दशहरा-दीपावली से पहले बिजली कर्मियों की बड़ी मांग़
निजीकरण का निर्णय वापस लो, बोनस दो – प्रदेशभर में गूंजा विरोध
हाइलाइट्स
- संयुक्त संघर्ष समिति की दो टूक: रेलकर्मियों की तरह बिजली कर्मियों को भी 78 दिन का बोनस दिया जाए
- उत्पीड़न पर रोक: त्योहारों से पहले की गई सभी अनुशासनात्मक कार्रवाई रद्द करने की मांग
- निजीकरण विवाद: पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण से कार्य वातावरण बिगड़ने का आरोप
- मुख्यमंत्री से अपील: महाकुंभ और भीषण गर्मी में निर्बाध बिजली आपूर्ति कर उत्तर प्रदेश की प्रतिष्ठा बढ़ाई, अब सरकार भी पहल करे
- प्रदेशव्यापी प्रदर्शन: वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, गोरखपुर समेत 25+ जिलों में विरोध
विस्तृत रिपोर्ट
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने दशहरा और दीपावली से पहले प्रदेश सरकार और पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन से बड़ी मांग रखी है। समिति का कहना है कि रेल कर्मियों की तरह बिजली कर्मियों को भी 78 दिन का बोनस दिया जाए और उन पर की गई उत्पीड़नात्मक कार्रवाई तत्काल वापस ली जाए।
संयुक्त संघर्ष समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण की प्रक्रिया से ऊर्जा निगमों में कार्य वातावरण बिगड़ चुका है। बिजली कर्मियों ने महाकुंभ और भीषण गर्मी के दौरान रिकॉर्ड स्तर पर निर्बाध बिजली आपूर्ति कर प्रदेश और देश का नाम रोशन किया है, ऐसे में सरकार को उनके हक और सम्मान की रक्षा करनी चाहिए।
निजीकरण पर आरोप
- समिति ने आरोप लगाया कि पावर कॉरपोरेशन और शासन के कुछ उच्च अधिकारी निजी घरानों के साथ मिलकर प्रदेश के 42 जनपदों का निजीकरण करने की साजिश रच रहे हैं।
- कहा गया कि ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोशिएशन के जरिए निजी कंपनियों से “मोलभाव” किया जा रहा है।
- बिजली कर्मी 302 दिनों से लगातार संघर्षरत हैं और अब आंदोलन प्रदेशव्यापी रूप ले चुका है।
आंदोलन का विस्तार
आज वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, गोरखपुर, मिर्जापुर, आजमगढ़, अलीगढ़, झांसी, बरेली, नोएडा, गाजियाबाद, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, मुरादाबाद समेत कई जिलों में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ।
निष्कर्ष
बिजली कर्मियों का यह आंदोलन केवल बोनस और उत्पीड़न समाप्त करने की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा क्षेत्र के निजीकरण बनाम सार्वजनिक हित की बड़ी लड़ाई में बदलता दिख रहा है। आगामी त्योहारों से पहले यदि सरकार ने उनकी मांगों पर ठोस पहल नहीं की, तो संघर्ष और तेज होने की संभावना है।












