निस्तारण नहीं किया।
  • समिति ने आरोप लगाया कि यह सब “कॉर्पोरेट हितों की पूर्ति के लिए पर्दे के पीछे रचा गया खेल” है।

4️⃣ कॉर्पोरेट कार्टेल की भूमिका उजागर

  • समिति ने कहा कि टाटा पावर के CEO प्रवीर सिन्हा खुद बयान दे चुके हैं कि “उत्तर प्रदेश के निजीकरण के दस्तावेज़ उनसे चर्चा के बाद तैयार किए गए हैं।”
  • यह दिखाता है कि कॉर्पोरेट कंपनियों को पहले से विश्वास में लिया गया, और सरकार के भीतर से उन्हें पूरी मदद मिली।
  • संघर्ष समिति ने कहा कि यह कॉर्पोरेट कार्टेल का निर्माण है, जो पारदर्शिता और निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

5️⃣ इक्विटी के नाम पर संपत्तियों की सस्ती बिक्री

  • संघर्ष समिति के अनुसार, सरकार इक्विटी वैल्यू के आधार पर बिक्री कर रही है, जबकि अधिकांश परिसंपत्तियाँ लॉन्ग टर्म लोन में परिवर्तित कर दी गई हैं।
  • इससे 42 जिलों की बिजली वितरण व्यवस्था कॉर्पोरेट कंपनियों को सस्ते में सौंपने की साजिश है।
  • समिति ने कहा कि यह ‘जन संपत्ति की लूट’ है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

आंदोलन 321वें दिन भी जारी

संघर्ष समिति का निजीकरण विरोधी आंदोलन लगातार 321वें दिन जारी है।
प्रदेश भर में बिजलीकर्मियों ने काली पट्टी बांधकर, धरना-प्रदर्शन और विरोध मार्च आयोजित किया।
कर्मचारियों ने कहा —

“हम तब तक शांत नहीं बैठेंगे जब तक निजीकरण का फैसला वापस नहीं लिया जाता और पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच नहीं होती।”

क्या कहती है सरकार?

हालांकि सरकार की ओर से अभी तक संघर्ष समिति की मांगों पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
लेकिन ऊर्जा विभाग के सूत्रों का कहना है कि निजीकरण से “कार्यक्षमता और निवेश” बढ़ेगा और उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएं मिलेंगी।

दूसरी ओर, कर्मचारी संगठनों का कहना है कि निजीकरण के बाद बिजली महंगी होगी, ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा गुणवत्ता घटेगी और कर्मचारियों की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी।

बिजलीकर्मियों का दीपावली संदेश

संघर्ष समिति ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में पारदर्शिता और ईमानदारी की बात करती है, तो उसे चाहिए कि —

  • सीबीआई जांच के आदेश दे,
  • निजीकरण की प्रक्रिया तत्काल रोके,
  • और दीपावली से पहले बिजलीकर्मियों को भी बोनस देकर उनका मनोबल बढ़ाए।

“बिजलीकर्मी दिन-रात जनता के घरों में रोशनी जलाए रखते हैं, अब सरकार को चाहिए कि उनके जीवन में भी रोशनी भरे।”

📞 संपर्क

शैलेन्द्र दुबे
संयोजक, विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश
📱 9415006225

उत्तर प्रदेश में बिजली निजीकरण का मुद्दा अब सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बन चुका है।
एक ओर सरकार इसे सुधार की दिशा में कदम बता रही है, वहीं संघर्ष समिति इसे “जन विरोधी और घोटाले से भरी प्रक्रिया” करार दे रही है।

अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर हैं —
क्या वे इस विवाद में हस्तक्षेप करेंगे या बिजली निजीकरण का यह अध्याय राज्य की ऊर्जा व्यवस्था को नए संकट की ओर ले जाएगा?

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